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शिक्षा/रोजगार

गुरुकुल शिक्षा पद्धति की ओर लौटने की पुकार: हमारी जड़ों की ओर एक पुनर्निवेश*

(✍️बृजेश सिंह तोमर)

👉भारत की महान सभ्यता, जिसकी नींव गुरुकुल शिक्षा पद्धति पर टिकी थी, आज पश्चिमी शिक्षा प्रणाली के दबाव में अपनी पहचान खोती जा रही है। एक समय था जब गुरु शिष्य को न केवल शिक्षा देते थे, बल्कि उसे जीवन जीने की कला, संस्कृति, और संस्कारों से भी अवगत कराते थे। लेकिन आज, लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति ने हमारे बचपन और हमारी संस्कृति को एक ऐसे ढाँचे में ढाल दिया है, जो हमें अपनी ही विरासत से दूर करता जा रहा है।बस्ते के बोझ में दबा कुचला बचपन भविष्य को भी ढोता नजर आ रहा है।

लार्ड मैकाले की योजना भारतीयता को मिटाने की चाल रही थी
लार्ड मैकाले का उद्देश्य स्पष्ट था—भारत को सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक रूप से कमजोर बनाना। उन्होंने कहा था:
“यदि हमें भारत पर शासन करना है, तो हमें उनकी शिक्षा प्रणाली और संस्कृति को बदलना होगा।उनकी शिक्षा पद्धति व संस्कृति को कमतर आंकना होगा,उन पर थोपना होगा।”
आज, वही कल्पना साकार होती दिख रही है। अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली ने हमारी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों को काट दिया है। अंग्रेजी बोलने वाले को ‘इंटेलिजेंट’ और हिंदी बोलने वाले को ‘गंवार’ मानने की मानसिकता समाज में घर कर चुकी है।
हमे मृदु भाषा हिंदी,संस्कृत की चाशनी जैसी मिठास ओर विलायती भाषा अंग्रेजी के रूखेपन को समझना होगा।
क्या अंग्रेजी में वह अपनापन है, जो हमारे रिश्तों की मिठास में रचा-बसा है?
“डेड” और “मॉम” कहने में वह भावनात्मक गहराई कहाँ, जो “माता-पिता” शब्दों में है?
“अंकल” और “आंटी” जैसे सपाट संबोधन क्या “चाचा”, “ताऊ”, “बुआ”, “फूफा” जैसे रिश्तों की गरिमा और आत्मीयता को व्यक्त कर सकते हैं?

हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि संस्कार, संस्कृति, और भावनाओं की अभिव्यक्ति है। यह रिश्तों की जड़ों को मजबूत करती है। वहीं, अंग्रेजी केवल एक माध्यम है, जिसमें भावनाओं की गहराई और अपनी मिट्टी की खुशबू नहीं है।

हम एक बार गुरुकुल प्रणाली में शिक्षा के सम्पूर्ण दृष्टिकोण को भी समझे।
गुरुकुल शिक्षा पद्धति केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी। यह जीवन जीने का आधार थी।संस्कारों की शिक्षा ने विद्यार्थी को जीवन की नैतिकता, संयम, और कर्तव्य का बोध कराया।
व्यवहारिक ज्ञान में कृषि, युद्धकला, चिकित्सा, ज्योतिष, और अन्य कौशल सिखाए जाते थे।संस्कृति का संरक्षण हर विद्यार्थी को अपनी परंपराओं, लोकगीतों, शास्त्रों और इतिहास का बोध कराता था।

हम यू भी समझे कि जब अर्जुन ने गुरुकुल में शिक्षा ली, तो वह केवल धनुर्विद्या में निपुण नहीं हुआ, बल्कि धर्म, नीति, और कर्तव्य को भी समझा। यह शिक्षा ही उसे “महाभारत” के युद्ध में सही निर्णय लेने का आधार देती है।
रामायण में बाबा तुलसीदास जी ने लिखा है”गुरुगृह गये पढ़न रघुराई,अल्प काल सब विधा पाई..”।अर्थात गुरुकुल में पढ़कर प्रभु राम ने अल्प समय मे ही युद्ध,राजकाज,संस्कार,नैतिक शिक्षाएं प्राप्त की पर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये।
हालात यह है कि वर्तमान स्थिति में बचपन खोता हुआ नजर आ रहा है।
बचपन संस्कारों की पहली सीढ़ी है। लेकिन आज ‘विलायती कल्चर’ ने इसे बाजार का उत्पाद बना दिया है।
बच्चे गजेट्स के गुलाम बन गए हैं।पारिवारिक समय की जगह इंटरनेट ने ले ली है।संस्कारों की जगह भौतिकवाद ने ले ली है।
परिणामस्वरूप, सामाजिक दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं—संवेदनशीलता का अभाव, पारिवारिक रिश्तों का क्षरण, और नैतिक पतन आज समाज के सामने है।पीढ़ियों तक साथ रहने बाले कुटुंबा की जगह अब टूटते ओर बिखरते परिवार इसके उदाहरण बनते जा रहे है।

हमे संस्कारधानी गुरुकुल पद्धति की ओर लौटना आज आवश्यक हो गया है।
संस्कारों के पुनर्निर्माण से जीवन के प्रारंभिक वर्षों में सही शिक्षा से एक सशक्त और नैतिक समाज का निर्माण करेगी।
भाषाई गौरव से हिंदी,संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति सम्मान बढ़ेगा।
संस्कृति का संरक्षण होगा।हमारी परंपराएँ और मूल्य अगली पीढ़ी तक सुरक्षित रहेंगे।
समाज में सामंजस्य बैठने से रिश्तों और भावनाओं की डोर मजबूत होगी।
“विद्या विनयेन शोभते”: विद्या विनम्रता से शोभा पाती है। केवल ज्ञान अर्जित करना पर्याप्त नहीं; उसका सही उपयोग ही सच्चा शिक्षित बनाता है।
लोकक्ति है कि”अज्ञानी का धन मूर्ख के हाथों तलवार के समान है”: वर्तमान शिक्षा प्रणाली से हमें केवल ‘डिग्रीधारी’ बनाया जा रहा है, न कि ‘सुसंस्कारी।’

भविष्य की नींव रखने हेतु वर्तमान शिक्षा में परिवर्तन की आवश्यकताअब समय आ गया है कि हम पश्चिमी शिक्षा प्रणाली के मोहजाल से बाहर निकलकर अपनी जड़ों की ओर लौटें। गुरुकुल शिक्षा पद्धति, जो संस्कार, संस्कृति, और व्यवहारिक ज्ञान का मेल है, को पुनर्जीवित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
हिंदी को अपनाए, अपनी संस्कृति को गले लगाए, और आने वाली पीढ़ियों को वह विरासत सौंपे, जो उन्हें गर्व से कहने दे—हम भारतीय हैं।
“गुरुकुल में लौट चलें, अपनी जड़ों से जुड़ चलें।”
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✍️बृजेश सिंह तोमर
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजचिंतक है।)

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