भारत का सैन्य विज्ञान और हाइफा के बलिदानी

भारत की सेना का इतिहास अत्यंत गौरवपूर्ण है और इसका कारण यह है कि भारत ही विश्व का वह प्राचीनतम और पहला देश है जिसने जीवन को उन्नति में ढालने के लिए सर्वप्रथम सैन्य विज्ञान की उत्कृष्टतम खोज की। शेष विश्व तो यह आज तक भी समझ नहीं पाया कि सैन्य विज्ञान क्या होता है?
आइये विचार करें कि भारत के सैन्य विज्ञान और शेष विश्व के ‘सैन्य संगठन’ में क्या अंतर है? पहले सैन्य विज्ञान और सैन्य संगठन को समझते हैं। सैन्य विज्ञान में सुव्यवस्था है, अनुशासन है, उत्कृष्टता है, मर्यादा है, और कुछ नियमों का पालन करने की और शांति के लिए खतरा बन गये दुष्टों के संहार करने का उत्कृष्टतम मानवीय उद्देश्य है। दुष्टों का संहार कर सज्जनों की रक्षा करना ईश्वरीय कार्य है, एक यज्ञ है और यह यज्ञ भारतीय राजधर्म का आभूषण है। यज्ञ स्वयं में एक विज्ञान है। ऐसे लोकमंगलकारी विज्ञान की रक्षा करना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है। इस विज्ञान शब्द से पूर्व ज्ञान व प्रज्ञान शब्दों को भी समझना होगा। ज्ञान पठित, लिखित व श्रुत होता है, जबकि प्रज्ञान आत्मानुभव में आया हुआ, साक्षात्कृत व अनुभूत होता है। इन दोनों को लोकहित में लगाकर ऐसी उत्कृष्ट संवेदनशील और पवित्र व्यवस्था का आविष्कार अनुसंधान करना विज्ञान है जो सार्वजनीन हो, सबके लिए हितकारी हो और सबको उन्नति के समान अवसर उपलब्ध कराती है। वेद ऐसे हमारे मन को जो ”यत्प्रज्ञान मुतचेतो धृतिश्च…” अर्थात जो प्रज्ञानमय हो, और हमें शिवसंकल्पमयी बनाने की भावना पर बल देता है। सारी व्यवस्था जब लोककल्याण के मंगलगीत गाती हो तो उस व्यवस्था का आधार भी विज्ञान हो जाता है और सेना इस व्यवस्था का एक अंग होती है, जो इसलिए स्थापित की जाती है कि यदि कहीं व्यवस्था में विकार आने लगे तो उसका उपचार किया जा सके। व्यवस्था में विकार का उपचार विज्ञान से ही संभव है। अत: भारत ने अपने सैन्यबल को भी विज्ञानमय=यज्ञमय=लोकोपकारी बनाया-यह भारत की बहुत बड़ी उपलब्धि है और विश्व को बहुत बड़ी देन है।
अब आते हैं सैन्य संगठन पर। सैन्य संगठन के लिए आवश्यक नहीं है कि वह किसी बड़े उद्देश्य को लेकर अर्थात लोकोपकार की अति पवित्र व्यवस्था की स्थापना को लेकर गठित किया गया हो। यह किसी दूसरे देश की धन संपदा को लूटने या किसी संप्रदाय को समाप्त करने, उसकी महिलाओं को प्राप्त करने आदि के उद्देश्य से भी गठित किया जा सकता है। जहां भारत के सैन्य विज्ञान में ‘इदन्नमम्’ का भाव है वहीं विदेशों के सैन्य संगठन में ‘सब कुछ मेरा’ का भाव है, स्वार्थवाद है और इस स्वार्थ के लिए लडऩे-मरने व कटने-काटने का दानवी भाव है। पिछले दो हजार वर्ष का मानवता का इतिहास इसी लूट-खसोट की भावना पर आधारित रहा है। इस प्रकार के सैन्य संगठनों ने एक संविदा की कि अमुक देश पर हमला करते हैं, जो माल वहां से लूट में मिलेगा उसे परस्पर बांट लिया जाएगा। ऐसी भावना के वशीभूत होकर किये गये ऐसे हमले लुटेरों के