भारतीय परिवारों की भौतिक आस्तियों में अतुलनीय वृद्धि दृष्टिगोचर है

Poor Indian children keeping their hands up and asking for support.

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किसी भी देश के लिए शुद्ध वित्तीय बचत की दर अधिक होना अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा मापदंड माना जाता है क्योंकि वित्तीय बचत की राशि अंततः पूंजी निर्माण करते हुए देश के आर्थिक विकास को गति देने में मुख्य भूमिका निभाती है। बचत दरअसल दो प्रकार की होती है, एक, वित्तीय बचत एवं द्वितीय, भौतिक आस्तियों के रूप में की गई बचत। भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग द्वारा जारी एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि भारत के परिवारों में हाल ही के समय में वित्तीय बचत की दर कुछ कम होकर परिवारों द्वारा भौतिक आस्तियों के रूप में की गई बचत में अतुलनीय वृद्धि दृष्टिगोचर हुई है।

भारत में परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत जो केंद्र एवं राज्य सरकारों एवं गैर वित्तीय संस्थानों के लिए आय का मुख्य साधन है, वित्तीय वर्ष 2022-23 में गिरकर सकल घरेलू उत्पाद का 5.1 प्रतिशत रह गई है। यह बचत दर वित्तीय वर्ष 2020-21 में 11.5 प्रतिशत एवं कोरोना महामारी खंडकाल के पूर्व वित्तीय वर्ष 2019-20 में 7.6 प्रतिशत थी। ऐसा कहा जा रहा है कि परिवारों की शुद्ध वित्तीय बचत दर पिछले 50 वर्षों के खंडकाल में सबसे कम दर है। परंतु, यह तथ्य सही नहीं है, क्योंकि परिवारों की बचत दर को वित्तीय बचत एवं भौतिक आस्तियों की रूप में की गई बचत को मिलाकर देखा जाना चाहिए। वित्तीय बचत दर किसी वित्तीय वर्ष में कम इसलिए हो सकती है, क्योंकि परिवारों द्वारा उस वर्ष में भौतिक आस्तियों के रूप में अधिक मात्रा में बचत की गई हो।

कोरोना महामारी के चलते एक तो कई परिवारों की आय में कमी दर्ज हुई एवं कई परिवारों को तो बैकों से ऋण लेकर अपने परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करनी पड़ी थी। कोरोना महामारी खंडकाल के दौरान वित्तीय वर्ष 2019-20 में भारतीय परिवारों का ऋण, सकल घरेलू उत्पाद का 40.7 प्रतिशत था, जो जून 2023 में घटकर 36.5 प्रतिशत रह गया है। इस प्रकार कोरोना महामारी के बाद के खंडकाल में भारतीय परिवारों द्वारा बैंकों से लिए गए ऋण की किश्तें भी समय पर चुकाई गई हैं जिससे वित्तीय बचत की वृद्धि दर पर विपरीत असर पड़ा है। वैसे भी, भारतीय परिवार बैकों एवं अन्य वित्तीय संस्थानों से ऋण लेने में हिचकते हैं। जबकि अन्य देशों के नागरिक बैंकों एवं वित्तीय संस्थानों से ऋण लेने में बिलकुल नहीं हिचकते हैं जैसे चीन के परिवारों पर सकल घरेलू उत्पाद का 62 प्रतिशत ऋण है।

दूसरे, कोरोना महामारी के खंडकाल के दौरान भारत में जमाराशि पर ब्याज की दरें भी बहुत कम थी जिसके कारण भारतीय परिवार वित्तीय बचत न करते हुए किसी तरह अपने दैनंदिन खर्चों की पूर्ति कर पा रहे थे। साथ ही, कोरोना महामारी के तुरंत बाद के खंडकाल में जब देश में आर्थिक स्थिति तेजी से सुधारने लगी एवं जब बैकों से प्राप्त की जा रही ऋणराशि पर ब्याज की दर बहुत कम थी तब कई परिवारों द्वारा बैकों से ऋण प्राप्त कर इस राशि का उपयोग मकान का निर्माण करने पर, बच्चों की शिक्षा पर एवं वाहन खरीदने पर खर्च किया जाने लगा। यह तर्क वित्तीय क्षेत्र के बचत एवं बैकों के ऋण सम्बंधी आंकड़ो से भी सिद्ध होता है। इस दौरान बैकों की वित्तीय देयताओं में 8.2 लाख करोड़ रुपए की वृद्धि दर्ज हुई है (इसमें परिवारों द्वारा व्यावसायिक बैंकों से उधर ली गई 7.1 लाख करोड़ रुपए की ऋणराशि भी शामिल है), जो शुद्ध वित्तीय बचत की राशि 6.7 लाख करोड़ रुपए से कहीं अधिक है। इस कारण से शुद्ध वित्तीय बचत की राशि में 1.5 लाख करोड़ रुपए की राशि से कमी दर्ज हुई है, जो सकल घरेलू उत्पाद का 2.5 प्रतिशत है। जबकि इस दौरान बीमा, प्रॉविडेंट एवं पेंशन फंड में 4.1 लाख करोड़ रुपए की राशि की वृद्धि भी दर्ज हुई है। परिवारों द्वारा बैंकों से ली गई उक्त वर्णित ऋणराशि में से 55 प्रतिशत राशि भौतिक आस्तियों जैसे मकान निर्माण एवं वाहन आदि खरीदने हेतु उपयोग किया गया है।

