इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू – अध्याय 3

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वारिस होना खतरनाक है

(डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया की डिस्कवरी)

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

भारत की सांस्कृतिक विरासत की संसार के अनेक विद्वानों ने मुक्त कंठ से सराहना की है, परंतु (नेहरू जी कई बार और कई स्थानों पर भारतीय सांस्कृतिक विरासत की प्रशंसा करने के उपरांत भी) भारत की वैदिक सांस्कृतिक विरासत या धरोहर पर अधिक गर्व नहीं करते थे। नेहरू जी यह नहीं समझ पाए कि प्राचीन काल में मानव की सृष्टि भारत में ही हुई थी और यहीं से आयों ने संसार के विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्रस्थान किया था। इस प्रकार भारतीय मूल का बीज ही समस्त संसार में यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखर गया। उस बीज से ही मानव संतति सर्वत्र आगे बढ़ने लगी। इस प्रकार भारत संपूर्ण मानवता का प्राचीन पालना है। उसका अपना घर है। इस प्रकार की मान्यता से भारत की उस मानवीय सोच को गति मिल सकती है, जिसके अनुसार हम संपूर्ण वसुधा को परिवार मानते हैं। जब हम भारत से बाहर की ओर चलते हैं तो हमें लगता है कि हम अपने ही बिछुड़े हुए भाइयों से मिलने के लिए जा रहे हैं। इसी प्रकार जब बाहर से कोई भारत में आता है तो उसे लगता है कि मैं अपने बिछुड़े हुए या छूटे हुए घर की ओर आ रहा हूं। नेहरू जी के प्रधानमंत्री रहते हुए इस प्रकार की सच्चाई को उनके द्वारा विश्व मंचों पर प्रकट करना चाहिए था। अपने लेखन के माध्यम से इस सच्चाई का प्रचार प्रसार करना चाहिए था।

अपनी दोगली सोच के कारण नेहरू जी चीन और हिंदुस्तान दोनों की सभ्यता और संस्कृति को एक ही मूल से निकली हुई भी नहीं मानते थे। उनकी सोच थी कि इन दोनों देशों की गली सड़ी सभ्यताओं को ओढ़कर चलना समय के अनुकूल नहीं है।

भारत की वैदिक परंपरा को नेहरू जी गली सड़ी परंपरा कह जाते हैं। ऐसा देखकर बड़ा कष्ट होता है। उनकी मान्यता थी कि चीन ने क्रांति के माध्यम से अपनी प्राचीन जड़ों से दूरी बनाई। इसी काम को नेहरू जी ने भी भारतवर्ष में अपने ढंग से करना आरंभ किया। उन्होंने भारत को भारत की जड़ों से काटकर उसका ‘इंडियनाईजेशन’ करने का प्रयास किया।

नेहरू जी अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 39 पर लिखते हैं-

” गुजरे हुए जमाने का, उसकी अच्छाई और बुराई दोनों का ही, बोझ एक दबा देने वाला और कभी-कभी दम घुटने वाला बोझ है। खासकर हम लोगों में से उनके लिए जी ऐसी पुरानी सभ्यताओं में पले हैं, जैसी चीन या हिंदुस्तान की है। जैसा कि नीत्शे ने कहा है- “न केवल सदियों का ज्ञान बल्कि सदियों का पागलपन भी हम में फुट निकलता है। वारिस होना खतरनाक है।”

हमारा मानना है कि यदि आपका अतीत गौरवशाली है, आपके पूर्वजों के कार्य मानवता की श्रेणी के रहे हैं, मानवता के प्रति हितकारी रहे हैं, आपके पूर्वज मानवता प्रेमी, संस्कृति प्रेमी, धर्म प्रेमी, प्रकृति प्रेमी और ईश्वर के बनाए प्राणघारियों के प्रति कर्तव्य भाव से भरे हुए रहे हैं तो ऐसी विरासत का उत्तराधिकारी बनना कभी भी खतरनाक नहीं हो सकता। ऐसी विरासत पर सभी को गर्व होता है। संसार का प्रत्येक मनुष्य इसी प्रकार की विरासत की अपेक्षा भी करता है। भारत के संदर्भ में तो यह बात विशेष रूप से कही जा सकती है, जिसने करोड़ों वर्ष तक संसार का अपने बौद्धिक बल से विवेकपूर्ण नेतृत्व किया है और संसार में व्यवस्था बनाए रखने में दीर्घकाल तक अपना सहयोग और मार्गदर्शन दिया है।

भारत के बारे में यदि वास्तव में नेहरू जी सही-सही जान लेते तो उन्हें कभी भी भारत की महान सांस्कृतिक विरासत का उत्तराधिकारी होने में कोई खतरा दिखाई नहीं देता। नेहरू जी ने भारत की सांस्कृतिक विरासत का पुरानापन तो देखा, परंतु वह पुरानी होकर भी नवीन बनी रहती है, उसके इस सत्य सनातन स्वरूप का कभी गहराई से अवलोकन नहीं किया। उन्होंने इसकी प्राचीनता को भी नापने का कमी सार्थक और गंभीर प्रयास नहीं किया।

अपने व्यक्तित्व और बौद्धिक चिंतन की इसी कमी के कारण नेहरू जी ने पृष्ठ 40 पर लिख दिया-

