स्वामीनारायण छपिया मंदिर परिसर के बाहर के प्रसादी स्थल

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आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

छपिया स्वामी नारायण संप्रदाय के प्रर्वतक घनश्याम महाराज की जन्म और बचपन की कर्मस्थली है। हर साल कार्तिक पूर्णिमा और चैत्र पूर्णिमा (कार्तिक और चैत्र मास की पूर्णिमा) पर यहां विशाल मेला लगता है, जिसमें हर साल दुनिया के हर हिस्से से लाखों तीर्थयात्री इस स्थान पर आते हैं। छपिया के मुख्य परिसर के आलावा लगभग दो दर्जन प्रसादी स्थल है जहां श्रद्धालु दर्शन कर अपना जीवन धन्य करते हैं।

1 .मीन सरोवर झील

तरगांव निवास करते हुए आस पास के दर्जनों स्थलों को पावन करते हुए लीला दिखाई थी। सम्वत 1845 में मीन सरोवर पर ये लीला रची गई थी। मीन सरोवर वह स्थान है जहाँ स्वामी नारायण ने मछुआरों को आजीविका के लिए मछलियाँ न मारने की शिक्षा दी थी। यह छोटी झील गर्मियों के दौरान सूख जाती है।

 एक बार, घनश्याम अपने मित्रों के साथ मीन झील में तैर रहे थे, उन्होंने एक मछुआरे को अपनी पकड़ी हुई मछलियाँ टोकरी में खाली करते देखा। अहिंसा के प्रबल समर्थक, घनश्याम को मछलियों को अपने जीवन के लिए छटपटाते देखकर बहुत दुख हुआ।

   उन्होंने दयापूर्वक मृत मछलियों की ओर देखा, और वे तुरंत जीवित हो गईं।  

इसलिए तालाब को मीन सरोवर के नाम से जाना जाता है।

 उन्होने मछूवे से कहा,”भाई ये सृष्टि भगवान के द्धारा निर्मित है। हम किसी प्राणी को ना तो मार सकते हैं और ना ही उन्हे किसी तरह का कष्ट ही पहुंचा सकते हैं। हर प्राणी को अपने कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। पाप कर्म का फल तुरंत भले ही ना मिले परन्तु उसे नर्क का वास जरूर मिलता है।”

 मछुआरा क्रोधित हो गया और अपना जाल लेकर घनश्याम पर झपटा। तब मीन सरोवर में स्वामीनारायण द्वारा मछुवे को दर्शन देने की लीला दिखाई गई। अपनी उँगलियों के इशारे से, घनश्याम ने मछुआरे को समाधि में भेज दिया था। 

 समाधि में, मृत्यु के देवता यम मछुआरे के सामने प्रकट हुए और उसे दिखाया कि निर्दोष लोगों की जान लेने के उसके पाप पूर्ण कार्य का फल उसे नरक में कष्ट भोगना पड़ेगा। वहां तरह तरह के दंड प्राणियों को दिए जा रहे थे। 

उसे भी दंड भुगतना पड़ा था। उसे जब दण्ड दिया जाने लगा तो उसकी काया उछलने लगी थी। वह घनश्याम प्रभु को कातर ध्वनि में पुकारा। 

यह देखकर कि मछुआरे को मछली मारने का पूरा पश्चाताप हो रहा है।मछुआरे ने घनश्याम से क्षमा माँगी। घनश्याम ने दया करके मछुआरे को उसकी समाधि से बाहर निकाला। 

वह नरक यातना का वर्णन करके प्रभु को कभी पाप ना करने का बचन दिया। 

मछुआरे को घनश्याम की महानता का एहसास हुआ, उसने उनके चरणों में सिर झुकाया और फिर कभी मछली न मारने की कसम खाई।

 प्रभु ने अपने चमत्कारों से उन जीवो को जीवित कर दिया और मछुआरे को निर्देश दिया कि वह जीविका के लिए मछलियों को न मारे।     

  स्वामीनारायण ने समाज को भक्ति के माध्यम से मोक्ष और परम ज्ञान की प्राप्ति के बारे में मछुवे समाज को सिखाया। उन्होंने समाज में दलितों के उत्थान के लिए काम किया। घनश्याम ने छोटी उम्र से ही ऐसे कई हिंदू आदर्श और मूल्य स्थापित किए।

