हिन्दूवादी राष्ट्रवाद बनाम कांग्रेसी राष्ट्रवाद

कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर का एक लेख मैं पढ़ रहा था। जिसमें उन्होंने आरएसएस और अन्य हिंदूवादी संगठनों की इस चिंता को निरर्थक सिद्घ करने का प्रयास किया है कि भारत में मुस्लिमों की जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही है उससे शीघ्र ही भारत में मुस्लिम राज्य स्थापित हो जाएगा। लेखक का मंतव्य है कि (अब से दो दशक पूर्व) हिंदू और मुस्लिमों की जनसंख्या वृद्घि का अंतर मात्र 01.15 प्रतिशत का है। अब यदि यह अंतर यथावत बना रहता है तो अगले एक हजार वर्ष में हिंदुओं और मुस्लिमों की आबादी बराबर हो पाएगी। इस प्रकार मणिशंकर अय्यर की मानें तो अगले एक हजार वर्ष के लिए मुसलमानों को वह स्थिति लोकतंत्र में पैदा नही होने वाली जिससे ये कहा जा सके कि वे भारत में अपना राज्य स्थापित कर लेंगे। मणिशंकर अय्यर लगता है कि ये मानकर चलते हैं कि जब मुस्लिम आधे से अधिक हो जाएंगे कच्छाधारियों की चिंता तभी समझ में आएगी उससे पहले की उनकी चिंता निरर्थक है।मणिशंकर अय्यर अपनी इस मान्यता में कई भ्रांतियों के शिकार हैं। एक तो ये कि वह हिंदू मुसलमानों की वर्तमान जनसंख्या को यथावत मानकर चलते हैं और उसी में बच्चे अधिक पैदा करने की होड़ को चलता हुआ देखते हैं। वह मुस्लिमों के द्वारा हिंदुओं के बलात धर्मान्तरण, लव जिहाद, कश्मीर से हिंदुओं के पलायन, संस्कृति और इतिहास के साथ छेड़छाड़ करके कम्युनिस्ट ढंग से तैयार किये गये तथ्यों को छात्रों को परोस कर उन्हें हिंदू विरोधी बनाने और भारत में अन्य विदेशी ताकतों द्वारा चलाये जा रहे कुचक्रों की पूर्णत: उपेक्षा करते हैं। जिनसे भारत में मुस्लिम जनसंख्या की वृद्घि दर बढ़ती है। इसके साथ ही पाकिस्तान और बंगलादेश से आने वाले करोड़ों मुसलमान भारत में आकर जिस प्रकार जनसांख्यिकीय आंकड़ों को बिगाड़ रहे हेँ उस पर भी वह चुप हैं।दूसरे मणिशंकर अय्यर अपने लेख में यह नहीं समझ पाये हैं कि मुस्लिमों को भारत में बराबर की जनसंख्या में आकर अपना राज्य कायम करने की आवश्यकता नहीं है। वह चौथाई होने पर भी अपना काम कर सकते हैं उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपना यह काम मुलायम सिंह की सपा को सत्ता सौंपकर करके भी दिखा दिया है। अगला चुनाव वह मुस्लिमों की पीस पार्टी के लिए लड़कर दिखाना चाहते हैं। भारत में केन्द्र में शासन करने वाली कोई भी सरकार कभी 30 प्रतिशत से अधिक मत नहीं ले पायी है। ऐसी सरकारें भी आयी हैं जिन्होंने 25-26 प्रतिशत मत लेकर ही देश पर शासन किया है। वर्तमान सरकार की भी यही स्थिति है। इस पर मुसलमानों की सोच ये रहती है कि वह हिंदुओं को जातीय आधार पर बांटना चाहते हैं। हिंदू ब्राहमण, ठाकुर, जाट, गुर्जर, यादव आदि जातियों में विभाजित रहे और मुस्लिम इनमें से किसी एक या दो के साथ सांठ गांठ करें और सत्ता पर विराजमान हो जायें। मणिशंकर अय्यर मुस्लिमों की इस मानसिकता को समझकर भी उधर से मुंंह फेरकर निकलते से दिखाई देते हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर को कुछ लोगों ने किसी वर्ग विशेष तक बांधने का प्रयास किया है। परंतु वह बहुत की राष्ट्रवादी सोच के व्यक्ति थे। इसलिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर का सम्मान मिलना चाहिए। वह बहुत सी बातों पर नेहरू गांधी से कई गुणा अधिक स्पष्ट और मुखर थे। भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर भी वह गांधी नेहरू से अधिक स्पष्ट थे। उनका मानना था कि मुस्लिम राजनीति अनिवार्यत: मजहबी है और वह केवल हिंदुओं और मुसलमानों के बीच के फर्क केा ही मानती हैं। मुसलमानेां की राजनीति में केवल जीवन के धर्मनिरपेक्ष वर्गों को कोई जगह नहीं है। आर.