“मेरी विरासत क्या है? मैं किस चीज का वारिस हूं? उस सबका जिसे इंसानों ने दसियों हजार साल में हासिल किया है, उस सबका जिस पर इसने विचार किया है। जिसका इसने अनुभव किया है या जिसे इसने सहा है या जिसमें इसने सुख पाया है उसके विजय की घोषणाओं का और उसकी हारों की तीखी वेदना का। आदमी की उस अचरज भरी जिंदगी का, जो इतने पहले शुरू हुई और अब भी चल रही है और जो हमें अपनी तरफ इशारा करके बुला रही है इन सबके बल्कि इससे भी ज्यादा के सभी इंसानों की शिरकत में हम वारिस हैं, लेकिन हम हिंदुस्तानियों की एक खास विरासत का दाव है। वह ऐसी नहीं कि दूसरे उससे वंचित हों, क्योंकि सभी विरासतें किसी एक जाति की न होकर सारी मनुष्य जाति की होती हैं। फिर भी यह ऐसी है, जो हम पर खास तौर पर लागू है। जो हमारे मांस और रक्त में और हड्डियों में समाई हुई है और जो कुछ हम हैं या हो सकेंगे, उसमें उसका हाथ है।”

इस उदाहरण से स्पष्ट है कि नेहरू जी विश्व इतिहास को पिछले 10,000 वर्षों में ही समेटकर देखते थे। इससे पीछे उनका चिंतन जाता ही नहीं था। इससे यह भी स्पष्ट है कि वह भारत के ऋषियों के इस चिंतन और मत से भी सहमत नहीं थे कि इस सृष्टि को बने 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 53 हजार से अधिक वर्ष हो चुके हैं।

हम यह मानते हैं कि किसी भी लेखक का मत उसकी अपनी बौद्धिक सीमा और क्षमताओं के अनुरूप होता है। जिसे स्थायी नहीं माना जा सकता। शोध और अनुसंधानों के आधार पर यदि भविष्य में कोई सत्य प्रकट होता है और वह किसी लेखक की अपनी पुस्तक में किसी दूसरे ढंग से लिखा गया है तो मनुष्य सभ्यता का यही तकाजा होता है कि ऐसी परिस्थितियों में नव अनुसंधान से प्राप्त सत्य को स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। परंतु जब किसी एक लेखक के मत को पूर्ण और सार्वकालिक घोषित करने की एक जिद कुछ लोगों पर सवार हो जाती है तो इसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। और नेहरू जी के साथ यही हुआ है। उनके मानने वालों ने उनकी पुस्तक हिंदुस्तान की कहानी अयांत द डिस्कवरी ऑफ इंडिया को आजकल की गीता से भी अधिक मान लिया है।

” वारिस खतरनाक होता है- नेहरू जी का यह मत उन लोगों पर लागू होता है जिनकी विचारधारा में दोगलापन पाया जाता है, जो अपने देश, धर्म और संस्कृति को पहचानते व जानते नहीं हैं, जो अविद्या का शिकार होते हैं, और जिनके विचारों में अस्थिरता होती है, जिसके चलते वे देश के लिए घातक सिद्ध हो जाते हैं।

जिनकी गलत नीतियों के कारण देश बंट जाता है, जो कहते हैं. कि देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा, परंतु फिर उनके जीते जी देश बंटता है और उनके उत्तराधिकारी फिर ऐसा कहने वाले को देश का ‘ राष्ट्रपिता’ घोषित करते हैं, ऐसे लोगों का उत्तराधिकारी होना भी खतरनाक होता है। जो लोग देश का संविधान बनाते हैं और उसमें धोखे से 35 (ए) नाम का अनुच्छेद जुड़वा देते हैं, चारा 370 को डलवाकर देश के संघीय स्वरूप को कमजोर करने का प्रयास करते हैं, समय आने पर देश में आपातकाल की घोषणा करते हैं, शाहबानी बेगम केस में निर्णय के उपरांत संविधान की मौलिक भावना का अपमान करते हुए उसमें मनमाना संशोधन करते हैं, समान नागरिक संहिता का प्रावधान संविधान में होने के उपरांत भी उसे लागू नहीं करते हैं, ऐसे लोगों का उत्तराधिकारी होना भी खतरनाक होता है आदि-आदि।

इसके विपरीत राम और कृष्ण का उत्तराधिकारी होना बार-बार शोभा देता है। महर्षि मनु के मानवतावादी संविधान की वास्तविकता को समझ कर मानवता के हितार्थ काम करने में बार-बार आनंद आता है। भारत की वर्ण-व्यवस्था को समझ कर आश्रम-व्यवस्था के धर्म का पालन करना और उसका अपने आप को उत्तराधिकारी घोषित करना, बार-बार मन में हर्ष के भाव उत्पन्न करता है। यह किसी गांधी का देश बाद में है, पहले यह उन महान ऋषियों का देश है-जिनके चिंतन ने मानव को आत्म कल्याण का मार्ग बताया। यह उन राष्ट्र धर्म का पालन करने वाले अनेक सम्राटों का देश है-जिन्होंने भारत के वेद के मानवतावाद का संदेश लेकर अंत में भारत की सांस्कृतिक ध्वजा को फहराने में सफलता प्राप्त की। यह उन अनेक देशभक्त और क्रांतिकारियों का देश है, जिन्होंने भारत के पराभव के काल में अर्थात सल्तनत काल के सुल्तानों, मुगल काल के बादशाहों और ब्रिटिश काल में ब्रिटिश सत्ताधारियों की क्रूरता, निर्दयता और निर्ममता के विरुद्ध अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। उन सबके प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हुए उनका उत्तराधिकारी बनने में बार-बार गर्व और गौरव की अनुभूति होती है और होती रहेगी। इसलिए इस संदर्भ में यह सिद्धांत पूर्णतया गलत है कि वारिस होना खतरनाक होता है। यह सिद्धांत दोगले और देश विरोधी लोगों के उत्तराधिकारी होने में ही सत्य जान पड़ता है।

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