2.काली दत्त उद्धार स्थल

ज्येष्ठ मास में कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि दिनांक 19 जून 1783 शुक्रवार धनिष्ठा नक्षत्र में बालप्रभु तीन माह 12 दिन के होने पर छपिया के नारायण सरोवर के तट पर चौलकरन (मुण्डन संस्कार) हुआ था। पिताजी ने एक अद्वितीय भोज का आयोजन किया था।

 अभी भोजन का कार्यक्रम चल रहा था। धर्मदेव अपने लोगों के साथ बैठे हुए थे। भक्ति माता सब लोगों के भोजन व्यवस्था में लगी हुई थी। 

  चंचल बच्चे दोपहर के भोजन के बाद जल्दी में भोजन करके घनश्याम महराज को लेकर सरोवर के किनारे खेलने चले गए थे। खेलते हुए वे बच्चे, अपने उस प्रिय बच्चे को साथ लेकर शाम के समय पास के नगर के बगीचे में गए। वहां आमों का बगीचा देखकर, पेड़ से गिरे पके आमों को खाकर वे बहुत प्रसन्न हुए। 

 वे एक वृक्ष के नीचे घनश्याम को रखा और जामुन की तलाश में और आगे बढ़ गए जो कलिदत्त का इलाका था।प्रभु का दूर का मामा कालीदत्त इस अवसर की ताक में बैठा था। वह प्रभु को ईर्ष्या और द्वेष बस मारना चाहता था। वह प्रभु को वृक्ष के नीचे जब पकड़ने गया तब प्रभु कालीदत्त को एक भयानक आग की तरह दिखाई दिये। वहां जाते ही वह जलने लगा। इसलिए वह अपने प्रयास में पीछे हट गया। 

 वह अपने जादू और काली तंत्र कला का उपयोग करने का फैसला किया। वह अपने तंत्र के प्रयोग से आंधी और झंझावात फैलाया। वृक्ष और टहनियां टूट कर गिरने लगी।बिजली चमक रही थी। मूसलाधार भारी बारिश हो रही थी। कई पेड़ गिर गए। कई जीव-जंतु और पक्षी मर गए। चारों ओर घना अंधेरा छा गया था। कोई भी किसी का चेहरा नहीं देख सकता था।

कालीदत्त इस अवसर का लाभ उठाया। उसने ऐसी माया रची कि वह विशालकाय शरीर के साथ उस आम के वृक्ष पर गिर पड़ा जिसके नीचे घनश्याम बैठा था। वह आम का वृक्ष घनश्याम पर गिर पड़ा। आम का पेड़ कालीदत्त जैसा दुष्ट नहीं था। वृक्ष घनश्याम पर गिर पड़ा और उसे छतरी की तरह सुरक्षित ढक लिया। अब घनश्याम को तूफान और वर्षा से पूरी सुरक्षा मिल गई थी। कालीदत्त स्तब्ध रह गया। वह उसे पकड़ने के लिए फिर दौड़ा, जब उसने देखा कि घनश्याम जीवित है। 

कालीदत्त प्रभु के समीप आ गया। मंद मुस्कान के साथ प्रभु ने तीव्र दृष्टिपात किया। जैसे ही उसकी नजर घनश्याम से मिली, वह भूत-प्रेत से ग्रस्त व्यक्ति की तरह इधर-उधर भागने लगा।असुर अपना मान भान खोकर वृक्ष से टकरा कर गिर गया। धरा कांपने लगी। उसके दोनों नेत्रों से खून की धारा निकलने लगी।मुख से भी खून की उल्टी करने लगा। चक्रवात में गिर रहे एक वृक्ष के नीचे दबकर वह मर गया।

तूफान और वर्षा बंद हो गई। इस बीच माता-पिता अपने बच्चों की तलाश में बाहर आ गए। सभी माता-पिता लालटेन और मशालें लेकर बाहर आ गए। उन्होंने अपने बच्चों के नाम पुकारे।

