वैदिक सम्पत्ति -263 आर्य गृह, ग्राम और नगर

( यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नमक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)

प्रस्तुति: – देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन ‘उगता भारत’

गतांक से आगे …

अर्थ की तीसरी शाखा गृह है। सर्दी गर्मी और वर्षा के कष्ट से बचने तथा अन्य सामाजिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए यद्यपि घर की आवश्यकता मनुष्यमात्र को होती है, तथापि आर्यसभ्यता में गृह अर्थात् घर का विशेष महत्व है। इसका कारण यह है कि आर्यों की आश्रमव्यवस्था के अनुसार उनके समाज की आधे से भी अधिक जनसख्या के पास निज का घर नहीं होता। ब्रह्मचारी, वनस्थ, संन्यासी और अन्य ऐसे ही उपयोगी मनुष्य केवल गृहस्थों के ही घरों में आश्रय ग्रहण करते हैं। इसीलिए आर्यों को घर के विषय में बहुत ही सोच समझकर नियम बनाने पड़े हैं। हमने जिन ब्रह्माचारी, वानप्रस्थी और संन्यासियों को बिना घर द्वार के लिखा है, उनमें वानप्रस्थी और संन्यासी दोनों आर्य जीवन का अन्तिम उद्देष पूरा करने के लिए मोक्ष मार्ग का पूर्ण अवलम्बन किये हुए विचरते हैं। तीसरे ब्रह्मचारी लोग गृहस्थ बनकर और फिर उन्हीं दोनों का अनुकरण करनेवाली शिक्षा और दीक्षा को प्राप्त करते हुए फिरते हैं। इन तीनों दलों को सहायता देने और स्वयं दोनों अन्तिम दलों में प्रवेश करने के लिए ही गृहस्थाश्रम की व्यवस्था है। इसीलिए तीन भाग जनता के पास मकान नहीं होते और एक भाग जनता के पास मकान होते हैं, जो केवल उपर्युक्त तीनों आश्रर्मियों की सेवा करने के लिए ही होते हैं और किसी दूसरे काम के लिए नहीं। अतएव आर्यो के मकान ऐसे “ही होना चाहिये जो ब्रह्मचारियों, वानप्रस्थियों और संन्यासियों की चाल ढाल के विपरीत न हो, उनमें मोह और वासना का जहर डालनेवाले न हों और गृहस्थ के प्रति घृणा, उपेक्षा तथा तिरस्कार उत्पन्न करनेवाले न हों। प्रत्युत ग्रामों के घर ऐसे हों जो मोक्षमार्गियों को अपने निकट बुलाते हों और गृहस्थ को भी वनस्थ बनने में सहायता देते हों।

एक आर्य जब ब्रह्मचर्याश्रम से आकर गृहस्थ बनता है, तो ब्रह्मचारियों, वानप्रस्थियों और संन्यासियों में एक प्रकार का बल प्राप्त होता है। उनको विश्वास हो जाता है कि हमारी सेवा करने के लिए और हमें सहायता देने के लिए अब एक और मजबूत बाहुबल वाले दम्पति ने अपने घर में अग्नि की स्थापना की है। इसी अभिप्राय से आर्यो ने विवाह के बाद अपने कुटुम्ब से पृथक् होकर जुदा रहने में ही धर्म माना है। मनु भगवान् कहते हैं कि ‘ पृथक् विवर्धते धर्मस्तस्माद्धम्र्या पृथक् क्रिया’ अर्थात् अलग रहने से ही धर्म बढ़ता है, इसलिए अलग ही रहना चाहिये। यही बात गौतम सूत्र – अध्याय 28 में इस प्रकार लिखी है कि ‘पिता की मृत्यु के पश्चात् अथवा पिता से जीते ही जी जब माता के पुत्र जनने का समय व्यतीत हो जाय, तब सब पुत्र पिता की सम्पत्ति बाँट लें’। इसी तरह शुक्रनीति में भी लिखा है कि-

