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भाग-१
डॉ डी के गर्ग

हमारे अधिकांश महापुरुष ऋषियों और विदुषी महिलाओं पर आक्षेप जिस तरह से लगाए गए है और पौराणिक समाज उसी गप्प के आधार का अनुसरण करता रहा है ,ये अति दुःख का विषय है और निंदनीय है।
उदहारण के लिए -कारण का जन्म सूर्य से हुआ ,द्रौपति के लिए अन्य कथा है की पांचाल देश के राजा द्रुपद ने गुरु द्रोणाचार्य से अपने अपमान का बदला लेने के लिए यज्ञ करवाया था. इसी यज्ञ के हवनकुंड की अग्नि से द्रौपदी प्रकट हुई थीं. यज्ञ से उत्पन्न होने के कारण ही द्रौपदी को यज्ञसेनी भी कहा जाता है , गांधारी के १०० बच्चे वेद व्यास के आशीर्वाद से घड़े में पैदा हुए ,किसी का जन्म मछली से बताते है
तो किसी का यमुना गंगा आदि से , जैसे भीष्म पितामह का जन्म गंगा नदी से बता दिया। जबकि राजा शांतनु और गंगा नमक युवती जो उनकी पत्नी थी उनसे हुआ था। कथा के अनुसार शांतनु और गंगा दोनों ही पिछले जन्म में स्वर्गलोक में थे, और इंद्र की आज्ञा की वजह से ही उन्हें पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था। फिर पृथ्वी पर गंगा के घाट पर मिलने पर उन्होंने शादी का फैसला किया। फिर गंगा गर्भवती हुई और भीष्म पितामह को जन्म दिया। इसी तरह सीता जी एक घड़े में राजा जनक को प्राप्त हुई आदि।
ऐसी झूट की कड़ी में महर्षि वेद व्यास को भी नही बक्शा।
प्रचलित कथाः- पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में सुधन्वा नाम के राजा एक दिन आखेट के लिये वन गये। उनके जाने के बाद ही उनकी पत्नी रजस्वला हो गई। उसने इस समाचार को अपनी शिकारी पक्षी के माध्यम से राजा के पास भिजवाया। समाचार पाकर महाराज सुधन्वा ने एक दोने में अपना वीर्य निकाल कर पक्षी को दे दिया। पक्षी उस दोने को राजा की पत्नी के पास पहुँचाने आकाश में उड़ चला।मार्ग में उस शिकारी पक्षी को एक दूसरा शिकारी पक्षी मिल गया। दोनों पक्षियों में युद्ध होने लगा, युद्ध के दौरान वह दोनों पक्षी के पंजे से छूटकर यमुना में जा गिरा।यमुना में ब्रह्मा के श्राप से मछली बनी एक अप्सरा रहती थी। मछली रूपी अप्सरा दोने में बहते हुये वीर्य को निगल गई तथा उसके प्रभाव से वह गर्भवती हो गई। गर्भ पूर्ण होने पर एक निषाद ने उस मछली को अपने जाल में फँसा लिया। निषाद ने जब मछली को चीरा तो उसके पेट से एक बालक तथा एक बालिका निकली। निषाद उन शिशुओं को लेकर महाराज सुधन्वा के पास गया। महाराज सुधन्वा के पुत्र न होने के कारण उन्होंने बालक को अपने पास रख लिया जिसका नाम मत्स्यराज हुआ। बालिका निषाद के पास ही रह गई और उसका नाम मत्स्यगंधा रखा गया क्योंकि उसके अंगों से मछली की गंध निकलती थी। उस कन्या को सत्यवती के नाम से भी जाना जाता है। बड़ी होने पर वह नाव खेने का कार्य करने लगी एक बार पराशर मुनि को उसकी नाव पर बैठकर यमुना पार करना पड़ा। पराशर मुनि सत्यवती रूप-सौन्दर्य पर आसक्त हो गये और बोले देवि! मैं तुम्हारे साथ सहवास करना चाहता हूँ।
सत्यवती ने कहा मुनिवर! आप ब्रह्मज्ञानी हैं और मैं निषाद कन्या। हमारा सहवास सम्भव नहीं हैं तब पराशर मुनि बोले बालिके! तुम चिन्ता मत करो। प्रसूति होने पर भी तुम कुमारी ही रहोगी। इतना कहकर उन्होंने अपने योगबल से चारों ओर घने कुहरे का जाल रच दिया और सत्यवती के साथ भोग किया। तत्पश्चात् उसे आशीर्वाद देते हुये कहा तुम्हारे शरीर से जो मछली की गंध निकलती है वह सुगन्ध में परिवर्तित हो जायेगी।
समय आने पर सत्यवती गर्भ से वेद-वेदांगों में पारंगत एक पुत्र हुआ। जन्म होते ही वह बालक बड़ा हो गया और अपनी माता से बोला माता तू जब कभी भी विपत्ति में मुझे स्मरण करेगी मैं उपस्थित हो जाउँगा। इतना कहकर वे तपस्या करने के लिये द्वैपायन द्वीप चले गये। द्वैपायन द्वीप में तपस्या करने तथा उनके शरीर का रंग काला होने के कारण उन्हे कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा। आगे चलकर वेदों का विभाजन करने के कारण वे वेदव्यास के नाम से विख्यात हुये।