धर्मदेव और भक्तिमाता भी घनश्याम की तलाश में बाहर आ गए थे। घनश्याम की बुआ सुन्दरीबाई, जो घनश्याम से बहुत प्रेम करती थीं, भी घनश्याम की खोज में निकली थीं। घनश्याम के सबसे बड़े भाई रामप्रतापभाई भी अपने छोटे भाई घनश्याम की खोज में निकले थे।

गाँव के अन्य बच्चे मिल गये, परन्तु घनश्याम नहीं दिखा। बच्चों ने अपने माता-पिता को बताया कि उन्होंने घनश्याम को आम के पेड़ के नीचे देखा था, और उसके बाद क्या हुआ, उन्हें नहीं मालूम।

   यह सुनकर सुन्दरीबाई बहुत डर गयीं। वे दौड़कर आम के पेड़ के पास पहुँचीं। उन्होंने देखा कि बालक घनश्याम इस प्रकार खेल रहा था, मानो कुछ हुआ ही न हो। "हरि मिल गया। हरि मिल गया।" बुआ सुन्दरीबाई चिल्लायीं।      

 भक्तिमाता और अन्य लोग वहाँ दौड़े। बुआ सुन्दरीबाई ने बालक घनश्याम को उठाकर भक्तिमाता की गोद में दे दिया। माता की खुशी का ठिकाना न रहा।उन्होंने एक बहुमूल्य हार उतारकर सुन्दरीबाई को दे दिया। घनश्याम को पा लेने की खुशी से बढ़कर कोई चीज अनमोल नहीं है। कालीदत्त को मृतक तथा घनश्याम को मंद मुसकान बिखेरते सकुशल पा सभी गांव वासियों के खुशी का ठिकाना ना रहा। वे प्रभु को उठाकर अपने घर ले आए।

3.त्रिकोणिय खेतार, मुदाडीह छपिया

यह स्थान नारायण सरोवर के दक्षिण एक खेत के बाद है। वह स्थान है जहाँ घनश्याम ने पक्षियों को समाधि में भेजा था। वे घास के स्थान पर पेहटुल तोड़ने की लीला किए थे। इसी खेत में कड़वे पेहटुल का मीठा स्वाद भी किए थे। यह बहुत ही कल्याणकारी और दिव्य प्रसादी स्थल है। इस खेत से संबंधित तीन प्रमुख घटनाएं घटित हुई थी।

1.पक्षियों को समाधि में भेजना

चिड़ियों को अचेत कर समाधि में भेजकर खेत की रक्षा बाल प्रभु ने सम्वत 1845 सन 1789 में किए थे। मां बाप के साथ वे अयोध्या से छपिया आए हुए थे।शालिधान के फसल को घर लाना था। खेत की रखवाली घनश्याम को सौंपा गया था। वे बाल सखा के साथ खेल में गए और मस्त हों जाते। खेत में जो चिड़िया आती वह अचेत हो जाती । वे पारलौकिक आनन्द पाती। बाद में संकेत कर चिड़ियों को अचेतता दूर कर देते थे। वे विचित्र तरीके से खेत की रखवाली किए थे। बाद में शालिधान की फसल खलिहाल में लाया गया। उसको साफ कर बैलगाड़ी में लाद कर सभी अयोध्या चले आए।

  1. खेत से घास के बजाय पेहटुल उखड़ना

इसी खेत में दयालु प्रभु घास के स्थान पर पेहटुल तोड़ने की लीला किए थे। एक बार बड़े भाई रामप्रताप अपने खेत में घास काटने गए थे। उनके साथ उनका छोटा भाई घनश्याम भी था। खेत में मक्का और पेहटुल साथ-साथ उगे थे। और इन दोनों के बीच उगी घास को निकालना था।

 बड़े भाई को काम करते देख घनश्याम के मन में भी काम करने का विचार आया। इसलिए वह भी काम करने लगा। लेकिन घास निकालने की बजाय घनश्याम मक्का और पेहटुल उखाड़ रहा था। 

 यह देखकर बड़े भाई ने उसे डांटा, लेकिन घनश्याम को इसकी परवाह नहीं थी। बड़े भाई ने कहा,”ये क्या कर रहे हो?”

