गालव और पयोहरी कृष्णदास की साधना स्थली गलताजी

images (95)

✍️ डॉ. राधे श्याम द्विवेदी
गलताजी जयपुर से 10 कि.मीअरावली पहाड़ियोंमें एक पहाड़ी दर्रे के अंदर निर्मित तीर्थ स्थल है । गैलव ऋषि की तपोभूमि होने के कारण यह “गैलव अजीज” के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। इसका नाम समय के साथ बिगडकर गालव से गलता हो गया। यह आज गलताजी तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। गाल्व ऋषि ने 15वीं शताब्दी पूर्व इस सुरम्य, शांत स्थल को तपस्या के अनुकूल पाकर अपनी तपोभूमि बनाया था।
वे यहां रहते, ध्यान और तपस्या करते थे। वे यहां 100 वर्षों के लिए अपने ‘तपस्या’ का प्रदर्शन किये थे। उनकी तपस्या से प्रसन्न, देवता गण उनके सामने प्रकट हुए और प्रचुर मात्रा में पानी के साथ दिव्यता की आशीर्वाद दिये थे।
घोड़े के दान की कहानी :-
विश्वामित्र तपस्या में लीन थे। ऋषि गालव सिद्ध ऋषि विश्वामित्र के समर्पित शिष्य या पुत्र थे। उसका यह नाम इसलिए मिला क्योंकि वह कठिन समय पर उसकी मां ने उसके गले में रस्सी बांधकर उसे लगभग एक गुलाम के रूप में बेच दिया (गाला)। वह एक समर्पित शिष्य बन गये और उसने अपने गुरु ऋषि विश्वामित्र की सेवा में बहुत मेहनत की। एक दिन उनकी सेवाओं से कार्य करते हुए, विश्वामित्र ने गालव को उन्हें अपने कर्तव्यों से मुक्त कर दिया।
उस समय प्रथा था एक छात्र हमेशा अपने गुरु को अपने प्रशिक्षण और शिक्षा के पूरा होने पर ‘गुरु दक्षिणा’ की पेशकश करता था। लेकिन विश्वामित्र ने गालव से कुछ और लेने से इनकार कर दिया क्योंकि वह पहले ही अपने छात्रों के प्रति पूरी तरह से ऋणी महसूस कर रहे थे।
गालव शिष्य सेवारत थे। धर्मराज ने विश्वामित्र की परीक्षा लेने के लिए वसिष्ठ का रूप धारण किया और आश्रम में जाकर विश्वामित्र से तुरंत भोजन मांगा। विश्वामित्र ने मनोयोग से भोजन तैयार किया किंतु जब तक ‘वसिष्ठ’ रूप-धारी धर्मराज के पास पहुंचे, वे अन्य तपस्वी मुनियों का दिया भोजन कर चुके थे। यह बतलाकर वे चले गये। विश्वामित्र उष्ण भोजन अपने हाथों से, माथे पर थामकर जहां के तहां मूर्तिमान, वायु का भक्षण करते हुए 100 वर्ष तक खड़े रहे। गालव उनकी सेवा में लगे रहे। सौ वर्ष उपरांत धर्मराज पुन: उधर आये और विश्वामित्र से प्रसन्न हो उन्होंने भोजन किया। भोजन एकदम ताजा था। परम संतुष्ट होकर उनके चले जाने के उपरांत गालव मुनि की सेवा-शुश्रुषा से प्रसन्न् होकर विश्वामित्र ने उसे स्वेच्छा से जाने की आज्ञा दी। उसके बहुत आग्रह करने पर खीज कर विश्वामित्र ने गुरु-दक्षिणा में चंद्रमा के समान श्वेत वर्ण के किंतु एक ओर से काले कानों वाले आठ सौ घोड़े माँगे।
गालव निर्धन विद्यार्थी था- ऐसे घोड़े भला कहां से लाता!
चिंतातुर गालव की सहायता करने के लिए विष्णु ने गरुड़ को प्रेरित किया। गरुड़ गालव का मित्र था। वह गालव को पूर्व दिशा में ले उड़ा। ऋषभ पर्वत पर उन दोनों ने शांडिली नामक तपस्विनी ब्राह्मणी के यहाँ भोजन प्राप्त किया और विश्राम किया। जब वे सोकर उठे तब देखा कि गरुड़ के पंख कटे हुए हैं। गरुड़ ने कहा कि उसने सोचा था कि वह तपस्विनी को ब्रह्मा, महादेव इत्यादि के पास पहुंचा दे। हो सकता है कि अनजाने में यह अशुभ चिंतन हुआ हो। फलस्वरूप उसके पंख कट गये। शांडिली से क्षमा करने की याचना करने पर गरुड़ को पुन: पंख प्राप्त हुए। वहां से चलने पर पुन: विश्वामित्र मिले तथा उन्होंने गुरु दक्षिणा शीघ्र प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की।
गरुड़ गालव को अपने मित्र ययाति के यहाँ ले गया। ययाति राजा होकर भी उन दिनों आर्थिक संकट में था।
उनके पास ऐसे घोड़े भी नहीं थे, लेकिन दानी ययाति याचक को खाली हाथ जाने भी कैसे देते। तब उन्होंने अपनी बेटी, जिसे दिव्य कोख का वरदान मिला था, उसे गालव को दान कर दिया। माधवी को यह वरदान मिला था कि उसकी कोख से चार यशस्वी चक्रवर्ती सम्राट उत्पन्न होंगे। इसके बावजूद उसका कौमार्य सुरक्षित रहेगा यानी वह सुंदर कुमारी कन्या बनी रहेगी। राजा ययाति ने गालव से कहा, ‘आप दैवीय गुणों वाली मेरी इस बेटी के बदले अन्य राजाओं से अपनी दक्षिणा के लिए घोड़े पा सकते हैं। ऐसी गुणवान कन्या के लिए तो राजा अपना राजपाट छोड़ दें, घोड़े क्या चीज़ हैं। बाद में, गुरु दक्षिणा पूरी हो जाने पर मेरी बेटी को वापस मेरे यहां छोड़ जाएं।’
