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Dr D K Garg

पौराणिक मान्यताये : मुरुगन देवता का दूसरा नाम कार्तिकेय है  जो  भारत के तमिलनाडु के  एक लोकप्रिय हिन्दु देव हैं। इसके अतिरिक्त विश्व में जहाँ कहीं भी तमिल निवासी/प्रवासी रहते हैं जैसे कि श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर आदि में भी यह पूजे जाते हैं।

ये मान्यता है की ये  भारत के तमिलनाडु राज्य के रक्षक देव भी हैं। ये भगवान शिव और माता पार्वती के सबसे बड़े पुत्र हैं । इनके छोटे भाई भगवान गणेश हैं। 

इनके  विषय में एक  कहानी प्रचलित हैं कि एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान कार्तिकेय किसी बात पर अपने समर्थकों के साथ बहुत दूर दक्षिण में जा बसे थे आज वही स्थान तमिलनाडु है इसीलिए तमिलनाडु में भगवान मुरगन की सबसे अधिक पूजा होती है जैसे महाराष्ट्र में भगवान गणेश की पश्चिम बंगाल में मां दुर्गा की तमिलनाडु में भगवान शिव और भगवान मुरगन की केरल में भगवान अय्यप्पा की। 

विश्लेषण: इस लोक कथा और ईश्वर के प्रतीक मुरगन को समझने के लिए कुछ प्रश्न सामने आते है जिनके उत्तर खोजना होगा –
।.  ईश्वर एक ही है जो समस्त लोक लोकान्तरो में व्याप्त है । 
2. ईश्वर जन्म मरण से रहित है और जीव बार बार जन्मलेता है,  ये उसकी कर्म योनि है 
3.  ईश्वर शरीरधारी नहीं है और ना ही किसी ने उसको देखा है, केवल सृष्टि के रचना देखकर ईश्वर को महान रचनाकार कहा जाता है। 
4. ईश्वर अनेको कलाओ से युक्त है इसलिए कार्यो  के आधार पर ईश्वर को सैकड़ो नाम  से पुकारा जाता  है। जैसे परमपिता, माता, कुबेर, इंद्र, प्रजापति आदि। 
आगे इस कथानक पर विचार करते है –हिमालय के  महान राजा शिव के दो पुत्र थे -गणेश और कार्तिकेय,  इनकी पत्नी का नाम उमा था लेकिन पर्वत पर रहने  वाली महारानी को पार्वती के नांम से भी जाना जाता था। राजा शिव का कोई ज्यादा इतिहास नहीं मिलता है ,केवल कुछ किवदंतिया ही सुनने को मिलती है ,अधिकांश प्रामाणिक नहीं है जो कथावाचकों द्वारा मसाला लगाकर मनोरंजन के लिए सुनाई जाती है। 
इस अलोक में राजा शिव शरीरधारी जीव की श्रेणी में आते है और जिनका देहांत भी हो चूका है परन्तु महान राजा होने के कारण उनको याद किया जाता है।  यदि राजा अच्छा हो ,प्रजापालक हो तो श्रद्धावश ये भी कह दिया  जाता है की ये राजा तो भगवान्  के सामान है इसीलिए ईश्वर को प्रजापति भी कहा है।       
मुरुगन पूजा का भावार्थ  :प्राचीन तमिलनाडु में कौमारम द्रविड़ों का प्रमुख धर्म था। बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने भी उत्तर से धीरे-धीरे तमिलनाडु में प्रवेश किया। तमिलनाडु में संस्कृत भाषी वैदिक धर्म के अतिरिक्त धीरे धीरे शैव और वैष्णव धर्म को भी प्रमुखता मिली, क्योंकि राजाओं ने इन धर्मों को अपना लिया था।लेकिन मुरुगन की पूजा भी आम लोगों द्वारा पुराने रीति-रिवाजों के अनुसार जारी रही।
मुरुगन असल में हिंदू धर्म नाम वेद या पुराण, या स्मृति, या उपनिषद जैसे धार्मिक ग्रंथों में कहीं भी नहीं मिलता है। इस विषय में और अधिक खोज करने पर कुछ मुख्य बाते सामने आयी —

