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भारतीय संस्कृति

**गणपति की स्तुति में लिखे वेद* *मंत्रों का गलत भावार्थ –* *

डॉ डी के गर्ग

गणेश को लेकर अनेकों नाम प्रचलित है जैसे की गणपति, विनायक, गजानन, गणेश्वर, गौरीनंदन, गौरीपुत्र, गणधिपति, सिद्धिविनायक, अष्टविनायक, बुद्धिपति, शुभकर्ता, सुखकर्ता, विघ्नहर्ता,‌‌महागणपति आदि। ये सभी नाम एक दुसरे के पर्याय हो सकते है और नहीं भी । लेकिन गणेश के वास्तविक स्वरूप और स्तुति को लेकर जितनी भ्रांतिया है भ्रांतिया भारतीय धर्म प्रेमी समाज में फैली है उतनी कही नहीं। सबसे बड़ी मूर्खता तो निराकार ईश्वर जिसका नाम गणपति भी है उसको शरीरधारी बना दिया , फिर हाथी का मुँह उसके शरीर पर लगा दिया और चूहे की सवारी बना दी। ये ईश्वर के स्वरूप का विधर्मियों द्वारा मजाक बनाया है और अंधविश्वास से ग्रसित हिन्दू समाज को ईश्वर की स्तुति से भटका दिया है।

गणेश ,गणपति का नाम वेद मंत्रों में आया है जिसके अलग अलग सन्दर्भ में भावार्थ है। और समझना जरुरी है —
१) ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे, निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे।
वसो: मम आहमजानि गर्भधम् त्वमजासि गर्भधम्। ॐ।- यजुर्वेद 23/१९

गलत भाषार्थ – (गणानां त्वा॰) इस मन्त्र में महीधर ने कहा है कि-गणपति शब्द से घोड़े का ग्रहण है। सो देखो महीधर का उलटा अर्थ कि ‘सब ऋत्विजों के सामने यजमान की स्त्री घोड़े के पास सोवे, और सोती हुई घोड़े से कहे कि, हे अश्व! जिस से गर्भधारण होता है, ऐसा जो तेरा वीर्य है उस को मैं खींच कर अपनी योनि में डालूं तथा तू उस वीर्य को मुझ में स्थापन करनेवाला है।

अब भला ऐसे ऐसे अश्लीलता युक्ति व यजुर्वेद के तत्पर के अत्यंत विरुद्ध अर्थ करने से ही समाज मे वेदों को लेकर भ्रम फैला है

वास्तविक भावार्थ –संक्षेप में -जो प्रकृति आदि जड़ और सब जीव प्रख्यात पदार्थों का स्वामी वा पालन करने हारा है, इससे उस ईश्वर का नाम गणेश या गणपति है।
वास्तविक भावार्थ –विस्तार सेu -स्वामी दयानन्द द्वारा – -हे जगदीश्वर ! हम लोग (गणानाम्) गणों के बीच (गणपतिम्) गणों के पालनेहारे (त्वा) आपको (हवामहे) स्वीकार करते (प्रियाणाम्) अतिप्रिय सुन्दरों के बीच (प्रियपतिम्) अतिप्रिय सुन्दरों के पालनेहारे (त्वा) आपकी (हवामहे) प्रशंसा करते (निधीनाम्) विद्या आदि पदार्थों की पुष्टि करनेहारों के बीच (निधिपतिम्) विद्या आदि पदार्थों की रक्षा करनेहारे (त्वा) आपको (हवामहे) स्वीकार करते हैं। हे (वसो) परमात्मन् ! जिस आप में सब प्राणी वसते हैं, सो आप (मम) मेरे न्यायाधीश हूजिये, जिस (गर्भधम्) गर्भ के समान संसार को धारण करने हारी प्रकृति को धारण करने हारे (त्वम्) आप (आ, अजासि) जन्मादि दोषरहित भलीभाँति प्राप्त होते हैं, उस (गर्भधम्) प्रकृति के धर्त्ता आपको (अहम्) मैं (आ, अजानि) अच्छे प्रकार जानूँ ॥१

2) गणेश स्तुति के लिखे गए एक अन्य श्लोक का वास्तविक भावार्थ —
श्लोकः वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