एस.एस. या किसी भी हिंदूवादी संगठन की ओर से कोई साम्प्रदायिकता नहीं दिखाई जाती। हिंदू वादी संगठन देश में साम्प्रदायिक शक्तियों के कुचक्रों का भण्डाफोड़ करने की जुगत में रहते हैं बस यही उनकी सांप्रदायिकता है। मणिशंकर अय्यर जैसे लोगों की नजरों में ये हिंदूवादी संगठन एक किरकिरी इसीलिए बने रहते हैं कि ये भाण्डा क्यों फोडऩे की कोशिश करते हैं, हमें चुपचाप देश का सौदा क्यों नहीं करने देते हैं? एक तरह से देखा जाए तो हिंदूवादी संगठनों की यह सोच भी बचाव की मुद्रा की है, आक्रामकता की नहीं है। नरेन्द्र मोदी के सुशासन ने सिद्घ कर दिया है कि वो भी बचाव के लिए कहीं आक्रामक हो सकते हैं। लेकिन शांतिपूर्वक राष्ट्र की मुख्यधारा में आस्था रखने वाले किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय को मिटाना उनका उद्देश्य नहीं है। यही हिंदुत्व है। हिंदुओं की जातीय सोच उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। मुसलमान इस पर नजर रखे हुए हैं। इस पर भी डा.भीमराव अंबेडकर ने बहुत पहले स्पष्ट किया था कि मुसलमानों में ध्यान देने वाली बातों में से एक ये भी है कि वे हिंदुओं की कमजोरी का शोषण करते हैं। उनका मानना था कि मुसलमानों ने राजनीति में सामूहिक गुण्डागर्दी का तरीका अपना लिया है।वस्तुत: कांग्रेस मुस्लिमों की हितैषी कभी नही रही। उसने अपनी तुष्टिïकरण की नीति के माध्यम से निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले और बलात्कार, लूट, डकैती मारने वाले या आगजनी करने वाले लोगों को खरीदकर अपना वोट बैंक बनाने का घिनौना प्रयास ही किया है। मणिशंकर अय्यर जैसे लोगों को इतिहास के पन्नों पर दर्ज सबूतों का बारीकी से अवलोकन करना चाहिए। उन्हें ज्ञात हो जाएगा कि 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना के पश्चात ही पं मदनमोहन मालवीय जैसे लोगों को अखिल भारतीय स्तर पर हिंदू महासभा की स्थापना करने का विचार दिमाग में आया था। उनका यह सपना 1915 में पूर्ण हुआ। अत:हिन्दू  महासभा एक सांप्रदायिक दल नहीं था अपितु एक सांप्रदायिकता का प्रतिशोध करने के लिए जन्मा हुआ शिशु था जो तत्कालीन शासन की फूट डालो और राज करो कीनीति का विरोध करने के लिए बाद के सालों में धीरे धीरे मुखर हुआ और परिस्थितियों ने हिंदू महासभा को उस स्थिति में ला दिया कि जहां मुस्लिम लीग का विरोध करने के लिये अकेली ही खड़ी रह गयी। कम्युनिस्ट और कांग्रेस सबसे पहले अंग्रेजों के विभाजन संबंधी प्रस्ताव पर सहमत हो गये। अंग्रेजों और उसकी चाटुकारिता कर रही कांग्रेस को तब हिंदू महासभा या आरएसएस जैसे हिंदूवादी अपने मार्ग में एक रोड़ा ही अनुभव हो रहे थे। इसलिए उनकी घृणा का केन्द्र ये संगठन बने। परिणाम स्वरूप उन्होंने संयुक्त रूप से मुस्लिम सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम-पाकिस्तान को एक स्वाभाविक और जायज संतान के रूप में घोषित किया। हिंदू वादी संगठन तभी से इस संतान को नाजायज करार देते आ रहे हैं और कांग्रेस इसका पक्षपोषण कर रही है। उसके पक्षपोषण से मुस्लिम सांप्रदायिकता और भी विकट होती जा रही है। समस्या का समाधान न होकर उसकी विकरालता बढ़ती जा रही हैं। मुस्लिम मतों का धु्रवीकरण और हिंदू मतों का विखंडन स्थिति को और बिगाड़ रहे हैं। इस स्थिति में मणिशंकर अय्यर की सोच से जो स्थिति एक हजार साल बाद आनी चाहिए थी वह एक दशक में ही ला दी है। इससे स्पष्टï हो जाता है कि कांग्रेस खामख्याली में जीने वाली पार्टी है वह इतिहास से कोई सबक नहीं लेती है और यूं ही अंधियारी गलियों में दीवारों में टक्कर मारती फिरती हैं। हिंदूवादियों के राष्ट्रवाद और कांग्रेस के राष्ट्रवाद में यही अंतर है।

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