मल्लिकार्जुन खड़गे बनाम भगवाधारी योगी

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डॉ डेलोन नाम के एक फ्रेंच नागरिक को गोवा के पवित्र न्यायाधिकरण में 2 वर्ष कठोर कारावास का दंड भुगतना पड़ा था। इस दंड के लिए उनका अपराध केवल इतना था कि उन्होंने एक युवक से सेंट एंथोनी की मूर्ति बांह से हटाने के लिए कह दिया था, क्योंकि डॉ डेलोन को उस युवक की बांह में स्थित फोड़े की चिकित्सा करनी थी। इस फ्रेंच नागरिक को गोवा न्यायाधिकरण की उस जेल में किस प्रकार की अमानवीय यातनाओं को झेलना पड़ा था ? इसे उसने अपनी डायरी में लिखा है। जिसे पढ़ने से हमें पता चलता है कि वहां बंद कैदियों की निर्मम पिटाई होना प्रतिदिन का ही सिलसिला था। कैदियों को इतनी निर्ममता से पीटा जाता था कि दूसरे कैदियों की भी चीख निकल जाती थी। जिन अंग्रेजों को लोकतंत्र का जनक कहा जाता है , उनके द्वारा मजहब के नाम पर लोगों के साथ किए गए इस प्रकार के अमानवीय दुर्व्यवहार को देखकर निश्चय ही ईसाई संप्रदाय के प्रति लोगों में घृणा के भाव पैदा हो जाते हैं। इसी प्रकार इस्लाम के मानने वालों के ऊपर भी अनेक प्रकार के ऐसे गहरे दाग लगे हैं, जो उन्हें बर्बर आतंकवादी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं । भारत में आने वाले प्रत्येक मुस्लिम आक्रांता ने लगभग एक ही शैली में गैर मुसलमानों पर अमानवीय अत्याचार ढहाने के कीर्तिमान स्थापित किये हैं।
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस ने प्रारंभ से ही ईसाइयों और मुसलमानों के इस प्रकार के अमानवीय अत्याचारों की उपेक्षा की है। देश विभाजन की दुखद घटना हो या किसी दूसरे अवसर पर देश में हुए सांप्रदायिक दंगे हों, हर अवसर पर कांग्रेस ने कभी मुस्लिम लीग के सुर में सुर मिलाया है तो कभी किसी अन्य इस्लामिक संगठन के सुर में सुर मिलाकर ऐसी घटना को करने के लिए हिंदू को कभी बराबर का तो कभी एकतरफा जिम्मेदार ठहराया है।
कांग्रेस के नेताओं के द्वारा ही देश में भगवा आतंकवाद की अवधारणा का झूठा विमर्श बनाकर उसे प्रस्तुत किया गया। ऐसा कांग्रेस की ओर से केवल मुस्लिम वोट प्राप्त करने के लिए किया जाता रहा है। अब इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कॉंग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुंबई की एक चुनावी रैली में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के भगवा वस्त्रो पर अशोभनीय टिप्पणी कर कांग्रेस की हिंदू विरोध की परंपरागत विचारधारा को प्रकट किया है। भगवा से घृणा करने वाली कांग्रेस और कांग्रेस के नेता जहां ईसाइयत और इस्लाम के क्रूर चेहरे को ढकने का प्रयास करती रही है, वहीं वह हिंदू समाज को अपमानित कर नीचा दिखाने के किसी अवसर को भी चूकती नहीं है। कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ऊंचा पद प्राप्त करने के उपरांत भी कई बार अपने पद की गरिमा के विरुद्ध बयान दिए हैं। वह अपने मौलिक स्वभाव में स्पष्ट वक्ता नहीं हैं , परंतु कांग्रेस के एक विशेष परिवार की वाहवाही लेने के लिए वे स्पष्ट वक्ता बनने के चक्कर में अपनी स्वयं की चाल ही भूल जाते हैं। अब उन्होंने कह दिया है कि कई नेता साधु वेश में रहते हैं और इस वेश में रहते हुए अच्छे राजनीतिज्ञ भी बन गए हैं, उनके सिर पर बाल भी नहीं हैं । अब राजनेता बन गए हैं। कुछ तो मुख्यमंत्री भी बन गए हैं।” स्पष्ट है कि उनका संकेत योगी आदित्यनाथ की ओर रहा है , जो कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और सिर पर बाल नहीं रखते हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे की बहकी हुई जबान यहीं पर नहीं रुकी, वह और भी आगे बढ़ गए और उन्होंने भाजपा को सचेत करते हुए यह भी कह दिया कि उनके नेता सफेद कपड़े पहनें अथवा वे संन्यासी हैं तो गेरूए कपड़े पहनें और राजनीति से बाहर हो जाएं ,उसकी पवित्रता क्या रह गई ?
