आर्यसमाज का मेघ जाति उत्थान आंदोलन

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आर्य समाज और मेघ 19 वीं शताब्दी में धार्मिक तथा समाज सुधारक आंदोलनों में आर्य समाज निःसन्देह सबसे महत्वपूर्ण था. स्यालकोट के डस्का शहर में सन् 1884 में और जफ़रवाला में 1887 में आर्यसमाज स्थापित हो चुकी थी. ये दोनों समाजें मेघोद्धार का केंद्र थीं.हिंदू समाज के दमन से तंग आए निम्नजातियों के हिन्दू इस्लाम तथा इसाई धर्म की ओर जाने लगे थे. आर्य समाज के प्रयत्नों से यह प्रवाह कम हुआ. आर्यसमाज के प्रयत्नों के फलस्वरूप हिंदू समाज में अछूतों के साथ कुछ अच्छे सलूक की शुरुआत हुई. आर्यसमाज ने दलितों के उद्धार की ओर भी ध्यान दिया.बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा द्वारा स्यालकोट, गुरदासपुर और गुजरात जिलों में मेघों की शुद्धि के उद्धार का कार्यक्रम आरम्भ किया गया. 1903 में स्यालकोट आर्यसमाज के वार्षिक उत्सव में निश्चित किया गया कि मेघों की शुद्धि का श्रीगणेश कर दिया जाए. सनातनी हिन्दुओं, ईसाइयों और मुसलमानों ने इसका विरोध किया. दिनांक 28-03-1903 को 200 मेघों का शुद्धिकरण किया गया. परंतु आर्यसमाज के इस कार्यको सवर्ण हिन्दू और मुसलमान सहन नहीं कर सके. स्यालकोट के राजपूत और मुसलमान ज़मींदारों के सामने मेघों की स्थिति गुलामों जैसी थी. वे किसी भी दशा में उन्हें बराबरी का दर्जा देने को तैयार नहीं थे. मेघों ने राजपूतों को ‘ग़रीब नवाज़’ कहना छोड़ ‘नमस्ते’ कहना शुरू किया तो उन्हें राजपूतों ने शुद्ध हुए मेघों को लाठियों से पीटा और मुसलमान जमींदारों ने उन्हें अपने कुओं से पानी भरने से रोक दिया. पृथक कुएँ भी नहीं खोदने दिए. मेघों पर झूठे मुकद्दमे चलाए गए. लेकिन शुद्धिकरण का काम बंद नहीं हुआ.

आर्यसमाजी जी-जान से मेघों की सहायता के लिए वचनबद्ध थे. वे उनके साथ खान-पान का व्यवहार करते थे और उनकी शिक्षा के लिएप्रयत्नशील थे. पर्वों और संस्कारों के अवसर पर उनसे मिलते-जुलते थे. आर्यों ने उन्हें ‘मेघ’ के स्थान पर ‘आर्य भगत’ कहना शुरू कर दिया था. मेघों को नया नाम और नई पहचान मिली. वे अनेक प्रकार की दस्तकारी सीख कर अपनी आर्थिक दशा को उन्नत कर सके. मेघ लोग बहुधा खेती-बाड़ी, स्पोर्ट्स, सर्जिकल जैसे कामों में देखे जा सकते थे. इन्होंने अपनी मेहनत से स्यालकोट का नाम रोशन किया. आर्य समाज द्वारा उनके लिए एक दस्तकारी स्कूल भी खोला जो आगे चल कर हाई स्कूल बना दिया गया था. एक आश्रम भी खोला गया जिसमें रहने वाले छात्रों को अपनेघर से केवल आटा ही लाना होता था. अन्य सभी ज़रूरतें आर्यसमाज द्वारा पूरी की जाती थीं. आर्य मेघों ने सभा के तत्वाधान में सात प्राइमरी स्कूल देहात में खोले जिनके कारण मेघों कोशिक्षा प्राप्त करने की अच्छी सुविधा प्राप्त हो हुई. सन् 1906 में स्यालकोट आर्य समाज के प्रधान लाला देवीदयाल ने 2,000 रुपए इनके (शिक्षा) के लिए दान दिए ताकि उस राशि पर प्राप्त सूद से मेघ विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा की व्यवस्था की जा सके. इससे गुरुकुल गुजराँवाला में दो मेघ बालक निःशुल्क दाखिल किए गए और वहाँ उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की.

इससे ‘आर्य भगत’ केसर चन्द के पुत्र ईश्वरदत्त को गुरुकुल में दाखिल करवाया गया और वे उच्च शिक्षा प्राप्त कर सन् 1925 में स्नातक (बी.ए.) बने. सन् 1910 में इसके लिए ‘आर्य मेघोद्धार सभा’ नाम से पृथक सभा स्थापित कर दी गई जिसके प्रधान राय ठाकुर दत्त धवन और मंत्री लाला गंगा राम वकील थे.अछूत समझी जाने वाली जातियों की दुर्दशा को ठीक करने तथा आर्थिक दशा को उन्नत करने के लिए सरकार ने भूमि प्रदान करना निश्चित किया. आर्य मेघोद्धार सभा ने भी मेघों (आर्य भगतों) के लिए सरकार से भूमि प्राप्त करने में सफल हो गए. खानेवाल स्टेशन के पास एक भूखण्ड मेघोद्धार सभा को दिया गया जहाँ ‘आर्य नगर’ नामक एक नई बस्ती बनाने की योजना बनी. बहुत से आर्य भगत वहाँ खेती के लिए बस गए. उन्हें जमीनों का मालिक बनाया गया और जमींदारों के बराबर लाकर खड़ा कर दिया गया. कई सुविधाएँ आने पर आर्यनगर आदर्श बस्ती बन गया. अछूत समझी जाने वाली जातियों की आर्थिक और सामाजिक दशा जिस प्रकार सुधरी उनका अंदाजा बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है.मेघों की दशा सुधारने के प्रयास करने वालों में महाशय रामचन्द्र का स्थान सर्वोपरि है।

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