उन्होने जबाब दिया, “जीव हिंसा कम हो इसलिए यह कर रहा हूं।आप कहे थे पेहतुल से घास निकलना है। मैं तो घास मे से पेहतुल अलग कर रहा हूं। ये दोनों एक ही है।”

बड़े भाई ने उसे फिर से डांटा, लेकिन घनश्याम को इसकी परवाह नहीं थी। बड़े भाई को गुस्सा आ गया। उसने गुस्से में घनश्याम को मारने के लिए हाथ उठाया।

 घनश्याम को बुरा लगा। वह भागकर घर में गया, छिपकर चरनी में घास के ढेर में छिप गया ताकि कोई उसे न पा सके। जब बड़ा भाई दोपहर को घर लौटा, तो भक्तिमाता ने उसे अकेला देखकर घनश्याम के बारे में पूछा। 

उसने कहा, "घनश्याम पहले ही घर आ चुका है।" 

  "नहीं, अभी तक नहीं आया," माँ ने कहा। 

बड़े भाई को अब आश्चर्य हुआ। उसने कहा, "मैंने जब उसे पीटना चाहा तो वह नाराज होकर कहीं भाग गया होगा।"

 घनश्याम की खोज शुरू हुई। उसके सभी गाँव के मित्रों से घनश्याम के बारे में पूछा गया। परन्तु किसी ने घनश्याम को नहीं देखा था।  नदी, तालाब, मंदिर, इमली का पेड़ और आम का पेड़ जहाँ- जहाँ घनश्याम जाता था, वहाँ-वहाँ खोजा गया, परन्तु वह कहीं नहीं मिला। आस- पास के गाँवों में दूत भेजे गए। अन्त में वे निराश और असहाय हो गए।

 भक्तिमाता की दुर्दशा की कोई सीमा नहीं थी। वह रोने लगी: "अरे प्यारे घनश्याम, मेरे बेटे घनश्याम, तुम कहाँ हो?"  

 माँ का विलाप घनश्याम सहन नहीं कर सका। उसने घास के ढेर से चिल्लाकर कहा, "मैं आ गया माँ।" 

 शीघ्र ही मौसी सुन्दरीबाई दौड़कर चरनी के पास गई और घनश्याम का हाथ पकड़कर उसे वापस ले आई। भक्तिमाता घनश्याम से लिपट गई।      

  घनश्याम ने माँ की गोद में मुँह छिपाते हुए कहा, “माँ, मेरा बड़ा भाई मुझे खोज रहा था, मैं उसे देख रहा था।” 

 घन श्याम ने अपने भाई को चतुर्भुज स्वरूप का दर्शन भी कराया। बड़े भाई ने दोनों हाथ जोड़ कर बाल प्रभु से क्षमा मांगी थी।

  “कितना शरारती है मेरा बेटा घनश्याम!” माँ ने उसे अपने आंचल में छिपाते हुए कहा था।

3.कड़वा पेहटुल को मीठा बनाया

इसी खेत में कड़वे पेहटुल का मीठा स्वाद भी किए थे। वसराम तिवारी बालक घनश्याम के मामा थे। उन्होंने अपने खेत में पेहटुल लगाया था। पेहटुल पकते ही उन्हें उसे चखने की इच्छा हुई। इसलिए उन्होंने एक अच्छा पेहटुल चुनकर खाया। लेकिन जैसे ही उन्होंने पहला टुकड़ा मुंह में डाला, उन्हें थूकना पड़ा। पेहटुल बहुत कड़वा था।

   वसराम भक्तिमाता के घर गए और कहा, "बहन, पेहटुल कड़वा होता है। अगर मीठा होता, तो मैं घनश्याम को खेत में ले जाकर खिलाता। उसे पेहटुल बहुत पसंद है न?"

"घनश्याम के लिए पेहटुल कभी कड़वा नहीं हो सकता," भक्तिमाता ने कहा।

“लेकिन वे वास्तव में कड़वे हैं," वसराम ने कहा। घनश्याम सरपट दौड़ता हुआ आया और बोला, "पेहटुल का फल कितना मीठा है!"

