श्याम जी कृष्ण वर्मा। महर्षि दयानन्द द्वारा दिशा निर्देश पाने वाले क्रान्तिकारियो के आश्रयदाता

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जन्म: 4 अक्टूबर 1857, मांडवी, कच्छ, गुजरात
स्वामी दयानंद सरस्वती का साहित्य पढ़ने के बाद श्यामजी कृष्ण वर्मा उनके राष्ट्रवाद और दर्शन से प्रभावित होकर पहले ही उनके अनुयायी बन चुके थे। स्वामी दयानंद सरस्वती की प्रेरणा से ही उन्होंने लन्दन में ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना की थी जिससे मैडम कामा, वीर सावरकर, वीरेन्द्रनाथ चटोपाध्याय, एस. आर. राना, लाला हरदयाल, मदन लाल ढींगरा और भगत सिंह जैसे क्रन्तिकारी जुड़े थे। श्यामजी लोकमान्य गंगाधर तिलक के भी बहुत बड़े प्रशंसक और समर्थक थे। उन्हें कांग्रेस पार्टी की अंग्रेजों के प्रति नीति अशोभनीय और शर्मनाक प्रतीत होती थी। उन्होंने चापेकर बंधुओं के हाथ पूना के प्लेग कमिश्नर की हत्या का भी समर्थन किया और भारत की स्वाधीनता की लड़ाई को जारी रखने के लिए इंग्लैंड रवाना हो गये।
इंग्लैण्ड पहुँचने के बाद उन्होंने सन 1900 में लन्दन के हाईगेट क्षेत्र में एक आलिशान घर खरीदा जो राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना। स्वाधीनता आन्दोलन के प्रयासों को सबल बनाने के लिए उन्होंने जनवरी 1905 से ‘इन्डियन सोशियोलोजिस्ट’ नामक मासिक पत्र निकालना प्रारंभ किया और 18 फ़रवरी, 1905 को ‘इन्डियन होमरूल सोसायटी ‘ की स्थापना की। इस सोसाइटी का उद्देश्य था “भारतीयों के लिए भारतीयों के द्वारा भारतीयों की सरकार स्थापित करना”। इस घोषणा के क्रियान्वन के लिए उन्होंने लन्दन में ‘इण्डिया हाउस’ की स्थापना की ,जो भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के दौरान इंग्लैण्ड में भारतीय राजनीतिक गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र रहा। बल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, गोपाल कृष्ण गोखले, गाँधी और लेनिन जैसे नेता इंग्लैंड प्रवास के दौरान ‘इंडिया हाउस’ जाते रहते थे।
श्यामजी कृष्ण वर्मा के राष्ट्रवादी लेखों और सक्रियता ने ब्रिटिश सरकार को चौकन्ना कर दिया। उन्हें ‘इनर टेम्पल’ से निषेध कर दिया गया और उनकी सदस्यता भी 30 अप्रैल 1909 को समाप्त कर दी गयी। ब्रिटिश प्रेस भी उनके खिलाफ हो गयी थी और उनके खिलाफ तरह-तरह के इल्जान लगाए गए पर उन्होंने हर बात का जबाब बहादुरी से दिया। ब्रिटिश ख़ुफ़िया तंत्र उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखे हुए था इसलिए उन्होंने ‘पेरिस’ को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाना उचित समझा और वीर सावरकर को ‘इंडिया हाउस’ की जिम्मेदारी सौंप कर गुप्त रूप से पेरिस निकल गए।
उनका निधन जिनेवा के एक अस्पताल में 30 मार्च 1930 को हो गया। ब्रिटिश सरकार ने उनकी मौत की खबर को भारत में दबाने की कोशिस की।
आजादी के लगभग 55 साल बाद 22 अगस्त 2003 को श्यामजी और उनकी पत्नी की अस्थियों को जिनेवा से भारत लाया गया और फिर उनके जन्म स्थान मांडवी ले जाया गया। 2 अगस्त 2003 को भारत की स्वतन्त्रता के 55 वर्ष बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने स्विस सरकार से अनुरोध करके जिनेवा से श्यामजी कृष्ण वर्मा और उनकी पत्नी भानुमती की अस्थियों को भारत मँगाया। बम्बई से लेकर माण्डवी तक पूरे राजकीय सम्मान के साथ भव्य जुलूस की शक्ल में उनके अस्थि-कलशों को गुजरात लाया गया। वर्मा के जन्म स्थान में दर्शनीय क्रान्ति-तीर्थ बनाकर उसके परिसर स्थित श्यामजीकृष्ण वर्मा स्मृतिकक्ष में उनकी अस्थियों को संरक्षण प्रदान किया.
उनके जन्म स्थान पर गुजरात सरकार द्वारा विकसित श्रीश्यामजी कृष्ण वर्मा मेमोरियल को गुजरात के मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 13 दिसम्बर 2010 को राष्ट्र को समर्पित किया गया। कच्छ जाने वाले सभी देशी विदेशी पर्यटकों के लिये माण्डवी का क्रान्ति-तीर्थ एक उल्लेखनीय पर्यटन स्थल बन चुका है।
भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया और कच्छ विस्वविद्यालय का नाम उनके नाम पर रख दिया गया।

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