निजी सुरक्षा के नाम पर अर्थशक्ति का अपव्यय, भाग-4

सेना में मुस्लिमों को आरक्षण
देश की सुरक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ करते हुए अब देश की सशस्त्र सेनाओं में मुस्लिमों को आरक्षण दिया जा रहा है। इसका परिणाम क्या होगा?
भविष्य में पाकिस्तान से यदि भारत का युद्घ हुआ तो वही आशंका रहेगी कि जो राजा दाहिर से लेकर सन् 1947 में राजा हरिसिंह की सेना में तैनात मुस्लिम सैनिकों की स्व राष्ट्र से विद्रोह के रूप में हमने देखी थी, तब निसंदेह हमारी सुरक्षा व्यवस्था चरमरा जाएगी। हमारे चूहे (नेता) तो आज भी बिलों में घुसे हुए हैं और तब भी घुसे रहेंगे, क्योंकि ये राष्ट्र के जामाता हैं, जिनको सुरक्षा प्रदान करना और इनकी मूर्खताओं को झेलना राष्ट्रवासियों के भाग्य की विवशता है।
गनर की वापसी सहज संभव नहीं
जहां-जहां भी हमारे माननीय जनप्रतिनिधियों को गनर मिले हुए हैं-उन्हें वापस लेना सहज संभव नहीं है। उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ‘श्रीराम अरूण’ और प्रमुख सचिव रहे ‘नरेश दयाल’ के अनुभव यही बताते हैं। इसके अतिरिक्त पूरे देश के अन्य उच्चाधिकारी अपनी सेवानिवृत्ति के पश्चात जब कोई सार्वजनिक राजनीतिक टिप्पणी करते हुए ‘भीतर की बात’ से पर्दा उठाते हैं तो जो सच निकलकर सामने आता है, वह रोंगटे खड़े करने वाला होता है। आप देखकर दंग रह जाएंगे कि किसी मंत्री ने सार्वजनिक संपत्ति का दुरूपयोग किस प्रकार किया था और सरकारी सुविधाओं को किस प्रकार निजी उपयोग में लिया था? इसीलिए वे गनर को चुनाव हारने के पश्चात या पद से हटने के पश्चात भी अपना जन्मसिद्घ अधिकार मानते रहते हैं। हमारे गणमान्यों को वर्दीधारी गनर ही पसंद हैं। इसके लिए ‘दैनिक जागरण’ ने 13 फरवरी सन 2005 ई. के अंक में लिखा है कि वर्दीधारी गनर रेलवे का टिकट लेने, फोन व अन्य बिलों को जमा करवाने, शादी बारात में फायरिंग करने से लेकर ‘मेम साहिबा’ को सब्जी खरीदवाने में शैडो की अपेक्षा अधिक सहायक होते हैं। उनकी वर्दी और कंधे पर लटकी स्टेनगन या ए.के. 47 के प्रभाव में लोग शीघ्रता से उसका काम कर देते हैं। इस प्रकार सरकारी पैसे से हमारे जनप्रतिनिधि एक घरेलू नौकर पाने में सफल हो जाते हैं। अत: इस सुविधा को सहज रूप से खोने में उनका हृदय रोता है।
वैसे भी जिसने राष्ट्र की कुछ सेवा की हो-उसको बदले में इतनी सुविधा प्राप्त करने का तो अधिकार भी है। अब न तो चाणक्य रहे हैं जो घर में राजकीय कार्य करते हुए ही राजकोष के पैसे से दीपक जलाते थे, शेष समय घरेलू कार्यों के लिए या व्यक्तिगत वात्र्तालाप के लिए घर का तेल और घर का दीया काम में लाया जाता था, और न ही वे नि:स्वार्थ क्रांतिकारी और राष्ट्रभक्त लोग रहे हैं-जो राष्ट्र की सेवाओं का प्रतिफल नहीं चाहते थे। ऐसे आदर्श लोगों की ओर जब हम देखते हैं तो आज स्वार्थ में डूबे राजनीतिज्ञों को देखकर मन दु:खी हो उठता है।
उपाय क्या है?
हमारे देश का पुलिस विभाग जनसेवा के लिए है। उसे केवल उसी के लिए रखा जाए। नेताओं को मिलने वाले गनर और सुरक्षाकर्मियों के लिए अलग से विभाग गठित किया जाए। उसका वार्षिक बजट प्रस्तुत किया जाए। उसकी सारी व्यवस्था पर होने वाले सारे व्यय का विवरण राष्ट्र की संसद और प्रदेशों की विधानसभाओं में सार्वजनिक किया जाए।
सूचना का अधिकार आज हमारा मौलिक अधिकार है। तब ऐसी परिस्थितियों में सारे देश में हमारे नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था, सुरक्षा काफिलों और सभाओं पर क्या व्यय हो रहा है? और कहां से हो रहा है?- यह सारी बातें और सूचनाएं राष्ट्र के जनसाधारण को बतायी जायें। हमारा आम बजट क्यों घाटे में जाता है? तब हो सकता है कि इस रहस्य पर से भी पर्दा उठ जाए। क्योंकि एक पर्दा निचले वाले पर्दे को उठाने में सहायक बन जाया करता है। पर्दे के पीछे की गतिविधियों का पता यदि लग जाए तो पर्दे के पीछे के पर्दे का भी कुछ पता लगना संभव है। हमें इस ओर पग उठाना चाहिए।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
The meaning of personal safety in the name of waste, Part-3

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