  वसराम ने पूछा, "कौन सा?" "वही जो मैं आपके खेत से लाया हूँ," घनश्याम ने कहा, "इसे चखो।" 

वसाराम ने उसे चखा और पाया कि वह बहुत मीठा है। “क्या यह मेरे खेत का है?” वसराम ने पूछा, “लेकिन मेरे खेत में तो सभी पेहटुल/ककड़ी के फल कड़वे होते हैं।”

"नहीं, वे कड़वे नहीं हैं, वे बहुत मीठे हैं," घनश्याम ने कहा, "चलो वहाँ चलते हैं और मैं तुम्हें दिखाता हूँ।" 

वे खेत में गए। वसराम ने ककड़ी के दो से पाँच फल तोड़े और वे मीठे निकले, शहद की तरह मीठे। वह बहुत हैरान हुआ: “यह कैसे? कुछ ही समय में वे मीठे हो गए?”

 घनश्याम ने कहा, "चाचा, यदि आप पहले भगवान का हिस्सा निकाल देते, तो सभी फल मीठे होते।"

 इसलिए, ध्यान रखें, हर चीज में सबसे पहले भगवान का हिस्सा निकालना चाहिये। जहां भगवान का हिस्सा होगा, वह मीठा होगा और अगर भगवान का हिस्सा नहीं निकाला जाता है, तो वह चीज कड़वी होगी।
  1. गुलाब के वृक्ष से सेव के फल

जन्म स्थान मंदिर से पश्चिम दिशा में फिरोजपुर गांव में आनन्द मौर्य का एक जामुन का पेड़ था। यहां घनश्याम जी अपने मित्रों के साथ जामुन खाने की लीला तथा वहां के रखवाले को दण्ड देने के लिए गए थे। यह आश्चर्य जनक चरित्र का स्मरण कराने वाला प्रसादी स्थान है।

 एक बार जेठ के महीने में भयंकर गर्मी पड़ रही थी। यहां एक बार घनश्याम अपने मित्रों राम प्रसाद, मंशा राम भाई, तिरजा तिवारी, वेणी माधव और प्रयाग के साथ जामुन के पेड़ पर गुलाब के सेब चखने गया थे। 

सभी ने निश्चित किया इस भयंकर गर्मी में जामुन खाने जैसा आनन्द कहां है? वैसे भी आनन्द मौर्य धर्मदेव के अच्छे परिचय वाले हैं थे। इसलिये वह कुछ भी नहीं बोलेंगे। मधुर जामुन के फल से पेड़ लदा था। जिसे देख कर मुंह से पानी आ रहा था।

ज्येष्ठ (जून) का महीना था। जामुन के पेड़ पर बहुत सारे गुलाब के सेब थे। सभी 

लोग जामुन के पेड़ से चढ़ गए। सबने यथाशक्ति जामुन का फल खा लिए थे।

लोगों ने अपने थैले में जामुन का फल रख लिया था। वे सभी पेड़ से नीचे उतर आए, पर घनश्याम अभी भी पेड़ पर ही था। वह अपने पैरों से जामुन की डालियां हिला कर जामुन खाने लगा था। वह बोला, “जामुन खाना हो तो खा लो,ले जाना हो तो ले जाओ।”

  राम अवध धोबी ने मना किया कि नुकसान मत कीजिए। घन श्याम महराज बात को माने नहीं। इसी बीच पेड़ का चौकीदार आ गया। वह दोनों हाथ में लाठी लिए हुए था। उसकी आवाज सुनकर अन्य लोग अपने घर भाग गए, घनश्याम अभी भी पेड़ पर ही था। चौकीदार क्रोधित हो 

घनश्याम को मारने के लिएअपना निशाना साधा और बोला, “अरे चोर, मेरे गुलाब के सेब क्यों खाए?”

