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भ्रांति निवारण

कुम्भ मेला आयोजन रहस्य (भाग-2)

विशेष – ये लेख विद्वानों के प्रसिद्ध लेख और उनके विचारों पर आधारित हैं। कृपया अपने विचार बताये।

विश्लेषण – वेदों के अनुसार सृष्टि की रचना की ईसाई वर्ष २०२५ में लगभग १,९६,०८,५३,१२५ वर्ष हो गए है।विक्रमी संवत् यानि हिन्दू नव वर्ष कहते हैं उसको २०८१ वर्ष हुए हैं और रामायण काल को लगभग १० हजार साल और महाभारत काल को लगभग ५५ सौ वर्ष हो गए है। इसलिए कुम्भ मेले को अत्यंत प्राचीन और हजारों साल पुराना कहना गलत है। ये आदि शंकराचार्य द्वारा शुरू की गई एकत्रीकरण की परंपरा ज्यादा प्रतीत होती है।

प्रचलित कथायें कितनी प्रामाणिक

ये सभी कथायें कितनी प्रामाणिक और सत्य हैं ,आप स्वयं अपने विवेक और वैज्ञानिकता की कसौटी पर इनकी परख करने को स्वतंत्र हैं। वास्तविकता ये है कि सभी कथाएं गप्प और असत्य हैं।

वास्तविकता क्या हो सकती हैं?

आइये इस पर स्वतंत्र रुप से विचार करते हैं।

कुम्भ शब्द का भावार्थ – पहले कुम्भ शब्द के भावार्थ समझना जरुरी है। शाब्दिक रूप से देखा जाये तो कुम्भ का अर्थ घड़ा होता है। अलंकार की भाषा की दृष्टि में कुम्भ का अभिप्राय अपने अंदर सभी को समाहित करके एकत्रीकरण करना हो सकता है। कुम्भ का मेला एक ऐसा मेला है जिसमें विशाल भारत के सभी प्रांतों से और विदेश से भी विभिन्न संस्कृतियों के लोग एकत्रित होते हैंऔर ये एक प्रकार से अनूठा धार्मिक संगम होता है।
मेरे विचार से कुंभ मेला शब्द “वसुधैव कुटुम्बकम् ”( संस्कृत : वसुधैव कुटुम्बकम् ) से लिया गया है। हमारे शास्त्रोक्त मान्यता यही है;

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

वसुधैव कुटुम्बकम् का अर्थ है, ‘पूरा विश्व एक परिवार है’. यह वाक्यांश सनातन धर्म की मूल संस्कार और विचारधारा है. यह उपनिषद समेत कई हिन्दू ग्रंथों में मिलता है.भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी यह वाक्य लिखा है।
मौसम के हिसाब से यह समय अनुकूल भी है, सूर्य उत्तरायण में प्रवेश कर रहा होता है।
इसका ज्योतिष का इससे कोई लेना देना नहीं है।

महाकुम्भ के आयोजन का मूल उद्देश्य

जब जैनियों और बौद्धों ने सनातन वैदिक धर्म की व्यवस्था को बिगड़ना शुरू किया तब शंकराचार्य ने गंगा नदी के आसपास एकत्रीकरण की व्यवस्था शुरू हुई जिसमें विश्व भर से साधु संन्यासी ऋषि महात्मा प्रचारक एकत्र होकर विचार विमर्श करते हैं चर्चा करते हैं धर्म के सिद्धांतों प्रति शास्त्रार्थ व बहस होती है और भविष्य में वैदिक धर्म को बचाने,दृढ़ व स्थाई रखने की योजनाएं बनती हैं जिसे अर्ध कुम्भ कहते हैं फिर इस अर्ध कुम्भ में जो विद्वान ऋषि मुनि या साधारण लोग शामिल नहीं हो पाते तो वे १२ वर्ष बाद लगने वाले कुम्भ में अवश्य पधारते हैं और धर्म चर्चा करते हैं। इस आयोजन को गंगा किनारे करने की व्यवस्था प्राचीन काल में इसलिए करते थे की भारी संख्या में पधारे लोगों के लिए स्नान व पीने के लिए जल की सुविधा बनी रहे। नदी के किनारे का शांतमय वातावरण धर्म प्रेमियों को मानसिक शांति प्रदान भी करता रहे।