या डकैतों के हमले जैसे ही थे, उनमें सैन्य विज्ञान के विपरीत भाव दिखता था। जहां भारत की सेना ‘शिवसंकल्प’ (सत्य, संयम, दृढ़ता पवित्रता और अमृत का नाम शिव है और इनकी रक्षार्थ लिया गया व्रत संकल्प है) लेकर युद्घ करती थी और धर्म की (विश्व के नैतिक नियमों का समुच्चय धर्म है) रक्षार्थ युद्घ करती थी, वहीं सैन्य संगठनों ने अशिवसंकल्पी होकर युद्घ किये, इसलिए ऐसे सैन्य संगठन संसार में सत्य, संयम, दृढ़ता, पवित्रता और अमृतभाव की रक्षा नहीं कर पाये, अर्थात मनुष्यों को शिवसंकल्पमयी नहीं बना सके।
मेरा भारत महान है, क्योंकि वह सत्य, संयम, दृढ़ता, पवित्रता और अमृत की रक्षा का शिवसंकल्प लेकर विजयपथ पर आगे बढ़ता है। मि. वार्ड जैसे विदेशी लेखक का कथन है कि हिंदू लोग युद्घकला का बार-बार निरीक्षण करते थे, अर्थात समय समय पर युद्घ का अभ्यास करते थे। यह सुनिश्चित है कि हिन्दू राजा युद्घ के समय अपनी सेना का स्वयं नेतृत्व करते थे और इस कार्य को संपादित करने के लिए उन्हें सैन्य-विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी।
पाठकवृन्द! मेरा यह लेख भारत के उन अमर सैनिकों के लिए समर्पित है जिनकी चर्चा प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा के समय ‘हाइफा के शहीदों’ के रूप में बार-बार की गयी है। हमारे वे बलिदानी दिल्ली में तीन मूत्र्ति चौराहे पर बने स्मारक के माध्यम से हमारे बीच उपस्थित रहे हैं, सेना भी उनके सम्मान में प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को ‘हाइफा-दिवस’ मनाती रही, पर हमें उनके विषय में कुछ बताया नहीं गया। हां, इजराइल ने हमारे इन शहीदों को अवश्य याद रखा और वह भी इनके सम्मान में प्रत्येक वर्ष की 23 सितंबर को ‘हाइफा-दिवस’ मनाता रहा। हमारे सैनिकों के उस बलिदान ने इजराइल को भारत का मित्र बनाये रखा और आज जब देश के शत्रु भारत को मिटाने की रणनीतियां बना रहे हैं-तब हमारे उन बलिदानियों का अमर बलिदान इजराइल से युद्घ के आधुनिकतम हथियारों को हमारे लिए दिलाने में समर्थ हुआ है। मानो अपने देश पर आये संकट को देखकर हमारे अमर बलिदानी परलोक में भी बेचैन हैं, और वहां से भी प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे देश भारत का सैन्य विज्ञान विजयी हो।
1918 में जब ब्रिटिश कमाण्डर हाइफा युद्घ से कतराने लगे थे-तब मेजर दलपत सिंह के नेतृत्व में भारतीय सेना ने वह युद्घ जीता था, वह ‘हीरो ऑफ हाइफा’ कहलाये पर आज लगभग एक शताब्दी पश्चात वह और उनके सभी साथी ‘मां भारती के सच्चे सपूत’ के उत्कृष्टतम सम्मान से सम्मानित हुए हैं-जब हमारे प्रधानमंत्री ने उनके बलिदान से अभिभूत इजराइल को ‘राक्षस संहार’ के भारतीय सेना के मूल संस्कार और उद्देश्य के प्रति संकल्पबद्घ करने में सफलता प्राप्त की है। आज सारा देश ‘तन्मेमन: शिवकल्पमस्तु’ का रहस्य समझ रहा है। वेद का विज्ञान लोगों की समझ आ रहा है, धन्य है भारत के ऋषि और उनका विज्ञान।

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