hinduism

लेखक – पुरुषोत्तम

प्रेषक – डॉ विवेक आर्य

भाग 1

एक समय भयङ्कर बाढ़ आई। लोग जान बचाने के लिये ऊँची जगहों पर, पेड़ों पर और मकान की छतों पर जा बैठे। फिर उन लोगों को बाढ़ – से निकालने का कार्य प्रारम्भ हुआ। कुछ साहसी लोग तैर तैर कर उन बाढ़ ग्रस्त लोगों के पास जाते और उन्हें सहारा देकर बाहर निकाल ले आते ।

स्थानीय गिरिजाघर के पादरी भी चर्च की गगनचुम्बी मीनार पर चढ़े बैठे थे। कुछ लोग तैर कर उनके पास पहुँचे और उन्हें बाहर निकालने का प्रस्ताव किया।“मुझे अपने परमेश्वर पर विश्वास है ” पादरी ने कहा । ” वह मुझे बचायेगा ।” वह लोग चले गये ।

पानी और बढ़ गया तो नावें लाई गईं। नाव लेकर एक नाविक पादरी के पास पहुँचा।‘‘सम्मानित पिता ! पानी बढ़ रहा है नदी की धारा भी तेज होती जा रही है। आप नाव में उतर आइये। अभी समय है । सब लोग निकाले जा चुके हैं। आप ही शेष हैं, ” उसने पादरी को आवाज लगाई। पादरी ने चिल्लाकर कहा ” क्या तुझे प्रभु में भरोसा नहीं है ? मुझे उसका पूरा भरोसा है । वह मुझे मरने नहीं देगा।” नाविक चला गया।

पानी और बढ़ गया। धारा तेज हो गई। अब नाव का जाना भी दुष्कर हो गया। पादरी मीनार पर बैठकर शान्तिपूर्वक प्रभु का स्मरण कर रहा था। शासन को पता चला तो तुरन्त एक हेलीकाप्टर पादरी को निकाल लाने के लिये भेजा गया। हेलीकाप्टर चालक ने एक रस्सी पादरी की ओर गिराई और चिल्लाकर कहा ” पिता ! रस्सी कसकर पकड़ लो। मैं आपको ऊपर खींच लेता हूँ । रात होने वाली है। सूर्योदय से पहले अब कोई दूसरा साधन उपलब्ध न हो सकेगा।” पादरी को उन लोगों के अविश्वास पर बहुत क्रोध आया। उसने कहा ” कैसा मूर्ख है तू ? तू मुझे क्या बचायेगा ? मेरा परमेश्वर क्या मुझे नष्ट हो जाने देगा ? मैंने जीवन भर उसका स्मरण किया है। मुझे उसमें पूर्ण विश्वास है ।” हेलीकाप्टर वापस चला गया। रात्रि में नदी की तेज धारा ने उस मीनार को धराशायी कर दिया। पादरी मर कर परमात्मा के सामने पहुँचा । उसने दोनों हाथ उठाकर कहा “पिता! मैंने सदा तेरा स्मरण किया। कोई पाप नहीं किया । तुझ पर पूर्ण विश्वास किया और तूने मुझे नदी में डूब जाने दिया । संसार में कैसी बदनामी होगी तेरी ? सब कहेंगे भगवान् ने उसकी रक्षा नहीं की जिसने केवल उसी में विश्वास रखा।”

परमेश्वर हँसा और कहा, “पुत्र ! मेरी बदनामी की चिन्ता मत कर। मैंने तुझे बचाने के लिये तैराक और गोताखोर भेजे। फिर नाव भेजी। फिर एक हेलीकाप्टर भेजा। बता मैं और क्या करता ?” आप हँसेंगे और कहेंगे कि ” पादरी मूर्ख था । उसे बचाने को तीन सहायक तो भेजे गये। परमात्मा और क्या करता।”

किन्तु इससे भी विस्मयकारी एक कथा और भी है। यह एक पादरी की काल्पनिक कहानी नहीं है। यह हमारी आपकी सत्यकथा है । यह करोड़ों लोगों के एक समाज की कहानी है। हिन्दू समाज की।