वहाँ डुबकी लगाने का अर्थ केवल गंगा में स्नान करना ही नहीं था बल्कि ज्ञान की गंगा के प्रवाह में डुबकी लगाकर जीवन का कल्याण करना था। मतलब जो ऋषि मुनियों विद्वानों के ज्ञान गंगा को प्राप्त करेगा वे अवश्य पाप कर्मों से दूर रह कर दुःख से तरेगा और धर्म पर चलता हुआ मोक्ष प्राप्त करेगा।
लेकिन यह जो प्रचार किया जाता हैं कि कुम्भ स्नान से पाप कट जाएंगे दुखों से मुक्ति होगी और मोक्ष प्राप्त होगा यह धर्म की उन्नति नहीं अवनति करने वाले विचार हैं क्योंकि कर्मों का फल तो मनुष्य को अवश्य भोगना पड़ता है यह बात हमारे सभी शास्त्र कहते हैं।

कुम्भ स्नान से पाप नष्ट होते हैं कहना ईश्वर की कर्म फल फल व्यवस्था के विरूद्ध है और ग़लत है। दुसरा केवल पुरुषार्थ से ही सफलता के सिद्धांत के भी विरूद्ध है। जबकि वेद और गीता कर्म पर बल देती है। श्री कृष्ण ने गीता में कहा है अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्|
किये गये अच्छे बुरे कर्मों का फल अवश्य भोगना पढ़ेगा।

“आत्मना विहितं दुःख आत्मना विहितं सुखम् |
गर्भशय्यामुपादाय भुज्यते पौर्वदेहिकम् ||”

अर्थात दुःख अपने ही किये हुए कर्मों का फल है और सुख भी अपने ही पूर्व कृत कर्मों का परिणाम है । जीव माता के गर्भ में आते ही पूर्व जन्म में किये गये कर्मों का फल भोगने लगता है |

“यथा धेनु सहस्त्रेषु वत्सो विदन्ति मातरम् |
तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ||”

अर्थात जैसे बछड़ा हजारों गायों के बीच में अपनी माँ को पहचान कर उसे पा लेता है, ठीक इसी प्रकार किया हुआ कर्म भी अपने कर्ता के पास पहुँच जाता है |

“किया हुआ कर्म कभी निष्फल नहीं होता । उसका फल शीघ्र वा विलंब से अवश्य ही मिलता है ।”

ऋग्वेद.2/12/10 में कहा है कि- यदि परमेश्वर दुष्ट आचरण वालों को ताड़ना न दे, धार्मिकों का सत्कार न करें और डाकुओं को नष्ट न करें तो न्याय व्यवस्था नष्ट हो जाय।

जो ऐसा कहते हैं कि गंगा स्नान से किसी निकम्मे और पुरुषार्थ हीन व्यक्ति के सब कार्य सफल हो जाएंगे तो यह एक धोखा है। दुसरा अगर व्यक्ति पाप कर्म करें और कहे कि उसको कुम्भ स्नान पापों के फल से बचा सकता है तो यह शास्त्रों के कथन के विपरित है।
यह सर्वथा मिथ्या(झूठ) है।यह लोगों को ठगने का पाखण्ड़ है धर्म के नाम पर गुमराह करना है।

मुक्ति या मोक्ष वेदादि शास्त्रों में बताये गए योगाभ्यास के माध्यम से समाधि प्राप्त करके समस्त अविद्या के संस्कारों को नष्ट करके तथा जब संसार के भोगों से वैराग्य हो जाता है तब जीवात्मा की संसार के भोग पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छायें समाप्त हो जाती हैं | राग-द्वेषादि समस्त क्लेशों को नष्ट करने वाले योगी को शरीर छोड़ने के बाद मोक्ष मिलता है।

मोक्ष्य क्या है ?

मोक्ष-प्राप्ति का साधन ज्ञान है, कर्म है वा ज्ञान-कर्म उभय हैं। ज्ञान-कर्म उभय होने पर भी कर्म समुच्चय है।
मोक्ष-प्राप्ति के पश्चात् जीव पुनः जन्म प्राप्त करता है वा नहीं, अर्थात् मोक्ष शान्त है वा अनन्त है। इसमें महर्षि का क्या मत है। इन दोनों पर संक्षेप से अन्य पक्ष और भूमि पक्ष लिखने का यत्न करूंगा। मोक्ष का साधन ज्ञान ही है।
सांख्य तथा वेदान्त दोनों ज्ञान ही को मोक्ष का साधन मानते हैं। इसमें यजुर्वेद का निम्न मन्त्र प्रमाण देते हैं।

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥[यजु० ३१ । १८]

