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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गुर्जरों के शौर्य की कहानी :पाकिस्तानी रिटायर्ड मेजर की जवानी

गुर्जर जाति भारत की क्षत्रिय जातियों में गिनी जाती है इसके शौर्य और वीरता की भाग विदेशी आक्रमण कार्यो ने भी मानी थी। इसकी वीरता और शौर्य का उल्लेख करते हुए पाकिस्तान के रिटायर्ड मेजर जनरल मुकीश खान ने अपनी पुस्तकcrisis of leadership ’ में लिखा है कि, भारतीय सेना का एक अभिन्न अंग होते हुए भी,भारतीय सेना गुज्जरो के शौर्य से अनजान ही रही ,cक्योंकि…..’घर की मुर्गी दाल बराबर ! ’
पाकिस्तान का यह सेवानिवृत मेजर गुर्जरों की वीरता और उनके शौर्य से भली प्रकार परिचित था। इसलिए उसने बड़े दुख के साथ उपरोक्त पंक्तियां लिखी। वह जानता था कि विषम परिस्थितियों में भी गुर्जर जाति के सैनिक देश, धर्म और संस्कृति के प्रति अपने कर्तव्य को पूरी तन्मयता के साथ निभाते हैं। यदि सर्व खाप पंचायत का इतिहास नामक पुस्तक का अवलोकन किया जाए तो उसके लेखक निहाल सिंह आर्य जी ने गुर्जर जाति के शौर्य और पराक्रम पर खुलकर लिखा है। इस पुस्तक के अध्ययन से पता चलता है कि पिछले 2000 वर्ष के कालखंड में जब-जब भी मां भारती पर किसी प्रकार का संकट आया तब तब गुर्जर जाति के वीर सपूतों ने अपनी जान की बाजी लगाकर देश की सेवा की। ऐसी परिस्थितियों में स्वाधीन भारत की सरकारों को गुर्जर जाति के शौर्य और पराक्रम को समझना चाहिए था और भारतीय सेवा में उसे विशेष पहचान मिलनी चाहिए थी।
पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल मुकीश खान ने अपनी पुस्तक‘ Crisis of Leadership’के पृष्ठ २५० पर गुर्जरों के बारे में विशेष रूप से लिखते हैं ध्यान रहे की 1971 की भारत पाकिस्तान की लड़ाई के दौरान पाकिस्तान के इस रिटायर्ड मेजर जनरल की गुर्जर सपूतों से मुठभेड़ हुई थी। उसको याद करते हुए ही उन्होंने लिखा है कि, “हमारी हार का मुख्य कारण था, हमारा गुज्जरो से आमने सामने का युद्ध था! हम उनके आगे कुछ भी करने में असमर्थ थे! *गुज्जर बहुत बहादुर हैं
और उनमें शहीद होने का एक विशेष जज्बा—एक महत्वाकांक्षा है! वे अत्यंत बहादुरी से लड़ते हैं और उनमें सामर्थ्य है कि अपने से कई गुना संख्या में अधिक
सेना को भी परास्त कर सकते हैं!”
गुर्जर वीर सपूतों के बारे में पाकिस्तान के इस सेवा अधिकारी ने जो कुछ भी लिखा है वह सत्य ही है, क्योंकि गुर्जर समाज के वीर सपूतों ने कभी भी देश के साथ गद्दारी करने को उचित नहीं माना। जबकि स्वाधीन भारत की सरकारें उस जाति को अधिक सम्मान देने के लिए लालायित दिखाई देती रही हैं जो समाज में या तो अशांति फैलाऐं या फिर अपनी मांगों की सूची को दिन प्रतिदिन सुरसा की आंतों की तरह लंबी करती चली जाएं ।जिन लोगों ने अलग देश की मांग की है या राष्ट्रद्रोहियों का साथ दिया है, तुष्टिकरण की आदी हो चुकी भारतीय राजनीति उन उन जातियों का ही अधिक तुष्टीकरण करती हुई दिखाई देती है। जबकि देश की मुख्यधारा के साथ काम करने वाली गुर्जर जाति के सम्मान की ओर सरकारों का ध्यान नहीं गया।
पाकिस्तानी सेवा अधिकारी आगे लिखते हैं कि……..
‘३ दिसंबर १९७१ को हमने अपनी पूर्ण क्षमता और
दिलेरी के साथ अपने इन्फैंट्री ब्रिगेड के साथ भारतीय सेना पर हुसैनीवाला के समीप आक्रमण किया! हमारी इस ब्रिगेड में पाकिस्तान की लड़ाकू बलूच रेजिमेंट और जाट रेजिमेंट भी थीं !और कुछ ही क्षणों में हमने भारतीय सेना के पाँव उखाड़ दिए और उन्हें काफी पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया! उनकी महत्वपूर्ण सुरक्षा चौकियां अब हमारे कब्ज़े में थीं! भारतीय
सेना बड़ी तेजी से पीछे हट रही थीं और पाकिस्तानी सेना अत्यंत उत्साह के साथ बड़ी तेजी से आगे बढ रही थी! हमारी सेना अब कौसरे – हिंद पोस्ट के समीप पहुँच चुकी थी! भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी वहां उस पोस्ट की सुरक्षा के लिए तैनात थी और इस टुकड़ी के सैनिक गुज्जर बटालियन से संबंधित थे!
