‘तुम दिन को अगर रात कहो तो हम भी रात कहेंगे’ भारत की सरकारों की सोच पश्चिम के विषय में यही है। पश्चिमी देश जो कहते हैं और करते हैं-उसे भारत सरकार आंख मूंदकर ग्रहण कर लेती है। भारत की पर्यावरण नीति भी ऐसी ही है, जैसी कि पश्चिमी देशों की है। कोई नया आदर्श नहीं, कोई नयी सोच नहीं। यदि आपने पश्चिमी सोच को पकड़ लिया तो भारत में ऐसा माना जाता है कि अब किसी परीक्षण या निरीक्षण की आवश्यकता नहीं है। किंतु यदि आपने अपने भारतीय दृष्टिकोण को अपना लिया अथवा उसे परीक्षण के लिए भी प्रस्तुत कर दिया तो सौ बातें खड़ी कर दी जाएंगी।
उदाहरण के लिए आप ‘वैदिक यज्ञ विज्ञान’ को ले सकते हैं। भारत में अब ऐसे मूर्ख और नास्तिकों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है जो यज्ञ विज्ञान को रूढि़वादी कहकर छोडऩा चाहते हैं, अन्यथा इसे घी और सामग्री को फंूकने की मूर्खता से आगे और कुछ नहीं मानते। यज्ञ को ऐसा मानने वालों की गलती कम है, अधिक दोष सरकारी उपेक्षावृत्ति का है-जो इधर ध्यान देना ही नहीं चाहती। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पर्यावरण नीति के परिप्रेक्ष्य में हमारे लिए अपेक्षित था कि हमारी सरकार विश्व स्तरीय वैज्ञानिकों की एक समिति गठित करती। यह समिति भारत के यज्ञविज्ञान और पर्यावरण के सह संबंध को आख्यापित करती। जो निष्कर्ष निकलते उन्हें मानवता की थाती मानकर सबके लिए प्रस्तुत किया जाता और पर्यावरण संतुलन को बनाये रखने के लिए उसका उपयोग और उपभोग किया जाता।

आर्य भूमि भारत
भारत की आज तक की सरकारें संसार के समक्ष ‘यज्ञ विज्ञान और उसके रहस्य’ को समझाने और बताने के लिए अंशमात्र भी क्रियाशील नहीं रहीं। संस्कृति मंत्रालय भारत की मिलीजुली संस्कृति के पाठ पढ़ाता रहा और उसके लिए काम करने वालों को पारितोषिक और पारिश्रमिक प्रदान करता रहा।
परिणामस्वरूप भारत ने अपना स्वर्णिम अतीत स्वयं शेष संसार की दृष्टि से ओझल कर दिया। जिसकी परिणति हम देख रहे हैं कि संसद से लेकर सडक़ तक के लोग भारत में आर्यों को विदेशी कहकर उन्हें निकालने की बात कर रहे हैं।
मुस्लिम वर्ग के कुछ युवाओं की एक गजल मुझे दिखायी गयी जिसके भावों को देखकर मैं दंग रह गया। उसमें आशय यह था कि इतिहास के पन्नों पर हमारी ही छाप मिलेगी। लालकिला, ताजमहल, कुतुबमीनार सब हमने हिंद को दिये हैं, शानदार ढंग से शासन करना हमको आता है। हिंद का हिंद के पास अपना कुछ नहीं, उसके पास जो कुछ भी है-वह हमारी देन है।
ऐसा लिखना उनका दोष नहीं है, दोष हमारा है जिन्होंने स्वयं ऐसे सत्ताधीश बनाये कि उन्होंने अपना इतिहास लोगों के सामने प्रस्तुत करने में लज्जा का अनुभव किया। उनका यह आचरण देश, धर्म और जाति के साथ छल है, जिसके लिए युग-युगों तक उन्हें नरक की आग में जलना पड़ेगा। 

भारतोन्मुख विश्वधारा
आज विश्व स्वयं भारत की ओर आकर्षित हो रहा है। भारत के यज्ञ-विज्ञान ने विश्व के वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। पर्यावरण संतुलन की गड़बड़ी ने विज्ञानवेत्ताओं के कान खड़े कर दिये हैं। जिससे वे लोग पर्यावरण संतुलन के प्रबंधन के लिए भारतीय ऋषियों के स्वानुभव यज्ञ विज्ञान के रहस्य को समझने के लिए आतुर दिखलाई दे रहे हैं। किंतु भारत का राजनीतिक नेतृत्व इस समय भी इस ओर से निश्चेष्ट है। इसके ऐसे आचरण का मूल कारण है ‘धर्मनिरपेक्षता।’ इस एक शब्द के कारण हिंदुत्व को इस पावन देश में जितनी क्षति उठानी पड़ी है उतनी किसी अन्य के कारण नहीं उठानी पड़ी। इसलिए यज्ञ विज्ञान को भी हमने उपेक्षित कर दिया है-फिर चाहे उसके कितने ही लाभ क्यों न हों?
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)

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