राजनीति में राजधर्म के निर्वाह की मर्यादा की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा है। जिसे राजनीति का क, ख, ग सीखने वाला तीसरी चौथी कक्षा का विद्यार्थी भी भली प्रकार समझ सकता है, परंतु यह व्यक्ति की स्वयं की गंभीरता पर निर्भर करता है कि वह बड़ा पाठ तीसरी चौथी की कक्षा में पढ़ लेता है या बड़ा पाठ पढ़ने की प्रतीक्षा में उसका जीवन ही निकल जाता है। राजनीति में रहकर जो व्यक्ति बड़ा पाठ पढ़कर बड़ा काम करने की प्रतीक्षा करता है, वह कभी राजनीतिज्ञ से राजनेता नहीं बन पाता। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत की राजनीति में ऐसे कई नेता रहे हैं, जिनके पास पद तो बड़े रहे हैं परंतु उनके अपने कद उस पद की गरिमा के अनुकूल नहीं बन पाए। इतिहास ऐसे लोगों को कूड़ेदान में फेंक दिया करता है, क्योंकि जब इतिहास किसी व्यक्तित्व का निरीक्षण, परीक्षण और समीक्षण करता है तो उसके अपने कुछ नियम उपनियम होते हैं, उनके अनुसार ही वह व्यक्तित्व का मूल्यांकन करता है और उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय या गैर अनुकरणीय घोषित करता है। मल्लिकार्जुन खड़गे को इतिहास की इस रीति नीति का ज्ञान होना चाहिए। आज जब वह कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तो उन्हें इस संगठन को मजबूती से खड़ा करने के लिए इसकी कुछ प्रचलित परंपराओं और विचारधारा की विसंगतियों को दूर करने के प्रति गंभीर होना चाहिए। जिनके कारण देश के विभाजन की पीड़ा को हमें देखना – झेलना पड़ा। उन्हें समझना चाहिए कि 2014 में कांग्रेस को सत्ता से दूर फेंक कर देश की जनता ने इतिहास की एक परिक्रमा को पूर्ण होते देखा है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस को आत्मावलोकन करने की आवश्यकता थी। आत्मावलोकन का यह अर्थ नहीं कि उसने एक गैर नेहरू गांधी परिवार के व्यक्ति को संगठन की बागडोर सौंप दी है। सभी जानते हैं कि जिस व्यक्ति को मल्लिकार्जुन खड़गे के रूप में यह बागडोर सौंपी गई है, वह आज भी परिवार की परिक्रमा से बाहर अपने स्वतंत्र अस्तित्व की खोज में लगा हुआ है।
स्पष्ट है कि जिस नेता का आज तक अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं बन पाया, वह राजनीति में धुरंधर की भूमिका निभा रहा है। यह अलग बात है कि वह स्वयं ही अपने आपको धुरंधर मान रहा है और लोग उसके धुरंधर होने पर बड़े-बड़े प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। अपने स्वतंत्र अस्तित्व की खोज करने वाले खड़गे की उक्त टिप्पणी से यह प्रमाणित हो गया है कि वह अभी भी परिवार की परिक्रमा के बाहर निकल नहीं पाए हैं।
श्री खड़गे को यह ज्ञात होना चाहिए कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में रहते हुए घोटालों के कीर्तिमान स्थापित न करती तो आज केंद्र में मोदी की सरकार नहीं होती और न ही उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ कहीं दिखाई देते। यदि आज इन लोगों के चेहरे अग्रिम पंक्ति में दिखाई देने लगे हैं तो इसके पीछे कांग्रेस के पापपूर्ण आचरण की राजनीति ही महत्वपूर्ण कारण रही है।
कांग्रेस को चाहिए कि योगी आदित्यनाथ के भगवाधारी होने पर प्रश्नचिह्न लगाने की बजाय उनके भ्रष्टाचार में लिप्त होने के प्रमाण देश की जनता को दे। जहां तक किसी बात पर भगवा के लज्जित होने की बात है तो कांग्रेस के मल्लिकार्जुन खड़गे को यह भी ज्ञात होना चाहिए कि जितना पवित्र भगवा है, उतना ही पवित्र सफेद वस्त्र भी है। जिसे पहनकर कांग्रेस के नेता खादी में रहकर देश की बर्बादी के प्रतीक बन गए। इस खादी को कभी देश की जनता उतने ही सम्मान से देखा करती थी , जितने सम्मान से आज भगवा को देखती है या प्राचीन काल से देखती आ रही है। मल्लिकार्जुन खड़गे को इस समय इस बात पर भी चिंता व्यक्त करनी चाहिए कि उनकी पार्टी के राहुल गांधी जिस प्रकार कांग्रेस की परंपरागत धोती कुर्ता और टोपी को छोड़कर पश्चिमी ढंग के कपड़ों को पहनकर राजनीति में नये मूल्यों का बीजारोपण कर रहे हैं, वह कितना उचित है ?
उन्हें देश की जनता को इस बात के लिए आश्वस्त करना चाहिए कि अब यदि उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो वह किसी भी प्रकार के घपले घोटालों में संलिप्त नहीं होगी अपितु देश के विकास को प्राथमिकता देगी। माना कि वह योगी आदित्यनाथ को अपना आदर्श नहीं मान सकते, परंतु मन ही मन उनकी कार्य शैली और देश के खजाने के प्रति उनकी सत्य निष्ठा को अवश्य अपना सकते हैं।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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