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वैदिक संपत्ति

वैदिक सम्पत्ति भाग- 347 जाति,आयु और भोग

(यह लेख माला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की पुस्तक वैदिक सम्पत्ति नामक से अपने सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)
प्रस्तुति -देवेंद्र सिंह आर्य
चैयरमेन- ‘उगता भारत’

गतांक से आगे ….

स पर हमारा नम्र निवेदन इतना ही है कि यह वेदो का सिद्धांत है, इसलिए केवल पुनरावर्तन की दलील से खंडित नहीं हो सकता। वेद में स्पष्ट कहा है कि –

स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा ।
यत्र देवाऽअमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैश्यन्त ।। (यजु० 32/10)
यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।
यत्रासूर्य ह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृषी० । ८।।
यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधी० ॥ (० 9/113/8-9)
अर्थात् परमात्मा मेरा भाई, पिता और विधाता है। वह समस्त लोकलोकान्तरों को जानता है, इसलिए जहाँ देवता अमृत्तत्त्व को प्राप्त होते हैं, उसी तृतीय घाम में मुझे पहुँचावे। जहाँ का राजा सूर्य है, जहाँ का द्वार द्यौ से ढका है और जहाँ सूर्य की किरणें ठंडी होकर पहुँचती हैं, वहीं मुझको अमर कीजिये। जिस तीसरे लोक स्वर्ग में सब कामनायों से तृप्त हुए देव विचरण करते हैं और जहाँ दिव्य ज्योति से भरा हुआ स्थान है, वहीं मुझे अमर कीजिये। इन वेदमन्त्रों में स्पष्ट ही तीसरे लोक में जाकर अमर होने की प्रार्थना की गई है। तीसरा लोक स्वर्ग अर्थात् द्यौ ही है। इसमें तो किसी को आपत्ति ही नहीं हो सकती। इसलिए मोक्षधाम स्वर्ग ही है, इसमें सन्देह नहीं हाँ, पुन- रावर्तन और न च पुनरावर्तन के प्रमाणों से कुछ विरोधाभास दिखता है, परन्तु विद्वानों ने उसका भी स्पष्टीकरण कर दिया है। अभी हम लिख आये हैं कि ब्रह्मलोकं सम्पद्यते न च पुनरावर्तते’ अर्थात् ब्रह्मलोक में जाकर फिर वापस नहीं आते और आपत्तिकर्ता की दी हुई श्रुति कहती है कि, ‘नाकस्य पृष्ठे ते सुष्कृतेऽनुभूत्येमं लोकं हीनतरं चाविशन्ति अर्थात् स्वर्ग से आकर हीनतर लोकों को जाते हैं। इसलिए यह प्रश्न अवश्य उत्पन्न होता है कि इन दोनों विरोधी बातों का सामञ्जस्य क्या है? परन्तु हम देखते हैं कि पूर्वाचार्यों ने इन दोनों परस्पर विरोधी सिद्धान्तों को बहुत ही अच्छी तरह सुलझा दिया है और उपनिषदों में ही लिख दिया है कि ‘पराग्तकाले परिमुवन्ति’ और ‘परापरावतः न पुनरावृत्तिः’ अर्थात् परान्तकाल में लौट आते हैं और परान्तकाल के पूर्व नहीं लौटते । तात्पर्य स्पष्ट हो गया कि जो वाक्य न लौटने के आशयवाले हैं, वे परान्तकाल की पूर्व सीमा से सम्बन्ध रखते हैं और जो लौटने के प्रशयवाले हैं, वे परान्तकाल की सीमा के हैं। दोनों का फलितार्य यह है कि मोक्ष से परान्तकाल तक जीव नहीं लौटते, पर परान्त काल के बाद लौट आते हैं। रहा यह कि मोक्ष से कोई लौट ही नहीं सकता। इस पर हमारा नम्र निवेदन इतना ही है कि जब गीता के अनुसार स्वयं कृष्ण भगवान् ही कहते हैं कि ‘ बहूनि में व्यतीतानि जन्मानि’ अर्थात् मेरे अनेकों जन्म हो चुके और अनेकों बार मैं धर्म की स्थापना के लिए ही आया करता हूँ तो अन्य जीवों के मोक्ष से वापस आने में कैसे आपत्ति की जा सकती है, मोक्ष से वापस आने का सिद्धान्त तो सनातन है। जो लोग समझते हैं कि इस सिद्धांत को स्वामी दयानन्द ने निकाला है, वे गलती पर हैं। मोक्ष का सिद्धान्त किसी का निकाला हुआ नहीं है, प्रत्युत वह एक वास्तविक घटना है, जो सनातन से ऋषि-मुनियों के द्वारा अनुमोदित होती हुई आ रही है। इसीलिए उपनिषदों में तत्तम्बन्धी प्रमाण मिलते हैं। उन प्रमाणों को सबने देखा है और अनुभव किया है। इसीलिए श्रीस्वामी आदि शकराचार्य ने धीमी और स्वामी आनन्दगिरि ने प्रबल आवाज से प्रतिपादन किया है कि उपनिषदों के अनुसार मोक्ष से वापस आना सिद्ध होता है। छान्दोग्य उपनिषद् ४।११।६ में लिखा है कि ‘स एतान्ब्रह्म गमपत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्त नावर्तन्ते नावर्तन्ते’ अर्थात् ज्ञानी पुरुष परमात्मा को प्राप्त होकर मन्वन्तर के इस चक्कर में वापस नहीं आता। इस श्रुति में यह भाव गर्भित है कि इस मन्वन्तर में वापस यही आता, किन्तु दूसरे मन्वन्तर में वापस आ जाता है। इस श्रुति का भाष्य करते हुए स्वामी शङ्कराचार्य लिखते हैं कि ‘एतेन प्रतिपद्यमाना गच्छन्तो ब्रह्म में मानव मनुसम्बन्धिनं मनो सृष्टिलक्षणमावर्त नाऽऽवर्तन्त’ इस वाक्य में इमं मानवमा वर्त’ पद पर स्वामी शङ्कराचार्य ने अधिक नहीं लिखा। उन्होंने केवल इतना ही कह दिया है कि ‘इमं मानवं’ मनु सम्बन्धिनं’ अर्थात् इस मनुसम्बन्धी चक्कर में। यद्यपि इससे धीमा प्रकाश पड़ता है, पर बात स्पष्ट नहीं होती, किन्तु इस पर स्वामी आनन्दगिरि ने स्पष्ट कह दिया है कि- •

