देश में संसदीय शासन प्रणाली उपयुक्त है या फिर राष्ट्रपति शासन प्रणाली उपयुक्त है-ऐसी बहस लंबे समय से चलती रही है। कहा जाता है कि श्रीमति इंदिरा गांधी ने अपनी दूसरी पारी के शासन काल में देश में राष्ट्रपति शासन प्रणाली को लागू करने का प्रयास किया था, लेकिन वह असफल रही थीं। क्योंकि उससे संविधान के मूलभूत ढांचे में परिवर्तन किया जाना अपेक्षित था, जिसके लिए उनके पास अपेक्षित बहुमत नहीं था।हमारे देश के राजनीतिक तंत्र के विषय में अब कुछ बातें चिंतनीय हैं। जैसे देश के स्वतंत्र होने से पूर्व देश में 563 रियासतें थीं, जो देश पर शासन कर रही थीं। आजादी के बाद लगा कि अब राजाओं के दिन लद गये और अब यह जरूरी नहीं होगा कि राजकुल में पैदा व्यक्ति ही देश पर शासन करेगा, अपितु एक साधारण से साधारण व्यक्ति भी देश में किसी भी पद पर जा सकेगा। डा. राजेन्द्र प्रसाद को देश का पहला राष्टï्रपति बनते देखकर जनमानस में यह धारण और भी पुख्ता हुई कि लोकतंत्र वास्तव में जनता के द्वारा जनता के लिये जनता के द्वारा शासन है। लेकिन इंदिरा गांधी के काल में संवैधानिक संस्थानों का क्षरण हुआ और उनकी शक्ति का हनन हुआ। उन्होंने राजाओं के प्रीवीपर्स समाप्त कर दिये, लेकिन देश की संसद के लगभग 800 सांसद तथा प्रदेशों की विधानसभाओं के लगभग 4120 विधायक देश के लिए नये राजा खड़े हो गये। सारी राजनीति कुछ चंद परिवारों के इर्द गिर्द सिमट कर रह गयी। उप्र में मुलायम सिंह, मायावती, अजीत सिंह, कल्याण सिंह दीखते हैं, तो हरियाणा में चौधरी देवीलाल, चौधरी भजनलाल, चौधरी बंशीलाल दीखते थे, इसी प्रकार तमिलनाडु में जयललिता, करूणाकरण, करूणानिधि दीखते हैं तो यही स्थिति अन्य राज्यों की है। राष्टï्रीय स्तर पर भी यही स्थिति है। आगे बढते हुए जनसाधारण को इस प्रकार के खानदानी शासकों के वर्चस्व ने पुन: रोक दिया है। इन आधुनिक राजाओं के प्रीवीपर्स भी बड़े भारी हैं। पर कोई नहीं देख रहा उस ओर जिस ओर अंधेरे में देश को लूटा जा रहा है। अब विचारणीय बात ये है कि संसदीय शासन प्रणाली में इन राजाओं को किसने पैदा कर दिया? देश के शासन को लगभग 300 परिवारों की मु_ïी में कैद कर दिया गया है। सारे देश में लगभग 300 परिवार ही ऐसे हैं जो प्रभावी हैं और वह अपने अपने प्रदेशों में सत्ता की सौदेबाजी के लिए अहम भूमिका निभाते हैं। सत्ता इन्हीं के इर्द गिर्द रहती है। लोकतंत्र में अधिनायकों का पैदा हो जाना संसदीय शासन प्रणाली की हार है या जीत है? बात विचारणीय है।दूसरी बात है-हमारे गणतंत्र में हमारे महामहिम राष्ट्रपति और राज्यपाल को देश की एकता और अखण्डता को बनाये रखने के लिए तथा शासक दल की निष्पक्षता को साबित करने के लिए निर्वाचित या नियुक्त किए जाने की व्यवस्था की गयी। प्रधानमंत्री जनतंत्र का प्रतीक है तो राष्ट्रपति गणतंत्र का प्रतीक है। प्रारंभ में हमने एक से एक मंजे हुए राष्ट्रपति और राज्यपाल देखे। लेकिन फिर वही कहना पड़ेगा कि इंदिरा गांधी के शासन काल से इन पदों की गरिमा में भी आशाओं के विपरीत गिरावट आयी और राष्ट्रपति भवन कठपुतलियों का तमाशा बन गया तो राजभवन राजनीति के अखाडे बन गये। राष्ट्रपति और राज्यपाल सरकारी नीतियों के टेपरिकॉर्ड बना दिये गये हैं। वह वही बोलते हैं जो उनसे बुलवाया जाता है। गणतंत्र के प्रधान पर यदि ऐसी बंदिश है कि वह वही बोलेगा जो उससे बुलवाया जाएगा तो फिर यह कैसा निष्पक्ष शासन, कैसा लोकतंत्र? उम्मीद विपक्ष से की जाती है कि वह महामहिमों के भाषण को संसद या विधानमंडलों में ध्यान से सुनें और उनसे बुलवाया जाता है सरकार की नीतियों का संकीर्तन गीत। उनकी निष्पक्षता इससे कहां सुरक्षित रही?