“मैं चोर नहीं हूँ,” घनश्याम ने कहा, “क्योंकि जंगल में उगने वाले फल सभी को खाने की स्वतंत्रता है!” यह कहकर वह पेड़ से नीचे कूद गया।

 घनश्याम महराज ने कहा, देखो भाई खाने वाले खा लिए, ले जानें वाले ले गए। बिगाड़ने वाले बिगड़कर चले गए। हम तो निर्दोष हैं इसलिए खड़े हैं। सभी दोषी तो भाग खड़े हुए।

  चौकीदार घनश्याम की बात से सहमत नहीं हुआ। वह उनको पीटने के लिए हाथ ऊंचा करके उनके पीछे दौड़ा लिया। प्रभु को एसा लगा कि वह कि वह पकड़ ही लिए गए। वह भी घबरा गए। चौकीदार पहलवान था। प्रभु के पीछे दौड़ कर हाथ पकड़ लिया।

घनश्याम तुरन्त क्रोधित होकर बहुत ही तत्परता से चौकीदार का हाथ पकड़कर ऐसा झटका दिया कि चौकीदार दस कदम पीछे जाकर जमीन पर गिर गया। उसका

का हाथ टूट गया और वह मुँह ऊपर करके जमीन पर बेहोश होकर गिर पड़ा। प्रभु शान्त होकर अपने घर आ गए।

  इससे पहले कि चौकीदार उठकर अपना धूल भरा शरीर साफ कर पाता, घनश्याम गायब हो गया। 

घनश्याम की लीला जामुन के पेड़ के गुलाब की तरह मधुर है।

   यह पाठ बताता है कि सब कुछ भगवान का है और उन्हीं के लिए है। यदि हम विपरीत आचरण करेंगे तो भगवान नाराज होंगे। जामुन के पेड़ का मालिक बनने का प्रयास करने वाले चौकीदार ने घनश्याम को उसके फल खाने से मना कर दिया और उसे पीटा भी गया।
  1. बहेरिया का कुवां फिरोजपुर छपिया

छपिया के नैरित्य कोण पर फिरोजपुर गांव है जिसमें यह बहिरिया का प्रसादी कुवां है। इसमें बालप्रभु घनश्याम के छोटे भाई इच्छाराम एक बार गिर गए थे तो बालप्रभु ने अपने चमत्कार से उनकी जान बचाई थी।

एक बार इस गांव में नट लोग आए थे। वे अपना करतब दिखा रहे थे। घनश्याम और इच्छाराम भी मित्रों के साथ रात में वहां गए हुए थे। खेल देखकर वे देर रात अंधेरे में घर लैट रहे थे। इच्छाराम का ध्यान भंग होने से वह इसी कुएं में गिर गए। इतने में एक बनिए के लड़के को बोला हे हरि कृष्ण हे घनश्याम! इच्छाराम बहेरिया के कुएं में गिर गए हैं।

यह सुन कर घनश्याम कुएं की तरफ़ दृष्टि डाली तो तुरन्त पानी सूख गया और पाताल में चला गया। इच्छाराम कुंए से बोले’ “हे घनश्याम भाई आप की दया से मैं स्वस्थ हूं। मुझे किसी प्रकार की चोट नहीं लगी है।”

इतने में छपिया गांव में यह बात फैल गई कि इच्छाराम बहेरिया के कुंए में गिर गए हैं। इस बात को सुन कर धर्म पिता तत्काल बहेरिया के कुएं पर आकर घनश्याम प्रभु से पूंछा, “इच्छाराम भाई कहां हैं?”

इतने में कुएं से इच्छा राम ने आवाज लगाई ,” हे धर्म पिता! मैं कुएं में हूं। मैं घनश्याम प्रभु की कृपा से सकुशल हूं।”

इतने में घनश्याम महराज ने कुएं में हाथ डाल कर इच्छारामभाई को बाहर निकाल दिए।

यह दृश्य देख कर छपियावासी अत्यन्त चकित हो गए। तब से यह कुंवा प्रसादी का स्थल हो गया और लोग इसका दर्शन करने यहां पर आने लगे।