सदारप्रौढपुत्रां वाक् श्रेयोऽर्थी विभजेत्पिता ।
सदारा भ्रातरः प्रौढाः विभजेयुः परस्परम् ।।

अर्थात् युवा और विवाहित पुत्र अथवा भाई कल्याण के लिए परस्पर गृहस्थी को बाँट लें और जुदा हो जायें। इस पृथक्ता का केवल इतना ही कारण है कि प्रत्येक विवाहित पुरुष बहुकुटुम्ब के कलह, प्रमाद और आलस्य से हटकर अलग घर बनाये और बाहुबल से मोक्षार्थियों की सेवा और सांग से खुद भी मोक्षमार्गी बन जाय। तात्पर्य यह कि गृहस्थो के भर मोक्षमार्ग के केन्द्र होता चाहिये, जिनमें देव, पितर, ब्रह्मचारी, संन्यासी, पापरोगी, अपच और पशु पक्षी, कीट पतङ्ग तृण पल्लव सभी की पूजा हो और सभी को सहारा दिया जाय। ऐसे घर जिन में निरन्तर मोक्षार्थियों की सेवा होती हो और जहाँ निरन्तर मोक्ष प्राप्त करने का ही उद्योग होता हो वे ऐसे ही होना चाहिए जो स्वच्छ, सात्विक, अभयदान देने बाले बौर रम्य हों। उन मकानों से अभिमान, विलास और अपवित्रता की बू न आती हो, प्रत्युत शान्ति मिलती हो। सही कारण है कि आर्यो ने अपनी सभ्यता में बहुत ही सादे मकानों को स्थान दिया है और यही कारण है कि पुराने जमाने में आर्यो के मकान बहुत ही सादे होते थे। ‘महाभारत-मीमांसा’ पृष्ठ ३७५ में रायबहादुर चिन्तामणि विनायक वैद्य, एम० ए० लिखते हैं कि ‘हिन्दुस्थान में प्राचीन काल में प्रायः लकड़ी और मिट्टी के ही मकान थे। दुर्योधन ने पाण्डवों के रहने के लिए जो लाक्षाग्रह बनवाने की आज्ञा दी थी, उसमें लकड़ी मिट्टी की ही दीवारें बनाने को कहा गया था। इन दीवारी के भीतर रास, लाख आदि ज्वालाग्राही पदार्थ डाल दिये गये थे और ऊपर से मिट्टी लीप दी गई थी। जब पाण्डवों के सरीखे राजपुरुषों के रहने के लिए ऐसे पर बनाने की आज्ञा दी गई थी, तब यही बात सिद्ध होती है कि महाभारतकाल में बड़े लोगों के घर भी मिट्टी को ही होते में। यह बात बिलकुल ही ठीक है। आर्यों के घर ऐसे ही होते थे। पर इसका मतलब यह नहीं है कि आर्य लोग ईंट बनाना या पत्थर काटकर जोड़ना नहीं जानते थे। वे ईंटों को पकाना जानते थे और ईंटों से हवनकुण्ड और हवनमण्डप बनवाते भी थे, यहाँ तक कि बड़े बड़े लोहे के किले भी बनवाते थे। यह बात ‘अग्न इष्टका’ का वर्णन करते हुए यजुर्वेद में और आयसी पुर का वर्णन करते हुए ऋग्वेद में लिखी भी है, किन्तु जैसा कि हम अभी कह आये हैं, आर्यों के रहनेवाले मकान मोक्षार्थियों के टिकने और मोक्षार्थ की चर्चा करने ही के लिये थे, इसलिए वे प्रमाद उत्पन्न करनेवाले ढंग के नहीं बनाये थे। भव्य भवनों और साधारण आर्य घरों में क्या अन्तर है और दोनों से क्या क्या हानि लाभ है, यहाँ हम बतलाने का यत्न करते हैं।

क्रमशः

प्रस्तुति: – देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन ‘उगता भारत’

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