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आज का चिंतन

परमात्मा के साथ अपनी सर्वमान्य संगति की चेतना को किस प्रकार बनाकर रखा जाये?

परमात्मा के ऊर्जा रूप की तुलना भिन्न-भिन्न वस्तुओं जीवों से किस प्रकार की जाती है? (2)
परमात्मा के साथ अपनी सर्वमान्य संगति की चेतना को किस प्रकार बनाकर रखा जाये?

दाधार क्षेममोको न रण्वो यवो न पक्वो जेता जनानाम।
ऋषिर्न स्तुभ्वा विक्षु प्रशस्तो वाजी न प्रीतो वयो दधाति।।
ऋग्वेद मन्त्र 1.66.2 (कुल मन्त्र 754)

(दाधार) धारण करता है (क्षेमः) कल्याण (ओकः) घर (न) जैसे कि (रण्वः) रमणीय, संतुष्टि देने वाले (यवः) जौ (न) जैसे कि (पक्वः) परिपक्व भोजन (जेता) विजेता (जनानाम) मनुष्यों के लिए (ऋषिः) ऋषि, द्रष्टा (न) जैसे कि (स्तुभ्वा) सम्मान के योग्य (विक्षु) लोगों में (प्रशस्ता) प्रशंसनीय (वाजी) युद्ध का रथ (न) जैसे कि (प्रीतः) प्रसन्नता और प्रशंसा का निर्माता (परमात्मा) (वयः) उत्तम और दीर्घ आयु
(दधाति) धारण करता है, देता है।

व्याख्या:-
परमात्मा के ऊर्जा रूप की तुलना भिन्न-भिन्न वस्तुओं जीवों से किस प्रकार की जाती है? (2)

परमात्मा की अभव्यिक्तियों को जारी रखते हुए, यह मन्त्र परमात्मा के कुछ अन्य लक्षणों को सूचीबद्ध करता है जो भिन्न-भिन्न शक्तियों के साथ तुलना के योग्य है:-
8. (दाधार क्षेमः) वह सबके कल्याण को धारण करता है।
9. (ओकः न रण्वः) उसकी संगति हमारे घर की तरह आनन्ददायक और आराम पहुंचाने वाली है।
10. (यवः न पक्वः) वह जौ की तरह परिपक्व भोजन है।
11. (जेता जनानाम) वह मानवों के लिए विजय का विजेता है।
12. (ऋषिः न स्तुभ्वा) वह साधुओं और द्रष्टाओं की तरह पूजनीय है।
13. (विक्षु प्रशस्ता) वह लोगों में प्रशंसनीय है।
14. (वाजी न प्रीतः) वह युद्ध रथ की तरह प्रसन्नता और प्रशंसा का निर्माता है।
15. (वयः दधाति) वह उत्तम और दीर्घ आयु धारण करता है और प्रदान करता है।

जीवन में सार्थकता: –
परमात्मा के साथ अपनी सर्वमान्य संगति की चेतना को किस प्रकार बनाकर रखा जाये?

सर्वोच्च ऊर्जा, परमात्मा वास्तव में हमारा सर्वमान्य सहचर है, क्योंकि वह सदैव और प्रतिक्षण हमारे साथ रहता है। परन्तु हम उसकी इस स्थाई संगति को अपनी चेतना में बनाये रखने में असफल हो जाते हैं, क्योंकि हमारे मन के अन्दर और आस-पास अज्ञानता का आवरण होता है जो इसे अपने व्यक्तिगत अस्तित्व और शक्ति को महसूस करने के लिए प्रभावित करता है। अतः परमात्मा के साथ इस सर्वमान्य संगति की चेतना के साथ ही हम अपने मन को उस वास्तविक ‘मैं’ पर केन्द्रित करने के लिए प्रकाशित करते हैं जिससे हम अपने अवास्तविक ‘मैं’ अर्थात् अपने नाम और रूप को भूल सकें।
सूक्ति: – उपरोक्त सभी लक्षण।


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