जब संसार का अन्तिम हिन्दू भगवान् के सामने पहुँचा तो पादरी की तरह उसने भी हाथ उठाकर आरोप लगाया ” पिता ! मेरी जाति ने तेरे लिये विशाल मन्दिर बनाये। तेरी सोने हीरों की मूर्तियाँ स्थापित कीं। करोड़ों रुपये के सोने और अलङ्कारों से तुझे ढक दिया। करोड़ों रुपये के प्रसाद के भोग तुझे लगा दिये । रात-दिन धर्म ग्रन्थों के अखण्ड पाठ किये। तूने विश्राम करने के लिये हमें रात्रि दी थी। हमने उसमें भी जाग जाग कर निरन्तर तेरे कीर्तन किये। न स्वयं सोये न पड़ोसियों को सोने दिया । कैसा अद्भुत प्रचार किया तेरे नाम का ? मेरी जाति के करोड़ों मनुष्यों ने तेरी भक्ति में अपने शरीर सुखा डाले । भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक तपती गर्मी, कँपकँपाती बर्फीली ठण्ड में पृथ्वी पर लेट-लेट कर तेरे धामों की तीर्थ यात्रायें कीं और तूने मेरी जाति को १२०० वर्ष तक विधर्मियों का गुलाम बनाया। और अन्त में मेरी जाति का नामोनिशान ही पृथ्वी से मिटा दिया। तूने ऐसा क्यों किया ? तूने इन विधर्मी विदेशी आताताइयों का और आक्रान्ताओं का साथ दिया और अपने भक्तों की रक्षा नहीं की? कहाँ गया तेरा वह प्रण कि तेरे भक्त का नाश कभी नहीं होता । ”

परमेश्वर उस हिन्दू का आरोप सुनकर मन्द मन्द मुस्कराते रहे । फिर बोले, “पुत्र मैं अपने भक्तों की रक्षा उनके शत्रुओं से तो कर सकता हूँ किन्तु यदि वह स्वयं ही अपने शत्रु बनकर अपना विनाश करने लगें तो मैं क्या करूँ ? कृष्णवंशीय यादवों को किसी ने नष्ट नहीं किया था । वह आपस में लड़कर स्वयं ही नष्ट हो गये थे । सुनोगे हिन्दुओं की रक्षा के कितने उपाय मैंने किये ? कितने साधन उन्हें उपलब्ध कराये ?”

“सुनो! मैंने तुम लोगों को पूरे संसार का अनुपम भूभाग दिया किसी धातु किसी सम्पदा का नाम लो जो उस देश की धरती के नीचे, पहाड़ों अथवा समुद्र में न मिलती हो। ऐसी उपजाऊ भूमि दी जिसमें सभी वनस्पतियाँ, वृक्ष, फल, ईंधन और श्रेष्ठ इमारती लकड़ी पैदा होती है। नदियों और भूगर्भ में इतना जल दिया जिसे देखकर मनुष्य तो क्या देवता भी ईर्ष्या करें। इतना ही नहीं, मैंने उसे सहज सुरक्षित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। संसार का सबसे ऊँचा और विशाल पर्वत उत्तर में और तीनों ओर से समुद्र, उसकी रक्षा करता है । बोलो इससे अधिक भौतिक सम्पदा मैं तुम्हें क्या देता ?”

भगवान् कहते गये – ” अब सुनो ज्ञान-विज्ञान और नीति की बातें। मैंने तुम्हें वेदों के रूप में अपनी कल्याणमयी वाणी दी और तुम्हें सावधान किया पुत्रो ! यह मेरी कल्याणमयी वाणी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, भृत्य, स्त्रियों तथा अति शूद्रादि जनों के लिये भी है । इससे किसी को भी वंचित मत करना । सभी को इसका ज्ञान कराना।” किन्तु तुमने इसका उल्टा किया। अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिये इसके अर्थों का अनर्थ किया। स्त्री, शूद्र एवं अन्त्यजों को तो इससे पूर्णतया वंचित ही कर दिया। स्त्रियाँ इस ज्ञान के अभाव में मूढ़ हो गईं। स्त्रियाँ ही माता होती हैं। वह ही सन्तान की प्रथम गुरु होती हैं। जब वह मूढ़ हो गईं तो तुम्हारी भावी संतति पीढ़ी दर पीढ़ी मूढ़ होती गई । दूसरा कोई समाज है जो लगातार १२०० वर्षों तक गुलाम रहा हो ? यह इसी मूढ़ता का फल था। इसमें मेरा क्या दोष है ? इस ज्ञान-विज्ञान के अभाव में आर्य-अनार्य हो गये । स्वयं भारत में धर्म की निराली – निराली व्याख्यायें की गईं। धर्म के नाम पर अधर्म का, ज्ञान के नाम पर अज्ञान का बोलबाला हो गया। फिर बताओ तुम किस मापदण्ड के आधार पर मेरे भक्त रह गये ?”