(इसीलिए तो गीता ने वैदिकों को ‘स्वर्गपरा’ कहा है।)

‘इममिति विशेषणादनावृत्तिरस्मिन्कल्पे, कल्पान्तरे त्वावृत्तिरिति सूच्यते’ अर्थात् इस ‘इम’ विशेषरण से इस कल्प में अनावृत्ति सिद्ध होती है, पर कल्पान्तर में तो आवृत्ति ही सूचित होती है। स्वामी आनन्दगिरि की इस निष्पत्ति से आवृत्तिवाद पर बड़ा ही सुन्दर प्रकाश पड़ता है और स्पष्ट हो जाता है कि कल्पान्तर में जीव मोक्ष से अवश्य वापस आ जाता है। इसलिए मोक्ष से वापस आने पर भी स्वर्ग और ब्रह्मलोक मोक्षधाम ही सिद्ध होते हैं और सूर्य का पृष्ठभाग ही स्वर्ग और ब्रह्मलोक सिद्ध होता है, इस में सन्देह नहीं। परन्तु कुछ लोग कहते हैं कि मोक्ष से वापस आने का सिद्धान्त मान लेने से ब्रह्म और जीव की एकता में विधात आता है। क्योंकि वेदान्त का यही सिद्धान्त है कि जीव मोक्ष में ब्रह्म ही हो जाता है, अतएव मोक्ष से पुनरावृत्ति मानना उचित नहीं है। परन्तु हम देखते हैं कि ‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्व मकल्पयत्’ के अनुसार यह सुष्टि अनादि काल से चली आ रही है और इसके चलने का कारण केवल जीवों के कर्म और परमेश्वर की न्यायव्यवस्था ही है। ऐसी दशा में यह तो निर्विवाद ही है कि जीव अनादि काल से वर्तमान काल पर्यंत ब्रह्मा से जुदा थे और जुदा हैं। अब विवाद केवल भविष्य में दोनों के एक हो जाने का है। एक दल कहता है कि जब जीव और ब्रह्म दोनों अनादि काल से अब तक पृथक् हैं, तो भविष्य में भी एक नहीं हो सकते और दूसरा दल कहता है कि प्रागभाव के सिद्धान्तानुसार जिस प्रकार घड़ा बनने के पूर्व अनादि काल से नहीं था, किन्तु बनने पर हो गया और अनादि काल की स्थिति नष्ट हो गई, इसी प्रकार जीव भी यद्यपि अनादि काल से पृथक् था, पर
भविष्य में एक हो सकता है और अनादि काल की स्थिति नष्ट हो सकती है।
क्रमशः

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