प्रकाशस्वरूप, अज्ञान रहित सर्वव्यापक, महान् रूप परमात्मा को जान । उसे जानकर ही मृत्यु को तर कर मोक्ष को प्राप्त होता है। मोक्ष का और मार्ग नहीं है।
इस मन्त्र में ज्ञान को साधन मान कर अन्य मार्ग का निषेध भी किया है। इसलिए मोक्ष का साधन ज्ञान ही है।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ यजु० ४० । २

सौ वर्ष तक कर्म करता हुआ ही जीने की इच्छा करे, यही मार्ग है। अन्य मार्ग नहीं है। इस प्रकार मनुष्य को कर्म नहीं बाँधते हैं।
इस मन्त्र में आजीवन कर्म करने का विधान है। जैसे पूर्व मन्त्र में अन्य मार्ग का निषेध था इसमें भी अन्य मार्ग का निषेध है, जब दोनों मन्त्रों में अन्य मत का निषेध है। तब यह विषय अधिक चिन्तनीय है, क्योंकि दोनों मन्त्र वेद के हैं। यदि किसी अन्य पुस्तक के होते तो परत:प्रमाणः से स्वत:प्रमाण को प्रबल मान कर परत:प्रमाण का कुछ निषेध हो जाता। ऐसा न होने से दोनों ही प्रमाण माननीय हैं।

अब दोनों की संगति करनी होगी, क्योंकि कणाद जी ने लिखा है- “बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिः वेदे।” । अर्थात् वेद में सब वाक्य बुद्धिपूर्वक हैं। आर्ष आदेश के अनुसार यह विरोधाभास होने से इसका निवारण करना ही होगा, वह मेरी सम्मति में इस प्रकार है।

अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः॥ यजु० ४० । १२

जो कर्म, उपासना (अविद्या) ही करता है वह दुःख को प्राप्त होता है और जो ज्ञान में ही रत है वह उससे भी अधिक दुःख को प्राप्त होता है।
जैसे पहले मन्त्रों में ज्ञान और कर्म की प्रशंसा करके अन्य का निषेध था । इस मन्त्र में अकेले कर्म की भी निन्दा है और अकेले ज्ञान की भी निन्दा है।
अगले मन्त्र का पाठ यह है।

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्यु तीत्व विद्ययामृतमश्नुते ॥ यजु० ४० । १४

जो मनुष्य विद्या और अविद्या दोनों को साथ-साथ प्राप्त करता है। वह अविद्या से मृत्यु को तर के विद्या से मोक्ष को प्राप्त होता है।
इस मन्त्र के अर्थ सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास के आरम्भ में इस प्रकार लिखे हैं

जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ ही साथ जानता है वह अविद्या, अर्थात् कर्मोपासना से मृत्यु को तर के विद्या, अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है।

इस मन्त्र में ‘उभयं सह’ पाठ है, जिसका अर्थ ‘दोनों साथ’ है। इस प्रकार यह मन्त्र कर्म और ज्ञान दोनों का विधायक है और पहला मन्त्र एक-एक का निषेधक है और पहले मन्त्र एक-एक के विधायक होकर दूसरे के निषेधक थे। अब व्यवस्था यह हो जाएगी-पहले मन्त्र में जो एक को ही मानकर दूसरे का निषेध करते हैं, वह अर्थवाद है यह तो दोनों मन्त्र हैं। एक में एक-एक का निषेध वर्णन है और दूसरे में दोनों का साथ-साथ विधान है। साथ-साथ भी सम समुच्चय है कर्म समुच्चय नहीं है।

महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में मोक्ष प्रकरण में इस प्रकार लिखा है।

“पवित्र कर्म पवित्रोपासना और पवित्र ज्ञान ही से मुक्ति और अपवित्र मिथ्या भाषणादि कर्म, पाषाणमूर्ति आदि की उपासना और मिथ्या ज्ञान से बन्ध होता है। कोई भी मनुष्य क्षण मात्र भी कर्म उपासना और ज्ञान से रहित नहीं होता, इसलिए धर्मयुक्त सत्यभाषणादि कर्म करना और मिथ्याभाषणादि अधर्म छोड़ देना ही मुक्ति का साधन है।”

हां, इतना अवश्य मान सकते हैं की इस अवसर पर विद्वानों के साथ संगतिकरण और ज्ञान वर्धन से अज्ञान के अंधकार को दूर करके ज्ञान ,कर्म और उपासना द्वारा मोक्ष के लिए आशावान हो सकते है।

– डॉ0 डी के गर्ग

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