प्रचलित अर्थ – घुमावदार सूंड वाले, विशाल शरीर काय, करोड़ सूर्य के समान महान प्रतिभाशाली। मेरे प्रभु,(गणेश जी )हमेशा मेरे सारे कार्य बिना विघ्न के पूरे करने की कृपा करें।
वास्तविक भावार्थ — गलत भावार्थ के कारण ये श्लोक शरीरधारी गणेश की मूर्ति को ध्यान में रखकर गाया जाता है। परन्तु इस श्लोक में सूंडधारी गणेश का कही भी उल्लेख नहीं है। ये श्लोक कहाँ से लिया गया है और किसने लिखा है ,ये अज्ञात है। परन्तु ये बहुत प्रसिद्ध है और इस पर तरह- तरह की धुनें और संगीत देखने को मिलता है। इसलिए इस पर गौर करना जरुरी है।
पहले कुछ प्रमुख शब्दावली को समझते है।
इस श्लोक में ईश्वर की स्तुति करते हुए भक्त ने ईश्वर के लिए तीन मुख्य बाते कही है —
१ वक्रतुण्ड
२ महाकाय
३ सूर्यकोटि
१ वक्रतुण्ड = वक्र यानी घुमावदार ,गोलाकार,मुड़ी हुई ।
तुण्ड = हाथी की सूंड़ ,मुख
यह टुंड शब्द हाथी की सूंड के लिए प्रयोग नहीं हुआ है क्योकि हाथी की सूंड उसकी इच्छा के अनुसार घूमती रहती है।हाथी की सूंड की सूंघने की शक्ति सबसे प्रबल होती है। यहाँ पर अलंकार की भाषा के प्रयोग द्वारा हाथी की सूंड की उपमा का प्रयोग कवि ने प्रयोग किया है। इसका भावार्थ है हाथी की सूंड की भांति विशाल ,सभी दिशाओं में भ्रमण करने वाले, सभी प्राणियों और प्रकृति पर चहुं ओर ध्यान देने वाले असीमित शक्ति वाले ईश्वर से है।पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी जीवधारियों में हाथी की नासिका यानी सूंड सबसे बड़ी और घुमावदार होती हैं,अन्य किसी जीव की नही।
२ महाकाय =महा़काय । महा अर्थात बड़ा,विशाल,विस्तीर्ण । कायः यानी शरीर।
हे ईश्वर, तू जो कण कण में है। लोक लोकांतरों में विद्यमान है ,तू महाकाय वाला है ,जिसका आकर भी अकल्पनीय है।
३ सूर्यकोटिसमप्रभ = कोटि कहते हैं करोड़ को ।कोटि पराकाष्ठा को,आधिक्य को ,परमोत्कर्ष को भी कहते हैं।
समप्रभ =समान प्रभा वाले।प्रभा अर्थात प्रकाश, दीप्ति,कान्ति,जगमगाहट, चमक। करोड़ों सूर्य के समान जिनकी कान्ति है ।
सूर्य क्या है ? सूर्य हमारे सौर मंडल का सबसे बड़ा पिंड है और उसका व्यास लगभग १३ लाख ९० हजार किलोमीटर है जो पृथ्वी से लगभग १०९ गुना अधिक है। सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग १४,९६,००,००० किलोमीटर या ९,२९,६०,००० मील है तथा सूर्य से पृथ्वी पर प्रकाश को आने में ८.३ मिनट का समय लगता है। सूर्य की गुरुत्वाकर्षण फोर्स पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से 27 गुना अधिक है। वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर यह ज्ञात हुआ है कि सूर्य के केंद्र का तापमान अनुमानित 150 लाख डिग्री सेंटीग्रेड है।
यानि करोडो सूर्य से भी ज्यादा प्रभा वाले ईश्वर गणपति के स्वररूप का बखान करते हुए स्तुति की गयी है।
उपरोक्त से स्पष्ट है की ये श्लोक शरीरधारी गणेश के लिए नहीं है ,निराकार ईश्वर के लिए है गणेश की सवारी तो चूहा बताते है ,फिर करोडों वेद में ईश्वर को सूर्य भी कहा गया है –
सूर्य्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’
इस यजुर्वेद के वचन से जो जगत् नाम प्राणी, चेतन और जंगम अर्थात् जो चलते-फिरते हैं, ‘ तस्थुषः ’ अप्राणी अर्थात् स्थावर जड़ अर्थात् पृथ्वी आदि हैं, उन सब के आत्मा होने और स्वप्रकाशरूप सब के प्रकाश करने से परमेश्वर का नाम ‘सूर्य्य’ है।
सूर्य से ज्यादा तेज ,प्रभावशाली कैसे हो सकता है?ये केवल एक निराकार ईश्वर ही हो सकता है।

गणेश जी कौन है- गणेश के दो अर्थ निकलते है -एक गणेश शरीरधारी है जी हिमालय पर्वत के राजा शिव के पुत्र थे ,इनकी माता का नाम पार्वती और गणेश के भाई का नाम कार्तिकेय था। इनकी सवारी चूहा बतायी जाती है। इस अलोक में ये श्लोक शरीरधारी शिव पुत्र गणेश के लिए नही है।
वेद में गणेश: वेद में गणेश शब्द ईश्वर के लिए भी प्रयोग किया है -गण संख्याने ‘‘ इस धातु से ‘गण’ शब्द सिद्ध होता है, इसके आगे ‘ईश’ वा ‘पति’ शब्द रखने से ‘गणेश’ और ‘गणपति शब्द’ सिद्ध होते हैं। ‘ये *प्रकृत्यादयो *जडा जीवाश्च गण्यन्ते संख्यायन्ते तेषामीशः स्वामी पतिः पालको** वा’ जो प्रकृत्यादि जड़ और सब जीव प्रख्यात पदार्थों का स्वामी वा पालन करनेहारा है, इससे उस ईश्वर का नाम ‘गणेश’ वा ‘गणपति’ है।
उपरोक्त वास्तविक भावार्थ के साथ श्लोक का उच्चारण करें ,अज्ञानियों की तरह नहीं।

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