जमीरों को बंदिशों की जंजीरों में जकड़ कर कैद किया जाता है और फिर उन्हें महामहिम की उपाधि दी जाती है। महामहिम जिस संस्थान से खड़े होकर बोलते हैं उस संस्थान को लोकतंत्र का सबसे पावन मंदिर कहा जाता है और लोकतंत्र के नाम पर ही उस महामहिम के बोलने पर प्रतिबंध लगाया जाता है। हमारा संविधान यही तो कहता है कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर राष्ट्र की एकता और अखंडता के दृष्टिïगत प्रतिबंध लग सकता है, या उसे सीमित किया जा सकता है। पर इसका अर्थ ये तो नहीं कि आप महामहिम की जमीर का सौदा कर लेंगे या उन्हें अपने ढंग से बोलने के लिए विवश करेंगे। क्या राष्टï्रपति भवन या प्रांतों के राजभवन हारे थके राजनीतिज्ञों की अराम गाह हैं कि जाओ अब यहां पांच साल आराम फरमाओ और बस वह करते रहना जो तुम्हें हम बतायें। या जो तुमसे हम करवाना चाहें। चिन्तनीय विषय है कि यदि ऐसी स्थिति आ गयी है तो यह गणतन्त्र की हार है या जीत। यह अब तय होना चाहिए । विधानमंडलों में तथा संसद में हम देखते हैं कि कितनी ही बैठकों में कोरम जैसे तैसे ही पूरा होता है या होता नहीं है। हमारे मान्यवर सत्रों में उपस्थिति होने में भी कोताही करते हैं। कभी कभी तो पचास साठ की संख्या में जनप्रतिनिधि बैठे होते हैं और संसद की या किसी विधानमंडल की बैठक चल रही होती है। क्या हमने इतने भारी भरकम खर्चों को झेलकर संसदीय शासन प्रणाली इसीलिए अपनायी थी कि हमारे जनप्रतिनिधि विधानमंडलों और संसद की बैठकों को इसी प्रकार उपेक्षा करेंगे? इससे तो बढिया वो रजवाडे ही थे जो अपने पचास साठ दरबारियों के माध्यम से देश की छोटी छोटी रियासतों का शासन चलाते थे। आप सोचें एक जिले की बराबर की एक रियासत को चलाने में लिए पचास साठ आदमी होते थे और आज लगभग छह दर्जन जिलों के एक प्रांत उत्तर प्रदेश को चलाने के लिए विधानमंडलों में यदि इतनी ही संख्या में विधायक बैठे दिखाई दें तो क्या स्थिति आपके मन की होगी। आपको समझने में देर नहीं लगेगी कि कौन सी व्यवस्था उत्तम थी? हम लोकतंत्र के रास्ते पर आगे बढ़े जो धीरे धीरे लोकतांत्रिक राजतंत्र में तब्दील हो गया और आज वह भी विलासिता में ऊंध रहा है। बहुत से विधायक और सांसदों की नीद उस समय टूटती है
जब विधानमंडलों में या संसद में शोर होता है और उन्हें अपनी पार्टी के समर्थन में शोर मचाना पड़ता है। एन.टी. रामाराव ने कभी अपनी पार्टी के विधायकों से गर्वोक्ति करते हुए कहा था कि यदि हमारी पार्टी से गधे को भी टिकट मिल गया तो वह भी जीत जाता। बाद में इस शैली को बहुत से नेताओं ने अपनाया अधिकांश ने ऐसे लोगों को ही टिकट देना ठीक समझा जो अपना दिमाग कम इस्तेमाल करे और जिसे जब जैसे चाहें इस्तेमाल कर लिया जाए।
वस्तुत: यही वो तथ्य है या मनोभाव है जो हमारे देश में राजनीति में प्रतिभाओं के प्रवेश को रोकता है, प्रतिभाहीन लोगों को आगे बढऩे का मौका देता है और लोकतंत्र को किसी परिवार की जागीर बना डालता है। इसी मनोभाव के कारण अच्छे लोग राजनीति की ओर जाना पसंद नहंी करते। फलस्वरूप अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कहावत चरितार्थ होती है। दरबार में कठपुततियों के खेल होते हैं। राजा जैसे कहता है वैसे ही कठपुतलियां नाचती हैं राजा की इबादत करती हैं, प्रतिभा शरमा कर वहां से उठ जाती है। क्योंकि प्रतिभाएं नाचती नहीं हैं वो गीत गुनगुनाती हैं और उनका वह गीत उनके चिंतन का संगीत होता है जो उठते बैठते नई नई इबारतें लिखता है। आज राजनीति के विषय में यह बात भी चिंतनीय है कि हम अपनी इबादत को प्राथमिकता दें या नई इबारत लिखने को प्राथमिकता दें।

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