  1. मोक्ष वाले पीपल से दिव्य अवलोकन

यह घटना बाल प्रभु के आठ वर्ष के उम्र की संबत 1845 की है। छपिया के नैरित्य कोण फिरोजपुर के गांव को सीमा लगती है। यहां उपवन वाटिका बहुत था। यह स्थान रेलवे स्टेशन के तरफ़ जाने वाले मार्ग पर पड़ता है। एक बार घनश्याम प्रभु झट से एक पेड़ पर चढ़ गए और चारो तरफ़ दृष्टि डाली थी। यह जानने के लिए कि मोक्ष के भागी मुमुक्षुजीव किस तरफ हैं? तब से इस पीपल का नाम मोक्ष पीपल पड़ गया।

जब घनश्याम प्रभु इस पीपल के पेड़ पर चढ़ गए और चारो तरफ़ दृष्टि डाले थे। वे पश्चिम दिशा की ओर काफी देर तक देखते रहे।

उनके साथ आए बच्चे खेल रहे थे जो लगभग ख़त्म ही होने वाला था कि उनके एक दोस्त ने उन्हें दूर से पेड़ पर बुलाया, वह उन्हे गहरे विचारों में खोए हुए देखा। उन्होंने उन्हें नीचे बुलाया और उनकी स्थिर दृष्टि का कारण पूछा।

गहराई के गहन उत्तर ने उनके अवतार के उद्देश्य को चिन्हित रूप से समेटा। उन्होंने कहा, “मैं पश्चिम की ओर देख रहा था, जहां हजारों भक्त मेरे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे मेरे आने और एकांतिक धर्म की स्थापना की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे अपने मोक्ष की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

  इसी पेड़ की एक और घटना है। घनश्याम को अक्सर इस विशाल पेड़ से लगाव था।वे समय पाकर इसकी ऊंचाई पर चढ़ जाते और आसमान और चारों तरफ़ देखते विचारों में खोए खोए से रहते थे। एक बार उनके साथ उनके मामा वसराम तिवारी भी थे।जो उन्हें देख कर टोकते हुए बोले,” हे भांजे! क्या देख रहे हो? नीचे आ जाओ। कहीं गिर पड़े तो हड्डी टूट जाएगी।”

तभी घनश्याम महराज हंसते हंसते बोले,

“मैं और मेरे भक्त मुमुक्षु जीव नहीं गिरेंगे।”

ऐसा कह कर घन श्याम प्रभु ने मामा को पीपल के पेड़ के पत्ते पत्ते पर अलग अलग किस्म के फल दिखाए। मामा यह चमत्कार देख आश्चर्य में पड़ गए। उन्हें अनेक फल देखने और खाने की इच्छा हुई।

मामा बोले, “भांजे दो चार फल हमें भी दो।”घनश्याम महराज ने उन्हें प्रेम पूर्वक फल प्रदान किया।

मामा उन फलों को लेकर मामी लक्ष्मीबाई आदि बहनों को दिए थे और भांजे घनश्याम महराज के चमत्कार की जानकारी भी दिए थे। इसे सुनकर और फल देख कर सभी लोग आश्चर्य में पड़ गए थे। ऐसी सुन्दर लीला प्रभु ने इस स्थान पर की थी। तभी से यह प्रसादी स्थल माना जाने लगा।

7.भूतवाला कुआं, तिनवा, छपिया

छपैया से थोड़ी 2 किमी दूर पर तिनवा नाम का एक गांव है, जहां भक्तिमाता के रिश्तेदार रहते थे। ये भूत वाला कुंवा तिनवा गांव के बाहर एक बाग में स्थित है।

भक्ति माता इस कुंए से पानी भरने आई हुई थी।

उस गांव में नबाब के सैनिक आए थे जो उत्पात करते थे। यह देख कर धर्मदेव एक दिन भक्तिमाता, धर्मदेव , राम प्रताप भाई और घनश्याम तिनवा गए और अपने रिश्तेदार प्रथित पांडे और उनकी पत्नी वचनबाई के साथ एक-दो हफ्ते वहां रहे। भक्तिमाता को मेहमान माना जाता था, लेकिन उन्होंने घर के सभी कामों में मदद करना शुरू कर दिया – यहां तक कि पास के कुएं से पानी लाना भी।

 वचनबाई ने भक्तिमाता को चेतावनी दी कि शाम के बाद उन्हें कुएं से पानी लाने नहीं जाना चाहिए क्योंकि कुएं में हजारों भूत रहते हैं। कई लोगों ने भूतों को देखा था।