युवा, वीरता और सुंदरता का प्रतीक: भगवान मुरुगन कई प्रतीकों और विशेषताओं से जुड़े हैं जो तमिल संस्कृति से मेल खाते हैं। उदाहरण के लिए, मोर, उसकी सवारी, सुंदरता और अनुग्रह का प्रतीक है, जबकि उसका भाला बुद्धि और ध्यान का प्रतीक है। माना जाता है कि वेल (भाला) में अपार शक्ति होती है और इसे बुराई के खिलाफ एक दिव्य हथियार के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है।
भगवान मुरुगन का युवा रूप और दिव्य गुण तमिल लोगों की आकांक्षाओं, वीरता और सुंदरता से मेल खाते हैं। उन्हें युवा पीढ़ी के लिए आदर्श माना जाता है।
आध्यात्मिक महत्व: भगवान मुरुगन को दिव्य ऊर्जा और ज्ञान का अवतार माना जाता है। भक्त आध्यात्मिक विकास, सुरक्षा और मार्गदर्शन के लिए उनका आशीर्वाद चाहते हैं। कई लोगों का मानना है कि भगवान मुरुगन की पूजा करने से बाधाओं को दूर करने, आंतरिक राक्षसों को हराने और ज्ञान प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
उपरोक्त से स्पष्ट है की ईश्वर के गुणों  का बखान करते हुए शिल्पकार ने जो मूर्ति बनायी उसका नाम मुरगन रखा गया। क्योकि भारत में एक समय ऐसा आया था जब शिल्पकला अपनी चरम सीमा पर थी और ईश्वर के गुणों  को समझाने के लिए उसकी तस्वीरें बनायी गयी लेकिन अज्ञानतावश इन तस्वीरों को ही ईश्वर मान लिया और अज्ञानोयो ने इनको भोग लगाना , कपडे पहनाना ,चोरी से बचाने के लिए टला लगाकर रखना सुरु कर दिया जैसे की ईश्वर पर उनका एकाधिकार है। 
एक समाचार पत्र में छपा ये लेख देखो – भगवान मुरुगन की एक प्राचीन मूर्ति, जो 23 साल पहले तमिलनाडु के कल्लाकुरिची जिले के थाचूर गांव में एक पल्लव-युग के शिव मंदिर से चोरी हो गई थी, तमिलनाडु पुलिस के अपराध जांच विभाग (सीआईडी) की मूर्ति शाखा द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका में खोजी गई है। 
मूर्ति शाखा के अधिकारियों के अनुसार, प्राचीन शिव मंदिर 7वीं या 8वीं शताब्दी (उत्तर पल्लव काल) में बनाया गया था और मंदिर में 13 पत्थर की मूर्तियाँ थीं। मलिक काफूर और अन्य मुगल राजाओं के आक्रमण के दौरान मंदिर को नष्ट कर दिया गया और पत्थर की मूर्तियों को मिट्टी में दबा दिया गया।
अब आप ही बताये जो मूर्ति अपनी रक्षा नहीं कर सकती वह ईश्वर कैसे हो सकती है ? जो भगवान पुजारी के वश में ताले में, पुलिस  के पहरे में ,दुकानदारों की दूकान पर  बिकता है, पंडित जिसकी प्राण प्रतिष्ठा करते है वो आपको कैसे आशीर्वाद देगा? इतिहास में  ऐसे हजारो उदहारण मिलेंगे। इसलिए भ्रमित ना हो। 
आपका प्रश्न हो सकता है कि ये आस्था है ,और आस्था में ही भगवान बसते है ।मेरा आपको उत्तर ये होगा कि आस्था अगर ज्ञान के बिना हो तो वह अन्धविश्वास कहलाता हैं।
सभी जानते हैं कि शराब बुरी चीज हैं। राजस्थान में एक मन्दिर में भक्त देवी की मूर्ति पर शराब चढ़ाते हैं। आस्था के नाम पर हर वर्ष करोड़ों जीवों की हत्या हो रही है पूछो तो कहते हैं तुम कौन हमारी आस्था हैं। गुवहाटी में कामख्या का मन्दिर हैं। हर रोज सैकड़ों मुर्गे, बकरे, कबूतर, भैंसे और न जाने किस-किस निरीह जानवर को देवी को अर्पित करने के नाम पर मारे जाते हैं।

मुरगन की उत्पत्ति : दरअसल मुरगन  को शिव या कार्तिकेयन के साथ जोड़ना कथाकारों की  मजबूरी रही है  ताकि फर्जी कहानिया बनायी जा सके। मुरगन शब्द का अर्थ कार्तिकेयन कभी भी नहीं है, ना हो कोई इसका प्रमाण है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि यदि एक झूट हजार बार बोला जाए तो वह सत्य का स्थान लेने लगता है,ऐसा ही मुरगन ,गणेश ,शिव, कार्तिकेयन आदि शब्दो के साथ हुआ है।
मुरगन शब्द का उदगम: मुरगन शब्द संस्कृत के उरुक्रमः  शब्द  के बिगड़कर बना है , जो गलत उच्चारण का परिणाम है। भाषा के प्रभाव से शब्दों का उच्चारण  बदल जाता है ,ये हम सभी जानते है। संस्कृत भाषा तमिल भाषा की जननी है।  उरुक्रमः का वास्तविक भावार्थ ईश्वर के गुणों को बताता है और इसलिए ईश्वर का एक अन्य नाम उरुक्रमः भीं है। 

‘उरुर्महान् क्रमः पराक्रमो यस्य स उरुक्रमः’ जो अनन्त पराक्रम-पराक्रम-युक्त है वह उरुक्रम महा पराक्रमयुक्त कहाता है। [इस से] परमात्मा का नाम ‘उरुक्रम’ है।
ईश्वर के अन्य गुणों पर भी  प्रकाश डालते है
(ओमित्येत॰) ओ३म् जिसका नाम है और जो कभी नष्ट नहीं होता, उसी की उपासना करनी योग्य है, अन्य की नही। 
(प्रशासिता॰) जो सबको शिक्षा देनेहारा, सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्वप्रकाश-स्वरूप, समाधिस्थ बुद्धि से जानने योग्य है, उसको परम पुरुष जानना चाहिए॥
(प्राणाय) जैसे प्राण के वश सब शरीर, इन्द्रियाँ होती हैं वैसे परमेश्वर के वश में सब जगत् रहता है॥
(शकॢ शक्तौ) इस धातु से ‘शक्ति’ शब्द बनता है। ‘यः सर्वं जगत् कर्तुं शक्नोति स शक्तिः’ जो सब जगत् के बनाने में समर्थ है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘शक्ति’है।
ईश्वर सत्य है, शिव है, सुंदरतम है और महान रचनाकार है, वह उरुक्रमः है ।
सर्व व्यापक ईश्वर की उपईश्वर को अलग अलग सैकड़ों नामों से पुकारना ग़लत नहीं है लेकिन उसके सत्य स्वरूप को जानना उसका ज्ञान लेकर आस्था रखना बुद्धीमत्ता है।

आशा है आपको मुरगन पूजा रहस्य समझ आ गया होगा।

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