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इतिहास के पन्नों से

भारतीय इतिहास के महानायक

रामायण कालीन ऋषि शरभंग

भारत में रामायण काल में एक महान तपस्वी ऋषि थे जिनका नाम शरभंग था। शरभंग उस समय तपोबल में बहुत अधिक ऊंचाई को प्राप्त कर चुके थे। वे संपूर्ण भारतवर्ष में वैदिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार के कार्य में लगे हुए थे। यद्यपि राक्षस प्रवृत्ति के लोग उनके इस प्रकार के परोपकारी कार्य में अनेक प्रकार के विघ्न डालते थे। उस समय मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम दंडकारण्य में पधार चुके थे और शरभंग ऋषि ने उनके विषय में बहुत कुछ सुन लिया था। वह श्री रामचंद्र जी के दर्शन कर उन्हें राक्षसों के संहार के लिए प्रेरित करके संसार से जाने का मन बना चुके थे। जब रामचंद्र जी उनके आश्रम में पहुंचे तो उनसे पर्याप्त विचार-विमर्श करके यज्ञ के उपरांत उन्होंने स्वेच्छा से अपना शरीर अग्नि को समर्पित कर दिया था।

महान देशभक्त राजर्षि चाणक्य

जिस समय सिकन्दर संसार से विदा ले रहा था उस समय उसके साम्राज्य में इतिहासकारों की मान्यताओं के अनुसार मैसीडोनिया,सीरिया, बैक्ट्रिया, पार्थिया, आज का अफ़ग़ानिस्तान एवं उत्तर पश्चिमी भारत के कुछ भाग सम्मिलित थे। सिकन्दर के देहान्त के पश्चात सेल्युकस ने इस विशाल साम्राज्य की देखभाल करने का प्रयास किया, परंतु वह अपने इस प्रयास में सफल नहीं हो सका। क्योंकि उसके साम्राज्य की चूलों को हिलाने के लिए उस समय मां भारती की कोख से जन्मे एक ऐसे वीर सपूत, रणनीतिकार ,देशभक्त क्रांतिकारी राजर्षि चाणक्य का आविर्भाव हो चुका था जिसने चंद्रगुप्त मौर्य के साथ मिलकर सिकंदर के पापों से जन्मे साम्राज्य को छिन्नभिन्न करने के लिए अपनी रणनीति पर सफलतापूर्वक काम करना आरंभ कर दिया था।

राष्ट्रीय चेतना के उत्प्रेरक आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य जी ने जगन्नाथपुरी, उज्जियिनी, द्वारका, कश्मीर, नेपाल, बल्ख, काम्बोज तक की यात्रा की और भारतीय वैदिक धर्म का डिण्डिम् घोष किया। उनके इस स्वरूप की आराधना आगे चलकर नरेन्द्र देव ने की तो वह नरेन्द्र से विवेकानंद हो गया और वैदिक धर्म को पुन: सत्य रूप में स्थापित करने का बीड़ा युवा मूल शंकर (जिसका मूल ही शंकर था) ने उठाया तो वह मूलशंकर से महर्षि दयानंद हो गया। उनके देश भ्रमण के काल में जहां-जहां उसके कदम पड़े वहां-वहां देशभक्ति के रस से सराबोर ऐसी ‘वनस्पतियां’ उगीं कि उनके रस को पी-पीकर अनेकों के जीवन में भारी परिवर्तन आ गया और देश उस अमृत के अमृतत्व के कारण स्वराज्य के लिए सदा संघर्षरत रहा।

देश ,धर्म के रक्षक स्वामी विरजानंद जी महाराज

स्वामी विरजानंद जी महाराज एक ऐसी महान विभूति थे जिन्होंने 18 57 की क्रांति का सूत्रपात करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्होंने उस 1855 में मथुरा में आयोजित किए गए धर्म योद्धाओं के एक विशाल सम्मेलन को संबोधित करते हुए अपना तेजस्वी भाषण देकर क्रांति की आग को फैलाने में सक्रिय भूमिका निभाई थी। स्वामी दयानंद जी महाराज को अपने आश्रम से विदा करते समय भी उन्होंने देश ,धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए उनका जीवन गुरु दक्षिणा में मांग लिया था। उनकी इस मशाल को स्वामी दयानंद जी महाराज के आर्य समाज धर्मवीरों ने अपने लिए गुरु का संदेश मानकर आजीवन निर्वाह आते हुए अपने अनेक बलिदान दिए।

देश धर्म के महान योद्धा स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज

स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज का नाम आते ही एक अजेय वीर और आर्य योद्धा संन्यासी का चित्र अनायास ही आंखों के सामने आ जाता है। अपनी पराक्रम शक्ति के कारण स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज अंग्रेजों के लिए उस समय सचमुच अजेय हो गए थे। जिन्होंने दिल्ली के चांदनी चौक में एक विशाल जुलूस का नेतृत्व करते हुए अपना सीना अंग्रेजों की संगीनों के सामने तान दिया था और जोरदार शब्दों में अंग्रेजों के पौरुष को ललकारते हुए कहा था कि यदि आपके भीतर साहस है तो चलाओ गोली।
उन्होंने शुद्धि के माध्यम से लाखों लोगों की घर वापसी कराई थी। इसके अतिरिक्त करोड़ दलितों को हिंदू से मुसलमान बनने से रोकने में सफलता प्राप्त की थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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