वित्तीय वर्ष 2012 में भारतीय परिवारों की कुल बचत में भौतिक आस्तियों के रूप में की गई बचत का हिस्सा 66 प्रतिशत था जो वित्तीय वर्ष 2021 में घटकर 48 प्रतिशत रह गया था। परंतु इस प्रवर्ती में एक बार पुनः परिवर्तन होता दिखाई दे रहा है और भौतिक आस्तियों के रूप में की जाने वाली बचत का कुल बचत में हिस्सा वित्तीय वर्ष 2023 में 70 प्रतिशत रहने की सम्भावना है। वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारतीय परिवारों की कुल बचत (वित्तीय एवं भौतिक आस्तियों में वृद्धि मिलाकर) वित्तीय वर्ष 2021-22 की तुलना में कहीं अधिक रहने की सम्भावना है।

भारतीय परिवारों द्वारा गृह निर्माण एवं वाहन खरीदने पर अधिक खर्च करने के चलते एवं कम ब्याज दरों के कारण वित्तीय बचतें प्रभावित हुई हैं हालांकि इससे परिवारों की भौतिक आस्तियों में जरूर बहुत अच्छी वृद्धि दर अर्जित की गई है। इससे अर्थव्यवस्था को गति ही मिली है। उत्पादों का उपभोग बढ़ रहा है, जिससे कम्पनियों द्वारा अधिक उत्पादन किया जा रहा है। विनिर्माण इकाईयों की उत्पादन क्षमता के उपयोग में वृद्धि दर्ज हुई है जो आज लगभग 77 प्रतिशत तक पहुंच गई है। विनिर्माण इकाईयों में रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं। अतः कुल मिलाकर यदि परिवारों के भौतिक आस्तियों में अधिक वृद्धि दर्ज की जाती है तो यह अर्थव्यवस्था के लिए एक अच्छी खबर की कही जानी चाहिए।

भारतीय परिवार आज अपनी बचत का अधिक हिस्सा पूंजी निर्माण हेतु खर्च कर रहे हैं। गृह निर्माण एवं वाहन आदि खरीदने की मद पर अधिक खर्च किया जा रहा है। वित्तीय वर्ष 2022 में परिवारों की शुद्ध बचत का 60 प्रतिशत हिस्सा पूंजी निर्माण पर खर्च किया गया है, जो वित्तीय वर्ष 2015-16 में 53.2 प्रतिशत था, जबकि वित्तीय वर्ष 2022-23 में यह 68 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। साथ ही, परिवारों द्वारा बैकों एवं वित्तीय संस्थानों से मकान निर्माण हेतु एवं वाहन आदि खरीदने हेतु लिए जाने वाले ऋणराशि में भी वृद्धि दिखाई दे रही है, जो कि एक अच्छा संकेत है। एक अध्ययन प्रतिवेदन के अनुसार, मकान निर्माण हेतु ऋण एवं भौतिक आस्तियों में वृद्धि के बीच सामंजस्य दिखाई देता है। यदि मकान निर्माण हेतु ऋण में एक रुपए की वृद्धि होती है तो भौतिक आस्तियों में 2.12 रुपए की वृद्धि दर्ज होती है। इस प्रकार, भारत में परिवारों द्वारा बैंकों से लिए जा ऋण का उपयोग उत्पादक कार्यों के लिए किया जा रहा है।

यहां यह वर्णित करना आवश्यक होगा कि भारतीय परिवार की परिभाषा में व्यक्ति, गैर सरकारी, गैर निगमित संस्थान जैसे व्यक्तिगत संस्थान, साझेदारी संस्थान आदि शामिल हैं।

प्रहलाद सबनानी
सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – psabnani@rediffmail.com

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