 एक शाम सूर्यास्त के ठीक बाद, पीने का पानी पर्याप्त नहीं था (खत्म हो गया था) इसलिए भक्तिमाता ने एक घड़ा और रस्सी ली और वह कुएँ की ओर चल पड़ी। उसने घड़े की गर्दन के चारों ओर रस्सी बाँधी और उसे कुएँ में उतार दिया। भूतों ने घड़े को पकड़ लिया और डरावनी तेज़ आवाज़ें निकालने लगे। भक्तिमाता घबरा .गई और अचानक उसे भूतों के बारे में याद आया। उसने घड़ा छोड़ दिया, जो कुएँ में गिर गया, और वह जल्दी से घर भाग गई।    

     अपनी माँ को डर से काँपते हुए देखकर, घनश्याम ने पूछा, "माँ, तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?" फिर भक्तिमाता ने अपने बेटे को कुएँ में भूतों के बारे में बताना शुरू किया।

  अगले दिन अपने माता-पिता को बताए बिना, घनश्याम और उसके कुछ दोस्त भूत कुएँ पर चले गए। अपने दोस्तों के डर से, उसने कुएँ में कूदने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने यह कहकर उसे हतोत्साहित करने की कोशिश की कि भूत उसे ज़िंदा खा जाएँगे। 

 घनश्याम ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया और कुएँ में कूद गया। पानी के छींटे भूतों को जगाते थे और घनश्याम द्वारा छुआ गया पानी उन पर गिर रहा था। भगवान द्वारा छुआ गया पानी पवित्र जल है और जब यह भूतों पर पड़ा तो वे जलने लगे। 

 भूत कुएँ से बाहर निकल आए। भूतों को बाहर निकलते देखकर बच्चे बहुत डर गए। घनश्याम अपने गीले कपड़ों के साथ कुएँ पर चढ़ गया, वह कुएँ के किनारे पर खड़ा था।

    भूत-प्रेत क्षमा और दया की गुहार लगाने लगे - "आप भगवान हैं। कृपया हमारी सहायता करें"। 

 घनश्याम ने पूछा कि उन्होंने कौन से बुरे कर्म किए हैं, जो उन्हें भूतों का जीवन मिला है?

  एक भूत ने उत्तर दिया कि वे बुरे लोग थे - वे मांस खाते थे, शराब पीते थे, जुआ खेलते थे, चोरी करते थे, लोगों को परेशान करते थे और उन्हें चोट पहुँचाते ,जानवरों और मनुष्यों को मारते थे, आदि। 

एक दिन उनका राजा और उसके सैनिकों के साथ झगड़ा हुआ। वे सभी लड़ाई में मारे गए और अपने पापों के कारण भूत बन गए।

 एक अन्य भूत ने कहा, "हम अभी भी कुएं में जगह के लिए एक-दूसरे से लड़ते हैं"। 

  भूतों ने विनती की "हे भगवान, कृपया हमें क्षमा करें और हमें हमारे बंधन से मुक्त करें"। 

 घनश्याम ने उन्हें उनके बंधन से मुक्त किया और बोले, “जिन जिन के ऊपर पानी की बूंदें पड़ी है। वे लोग बद्रीकाश्रम में जाएं। आज से यह भूतिया कुंवा महान तीर्थ के रुप में प्रसिद्ध होगा।”कुएं में एक भी भूत नहीं बचा और फिर घनश्याम घर लौट आया।

 यह खबर जल्दी ही पूरे गांव में फैल गई और हर कोई घनश्याम की प्रशंसा करने लगा। घनश्याम ने पापियों को मुक्ति दिलाने, सत्य का प्रचार करने और बुराई का नाश करने के लिए जन्म लिया था।

आज उनके भक्त इस कुएं को ‘भूतियो कुवा’ के नाम से जानते हैं। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में इस कुवें में स्नान करने से तथा नारायण सरोवर के किनारे बैठ कर श्राद्ध करने से भूत आदि के कष्ट से मुक्ति मिलती है। नरक प्राप्त जीवों का भी कल्याण हो जाता है।
क्रमशः

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