एक छोटी सी गिनती वाली गुज्जर बटालियन ने लोहे की दीवार बन कर हमारा रास्ता अवरुद्ध कर दिया ! उन्होंने हम पर भूखे शेरों की तरह और बाज़ की तेजी से आक्रमण किया! ये सभी सैनिक गुज्जर थे! यहाँ एक आमने-सामने की, आर-पार की,सैनिक से सैनिक की लड़ाई हुई! इस आर-पार की लड़ाई में भी गुज्जर सैनिक इतनी बेमिसाल बहादुरी से लड़े कि हमारी सारी
महत्वाकांक्षाएं, हमारी सभी आशाएं धूमिल हो उठीं, हमारी उम्मीदों पर पानी फिर गया ! हमारे सभी सपने चकना चूर हो गये!’
मां भारती के वीर सपूत गुर्जर जाति के शूरवीरों के कारण देश को 1971 के युद्ध में जीत मिली। इसका सेहरा बंधवाने के लिए भी गुर्जर समाज के लोगों ने कभी अपना सर आगे नहीं किया। क्योंकि उनके लिए राष्ट्र सदा प्रथम रहा है। उन्होंने राष्ट्र की वंदना की है। धर्म की साधना की है और संस्कृति की उपासना करने को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया है। इसलिए वह भली प्रकार यह जानते हैं कि देश धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए उनकी ओर से जो कुछ भी किया जाता रहा है या किया जाता रहेगा, वह केवल कर्तव्य भाव से समर्पित होकर ही किया जाता रहेगा। इसका सेहरा बंधवाने के लिए यानी उसकी कीमत वसूल करने के लिए वह कभी अपने आप को आगे करके छोटा काम नहीं करेंगे। गीता के कर्म योग को अपने जीवन की साधना समझ कर काम करने वाली गुर्जर जाति के इन वीर सपूतों के प्रति इस सब के उपरांत भी समाज सरकार और राष्ट्र का विशेष दायित्व बनता है। जिस पर विचार किया जाना समय की आवश्यकता है। विशेष रूप से तब जब पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों के भीतर भी इस जाति के प्रति और इसके शौर्य के प्रति विशेष सम्मान का भाव हो।
पाकिस्तान का उपरोक्त सैन्य अधिकारी आगे लिखता है कि ” इस जंग में बलूच रेजिमेंट के लेफ्टिनेंट कर्नल गुलाब हुसैन शहादत को प्राप्त हुए थे! उनके साथ ही मेजर मोहम्मद जईफ और कप्तान आरिफ अलीम भी अल्लाह को प्यारे हुए थे! उन अन्य पाकिस्तानी सैनिकों की गिनती कर पाना मुश्किल था जो इस जंग में शहीद हुए ! हम आश्चर्यचकित थे मुट्ठीभर गुज्जरो
के साहस और उनकी इस बेमिसाल बहादुरी पर! जब हमने इस तीन मंजिला कंक्रीट की बनी पोस्ट पर कब्जा किया, तो गुज्जर इस की छत पर चले गये, जम कर हमारा विरोध करते रहे —
हम से लोहा लेते रहे! सारी रात वे हम पर फायरिंग करते रहे और सारी रात वे अपने उदघोष, अपने जयकारे’ से आकाश गुंजायमान करते रहे! इन गुज्जर सैनिकों ने अपना प्रतिरोध अगले दिन तक जारी रखा, जब तक कि पाकिस्तानी सेना के टैंकों ने इसे चारों और से नहीं घेर लिया और इस सुरक्षा पोस्ट को गोलों से न उड़ा डाला!
वे सभी मुट्ठी भर गुज्जर सैनिक इस जंग में हमारा
मुकाबला करते हुए शहीद हो गये, परन्तु तभी अन्य गुज्जर सैनिकों ने तोपखाने की मदद से हमारे टैंकों को नष्ट कर दिया! बड़ी बहादुरी से लड़ते
हुए, इन गुज्जर सैनिकों ने मोर्चे में अपनी बढ़त कायम
रखी और इस तरह हमारी सेना को हार का मुंह देखना पड़ा! ‘…..अफ़सोस ! इन मुट्ठी भर गुज्जर सैनिकों ने हमारे इस महान विजय अभियान को हार में बदल डाला, हमारे विश्वास और हौंसले को चकनाचूर करके रख डाला! ऐसा ही हमारे साथ ढाका
(बंगला-देश) में भी हुआ था! जस्सूर की लड़ाई में
गुज्जरो ने पाकिस्तानी सेना से इतनी बहादुरी से प्रतिरोध किया कि हमारी रीढ़ तोड़ कर रख दी, हमारे पैर उखाड़ दिए ! यह हमारी हार का सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण कारण था !”
मित्रों ! 1971 के युद्ध में लेखक के ज्येष्ठ भ्राता मेजर वीर सिंह आर्य भी एक सैनिक के रूप में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ने वाले शूरवीरों में सम्मिलित थे। जब हम अपने गुर्जर समाज के वीर सैनिकों के इस प्रकार के वीर कृत्यों की कहानी को एक पाकिस्तान के रिटायर्ड सैन्य अधिकारी के माध्यम से सुन रहे हैं तो विशेष गौरव का अनुभव हो रहा है। मुझे इसलिए भी कि मेरे अग्रज भी मां भारती की सेवा के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर अपनी वीरता का प्रदर्शन कर रहे थे। यद्यपि हिंदू समाज के लिए जातिवादी दृष्टिकोण अपनाया जाना उचित नहीं है, हमें अपने पूर्वजों की भांति राष्ट्र प्रथम के कर्तव्य बोध को ही अग्रणी रखकर काम करना अपेक्षित है। परंतु इसके उपरांत भी मुझे अपने अग्रज वीर सिंह आर्य जी का अनुज होने पर ही गर्व नहीं है बल्कि देश धर्म और संस्कृति के प्रति समर्पित रहकर कर्तव्य कर्म करने वाली और गीता के कर्म योग में विश्वास रखने वाली इस गुर्जर जाति में जन्म लेने पर भी गर्व है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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