यूनान के महान, दार्शनिक प्लेटों का एक प्रेरक प्रसंग

यूनान के महान दार्शनिक प्लेटो का जन्म एथेंस में 427 ई.पू. में हुआ था। प्लेटो का जन्म एक प्रसिद्घ तथा अमीर घराने में हुआ था। बीस वर्ष की आयु में वे महान दार्शनिक सुकरात के संपर्क में आए और सुकरात की विलक्षण प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्होंने अपने व्यक्तित्व को सुकरात के व्यक्तित्व में लीन कर दिया। इसलिए प्लेटो सुकरात के सबसे प्रिय शिष्य थे।
एक दिन प्लेटो एथेंस नगर में हो रही एक सभा में पीछे की पंक्ति में आकर चुपके से बैठ गये। सभा के आयोजकों ने उन्हें देख लिया और उनसे मंच पर चलने का आग्रह करने लगे। इस पर प्लेटो ने कहा मुझे मंच पर जाने की आवश्यकता नहीं है। मैं जिधर बैठ जाता हूं लोगों के मुंह स्वत: ही उधर मुड़ जाया करते हैं।
भाव यह है कि अपने अंदर छिपी दिव्य शक्ति को पहचानो और अपनी प्रतिभा को निखारो। यदि तुमने ऐसा किया तो यह संसार प्लेटो की तरह आपका सत्कार करेगा और आपका दीवाना हो जाएगा।
अगर आप सन्मार्ग पर चल पड़े हैं तो यह संसार सबसे पहले आपका मजाक उड़ाएगा तत्पश्चात आलोचना करेगा। फिर भी आप नहीं रूकते हैं तो आपके मार्ग में विघ्न बाधाओं की अड़चन डालेगा। यदि इतने पर भी आप सन्मार्ग पर बढ़ते रहे तो चोट पहुंचाएगा। आरोप लगाएगा, अपमानित करेगा। इस अंतिम परीक्षा में यदि आप उत्तीर्ण होते हैं तो आपकी दृढ़ संकल्प शक्ति के आगे हार जाएगा और चरणों में मस्तक झुकाएगा फिर आपका व्यक्तित्व महापुरूष कहलाएगा।
मनुष्य का अंतर अनंत शक्तियों का स्रोत है
इस नश्वर संसार में सभी जन्मते हैं और शनै: शनै: मृत्यु को प्राप्त होते हैं किंतु ऐसे व्यक्ति बिरले ही होते हैं जो साधारण व्यक्तित्व में असाधारण गुणों से अलंकृत होते हैं। ऐसे व्यक्ति ही महापुरूष कहलाते हैं। उनका नाम इतिहास में तो स्वर्णाक्षरों में अंकित होता ही है किंतु जनसाधारण के मानस के मुकुर में वे मोती की तरह चमकते हैं और युगों युगों तक याद किये जाते हैं जैसे राम, कृष्ण, गौतमबुद्घ और भगवान महावीर विभिन्न आविष्कारक, समाज सुधारक, लोकोपकारक, अन्वेषक सत्योपदेशक, वीरव्रतधारी और अनेकों क्रांतिकारी इत्यादि।
सर्वदा याद रखो, मनुष्य के अंतर में अनंत दिव्य शक्तियां सोयी हुई हैं। उन्हें जगाने की आवश्यकता है अन्यथा वे सोयी ही रह जाएंगी। उदाहरणार्थ पृथ्वी के अंदर अनेक बहुमूल्य खनिज पदार्थ जैसे सोना, चांदी, लोहा, तांबा, कोयला, प्राकृतिक गैस और पैट्रोल इत्यादि छिपे पड़े हैं किंतु इनका दोहन और सदुपयोग कौन करेगा? वहीं, भूवैज्ञानिक जो पृथ्वी के गर्भ के रहस्यों को जानता है। जिसे इनके दोहन और सदुपयोग की विधि आती है अन्यथा ये पृथ्वी के अंदर ही छिपे रह जाएंगे। इसमें पृथ्वी का क्या दोष है? इतना ही नहीं पृथ्वी में अनेकों खाद्य पदार्थ अन्न औषधियां व वनस्पति फल और सूखे मेवे छिपे पड़े हैं किंतु इन्हें प्राप्त वही करता रहेगा जो इन्हें उगाने की विधि जानता है कोई दूसरा नहीं। अन्यथा भूमि बंजर पड़ी रह जाएगी। इसमें भूमि का क्या दोष? ठीक इसी प्रकार परमपिता परमात्मा ने मनुष्य को अनंत दिव्य शक्तियां प्रदान की हैं यदि उन्हें जगाया नही गया तो वे निरर्थक रह जाएंगी। इन दिव्य शक्तियों को जगाने के लिए परमात्मा ने प्रज्ञा दी है जिसे आत्म प्रज्ञा भी कहते हैं। इसी को तीसरा नेत्र भी कहते हैं। जीवन में जिनका यह तीसरा नेत्र खुल गया, उनका जीवन की चमोत्कर्षी हो जाता है। दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बन जाता है। पत्थर में आग छिपी है, शीतल जल में विद्युत छिपी है किंतु इसे प्रकट वही कर सकता है जिसकी प्रज्ञा को यह विधि आती है। बांस में बांसुरी छिपी है और बांसुरी में मीठे स्वर छिपे हैं किंतु इन स्वर लहरियों को वही निकाल सकता है जिसकी प्रज्ञा को यह विधि आती हो। ऐसा व्यक्ति अपनी स्वर लहरियों से फिजा का रंग बदल देता है। यहां तक कि मनुष्य को ही नहीं अपितु पशुओं को भी मंत्रमुग्ध कर देता है। इसीलिए मृग अपनी मृत्यु से बेखबर हो, उस ओर चल देता है जिस ओर से उसे बांसुरी की धुन सुनाई देती है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य अपने अंतर में सोयी हुई दिव्य शक्तियों को पहचान कर इस जीवन रूपी बांसुरी को जब निश्छल और निष्काम भाव से बजाता है तो मृग की तरह यह संसार उसका दीवाना बन जाता है।
ऐसा व्यक्ति इतिहास पुरूष ही नहीं अपितु देव पुरूष तक बन जाता है। अत: अपने अंतर में छिपी अनंत दिव्य शक्तियों को पहचानिये। जीवन जीने की विभिन्न विद्याओं को जानिये। आत्म प्रज्ञा को जगाइए और अपने जीवन को चर्मोत्कर्षी बनाइए।

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