कथा की सत्यताः- 1 मछली से पैदा होने वाली ये महागप्प कथा किसी धूर्त (वाममार्गी) मानव की बनाई हुई है।गप्प कथा लिखने वाले से ये पूछो कि ये घटनाक्रम कितने समय का है और वह उस समय कहाँ पर उपस्थित था, क्या उसके पास प्रमाण हैं ? देखा जाये तो सम्पूर्ण घटनाक्रम में कम २०-२५ साल तो लगे होंगे और पूरे समय की घटना को इस तरह धूर्त ने पिरोया है कि जैसे कि वो एक दृष्टा हो।
2 आप जानते हैं कि मछली का गर्भाशय कैसा होता हैं? माता का जैसा गर्भाशय होगा वैसी ही उसकी संतान होगी अर्थात् मानव स्त्री के गर्भाशय से मानव और मछली के गर्भाशय से मछली, ऐसा परमात्मा का प्राकृतिक नियम हैं। इसमें कहीं भी अपवाद तक नहीं मिलता। यहीं विज्ञान की मान्यता भी है।
३ इस कथाकार से एक अन्य प्रश्न है कि क्या योगीजन् अपने योग की शक्ति से परमात्मा के नियम विरुद्ध भी कुछ कर सकते हैं? ये असम्भव है।योग क्या है ? अष्टांग योग के जो आठ अंग है –यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि । ये सभी मानव को सांसारिकता से दूर ले जाकर ईश्वर से जोड़ते है। जिसमे मनुष्य के पांच दोष जो की काम ,क्रोध ल,लोभ ,मोह और अहंकार है , वह इन सबसे दूर रहता है।जो व्यक्ति योगी परमात्मा के निकट पहुंच जाता है, तो वह परमात्मा के ज्ञान को जानने वाला बन जाता हैं। वह परमात्मा के नियम के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करेगा। पारा मुनि एक ऐसे व्यक्ति नहीं थे कि वह परमात्मा के नियम के विरुद्ध कोई कार्य करते।यह तो हो सकता है कि मानव के हृदय की गति चंचल हो जाए परंतु ऐसे महान ऋषि तुरंत ही उस पर अपना नियंत्रण कर लेते हैं।
४ मछली के गर्भ से मानव कन्या जन्म होना तो स्वतः ही नियम के विरुद्ध हैं। इसको तो कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि परमात्मा के बनाए नियम तो अटल हैं, सत्य हैं। तीनों कालों में एक से हैं। परमात्मा की चलाई परंपरा को कोई भी तोड़ नहीं सकता। चाहे महर्षि हो, चाहे योगी हो और चाहे मुनि हो।
५ हमको परमात्मा के नियमों को स्वीकार कर लेना चाहिए। इससे हमारा भी जीवन बनेगा और उसी में हमारा महत्व है। महर्षि पारा मुनि के दो पुत्र थे जो उनकी धर्म पत्नी के गर्भ से ही उत्पन्न हुए थे। एक महर्षि व्यास मुनि महाराज और दूसरे धुंधऋषि महाराज।
मत्स्योदरी के दो बालक थे जो कि मत्स्योदरी के साथ शांतनु का विवाह संस्कार होने के पश्चात उत्पन्न हुए थे। महर्षि व्यास ने तो केवल यह कहा है कि वह गंगेश्वरी राजा की पुत्री गंगा थी। उसकी मृत्यु के पश्चात महाराज शांतनु ने मल्लाह की अत्यंत सुंदरी कन्या मत्स्योदरी से विवाह संस्कार किया। मानव को सच मानने में कोई किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
६ वेद व्यास जी महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता है। कृष्णद्वैपायन वेदव्यास महर्षि पराशर और सत्यवती निषाद के पुत्र थेद्यवेदव्यास महाभारत के रचयिता ही नहीं, बल्कि उन घटनाओं के साक्षी भी रहे हैं, जो क्रमानुसार घटित हुई हैं। महाभारत के बाद धर्म कर्म बिलकुल नष्टप्राय हो गए थे। इन्होंने वेद मंत्रो का भाष्य भी किया ,और वेद ज्ञान का प्रचार किया इसलिए ये वेदव्यास कहलाये।
संस्कृत साहित्य में वाल्मीकि के बाद व्यास ही सर्वश्रेष्ठ कवि हुए हैं।इनके लिखे काव्य ‘आर्ष काव्य‘ के नाम से विख्यात हैं। महाभारत में उपाख्यानों का अनुसरण कर अनेक संस्कृत कवियों ने काव्य, नाटक आदि की सृष्टि की है।
ऐसे विद्वान और महान ऋषि के विषय में अनर्गल बाते करना ,असत्य कथाये जोड़कर हमारे ऋषियों का अपमान किया गया है ,जो ठीक नहीं , निंदनीय है।

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