“स्वभाववश मुझे तुम पर दया आई। मैंने मनु जैसे स्मृतिकार को भेजा । उसने तुम्हें राज्यव्यवस्था के नियम बताये । उसने तुम्हें बताया था कि जब सब सोते हैं तब दण्ड जागता है । इसलिये दुष्टों को दण्ड देना ही राजधर्म है । जब तक तुम्हारे शासक दुष्टों को निर्मूल करते रहे, तुम सुरक्षित रहे । उसने तुम्हें यह भी सावधान किया था कि सभा में या तो प्रवेश ही न करो और यदि प्रवेश करो तो वहाँ किसी भी मूल्य पर सत्य द्वारा झूठ को उजागर करो क्योंकि यही सभासद का कर्त्तव्य तथा धर्म है । यदि वह ऐसा नहीं करता तो पापी है। क्या तुमने इस पर आचरण किया ? तुमने तो मनु के उपदेशों को प्रदूषित करने से नहीं छोड़ा। स्वार्थपूर्ति के लिये अपनी ओर से उसमें सैकड़ों पापपूर्ण श्लोक जोड़कर पूरी स्मृति को दूषित बना डाला । अपने ही समाज के एक बड़े वर्ग को पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को बाध्य कर दिया। तुम्हारी अज्ञानावस्था को देखकर मैंने वाल्मीकि और व्यास जैसे कथाकार भेजे जो महापुरुषों की कथाओं द्वारा तुम्हें सन्मार्ग दिखा सकें। तुमने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये उनकी कलाकृतियों में भी सहस्रों श्लोक मिलाकर उन्हें भ्रष्ट कर डाला । देवदासियों के नाम पर अबोध बालिकायें वेश्यावृत्ति में उतार दी गईं। तीर्थ स्थान जहाँ लोग तपस्या के लिये जाते थे, व्यभिचार के अड्डे बन गये। निरीह पशुओं की बलि दी जाने लगी। मन्दिर बूचड़खाने बन गये ।”

‘मुझे तुम पर फिर दया आई। मैंने गौतम बुद्ध को भेजा। उन्होंने अहिंसा तथा कर्मफल चक्र की शिक्षा दी । भारतवासियों ने उस शिक्षा को भी तोड़मरोड़ डाला। बुद्ध ने अहिंसा के अर्थ यह कब किये थे कि आतताइयों और आक्रमणकारियों से भी युद्ध मत करो ? किन्तु भारत के बौद्धों ने यही किया सिन्ध के अरब आक्रमण के समय बौद्धों ने अहिंसा के नाम पर आक्रमणकारियों से सहयोग किया। गौतम बुद्ध की मूर्तियों से देश को पाट तो दिया, किन्तु उनके उपदेशों की अवहेलना की। उनके प्रेम और त्यागमय जीवन का अनुकरण नहीं किया। उनके कर्मफल चक्र की उपेक्षा की। फलस्वरूप उन्हीं आतताइयों ने बुद्ध की मूर्तियों को तोड़ डाला। बड़ी संख्या में बौद्धों को इस्लाम धर्म बलात् स्वीकार करना पड़ा । जापान, चीन इत्यादि देशों ने जिस बौद्ध धर्म के बल पर संगठन और शक्ति का संग्रह किया वह तुम्हारी गुलामी का कारण बना । ”

” तुमने ठीक कहा है। तुमने मेरी करोड़ों रुपये की कल्पित मूर्तियाँ बनाबनाकर करोड़ों रुपये उनके मन्दिर, आभूषण और उनके भोग पर खर्च कर डाले। क्या तुमने कभी सोचा कि यही तुम्हारे पतन और अन्त में नष्ट हो जाने का कारण है ?”

” तुम यह मन्दिर और मूर्ति बनाते रहे । आतताई उन्हें ध्वस्त करते रहे। लूटते रहे । किन्तु मूर्तियाँ बना-बनाकर स्थापित करने, मन्दिर बनाने तथा वहाँ सोना, जवाहरात सञ्चित करने का तुम्हारा मोह भंग नहीं हुआ। मोहम्मद बिन कासिम, अकेले मुल्तान के सूर्य मन्दिर से १३५०० मन सोना लूट ले गया । महमूद गजनवी ने सोमनाथ मन्दिर से इतना सोना और हीरे लूटे कि गजनी के लोगों की आँखें फटी की फटी रह गईं। अलाउद्दीन खिलजी दक्खिन के मन्दिरों से ६०,००० मन सोना लूट लाया । इन लुटेरों ने मन्दिरों की इस सम्पत्ति का उपयोग सेना की भरती और तुम्हारे समाज को नष्ट करने में किया। अब्दाली को लूट का सामान ढोने के लिये अपनी तोपें छोड़ देनी पड़ी जिससे सेना के हर चौपाये और दुपाये का उपयोग सोना, रत्न इत्यादि ढोने में किया जा सके। समकालीन मुस्लिम इतिहासकार लिखते हैं कि दिल्ली के आस-पास किसी नागरिक के पास उसने एक गधा तक न छोड़ा।”

” ‘स्वतन्त्र भारत में भी तुमने विशाल मन्दिर तो बनाये किन्तु अपनी संस्कृति और समाज की रक्षा के लिये क्या कोई शिक्षा संस्थान भी खोला ?”

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