अत: ययाति ने सोच-विचारकर अपनी सुंदरी कन्या गालव को प्रदान की और कहा कि वह धनवान राजा से कन्या के शुल्क स्वरूप अपरिमित धनराशि ग्रहण कर सकता है, ऐसे घोड़ों की तो बात ही क्या! कन्या का नाम माधवी था- उसे वेदवादी किसी महात्मा से वर प्राप्त था कि वह प्रत्येक प्रसव के उपरांत पुन: ‘कन्या’ हो जायेगी। किसी भी एक राजा के पास कथित प्रकार के आठ सौ घोड़े नहीं थे। गालव को बहुत भटकना पड़ा।
पहले वह अयोध्या में इक्ष्वाकुवंशी राजा हर्यश्व के पास गया। उसने माधवी से वसुमना नामक (दानवीर) राजकुमार प्राप्त किया तथा शुल्क-रूप में कथित 200 अश्व प्रदान किये।
धरोहर स्वरूप घोड़ों को वहीं छोड़ गालव माधवी को लेकर काशी के अधिपति दिवोदास के पास गया। उसने भी 200 अश्व दिये तथा प्रतर्दन नामक (शूरवीर) पुत्र प्राप्त किया।
तदुपरांत दो सौ घोड़ों के बदले में भोजनगर के राजा उशीनर ने शिवि नामक (सत्यपरायण) पुत्र प्राप्त किया।
गुरुदक्षिणा मं अभी भी 200 अश्वों की कमी थी। माधवी तथा गालव का पुन: गरुड़ से साक्षात्कार हुआ। उसने बताया कि पूर्वकाल में ऋचीक मुनि गाधि की पुत्री सत्यवती से विवाह करना चाहते थे। गाधि ने शुल्क स्वरूप इसी प्रकार के एक सहस्त्र घोड़े मुनि से लिये थे। राजा ने पुंडरीक नामक यज्ञ कर सभी घोड़े दान कर दिये। राजाओं ने ब्राह्मणों से दो, दो सौ घोड़े ख़रीद लिये।
घर लौटते समय वितस्ता नदी पार करते हुए चार सौ घोड़े बह गये थे। अत: इन छह सौ के अतिरिक्त ऐसे अन्य घोड़े नहीं मिलेंगे। दोनों ने परस्पर विचार कर छ: सौ घोड़ों के साथ माधवी को विश्वामित्र की सेवा में प्रस्तुत किया। विश्वामित्र ने माधवी से अष्टक नामक यज्ञ अनुष्ठान करने वाला एक पुत्र प्राप्त किया। तदपरांत गालव को वह कन्या लौटाकर वे वन में चले गये। गालव ने भी गुरुदक्षिणा देने के भार से मुक्त हो ययाति को कन्या लौटाकर वन की ओर प्रस्थान किया।
इस कहानी की मुख्य तो यह है कि जब कोई विप्रवर अनुग्रह करे तो हमें हठ या दुराग्रह नहीं करना चाहिए । वरना विश्वामित्र जैसा कोई मिल गया तो गालवमुनि जैसी हालत हो सकती है । बाकि इसमें दक्षिणा को पूरी करने के लिए माधवी का जिस तरह उपयोग गया है, वह निश्चय ही सोच का विषय है या फिर इसमें कोई आध्यात्मिक रहस्य छुपा हो सकता है ।
अखण्ड ज्योति पर तुलसीदास को मानवता का ज्ञान :-
गलिता जी वह तपोभूमि है, जहां सदियों से अखंड जलती ज्योत अपनी ज्योती से इस धाम को पवित्र कर रही है.राम और कृष्ण के एक रुप के दर्शन भी तुलसीदासजी ने यहीं किए थे और दुनिया को धर्म की राह दिखाने वाले तुलसीदास को मानवता का असली ज्ञान भी यहीं हुआ था.
तपो भूमि पर बसने वाले नाभ जी ऋषि के चमत्कारिक व्यक्तित्व की वजह से तुलसीदास जी को यहां पर रुकना पड़ा था. बताते हैं कि पहले केवल भ्रमण भर के लिए आए तुलसीदास जी ने जब नाभ जी ऋषि के प्रसाद की अवज्ञा की, तो उनके पूरे शरीर में कोढ का रोग हो गया और अनेको अनेक वैध को दिखाने के बाद भी वह ठीक नहीं हुआ। जिसके बाद किसी ज्ञानी ने उन्हें बताया कि उनका ये हाल प्रसाद की अवज्ञा की वजह से हुआ है. फिर जब उन्होंने गलता जी आकर प्रसाद खाया तो उनका रोग ठीक हुआ. लेकिन, फिर भी उन्होने यहां रुकने से मना कर दिया और कहा कि यहां तो केवल भगवान कृष्ण के भक्त हैं और वो राम जी के अनुयायी है। तब भगवान कृष्ण ने तुलसीदास को यहां राम रुप में दर्शन दिए. जिसके बाद इस जगह राम और कृष्ण दोनों की मुरत एक साथ दर्शाई गई है और उसे रामगोपाल जी कहा गया है.तुलसीदास भी इस भूमि के चमत्कारों को मानते थे और इसलिए ही उन्होने अपनी जिंदगी के 3 साल यहां पर बिताए.माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी भी यहां तीन वर्ष तक रहे थे और ‘रामचरित मानस’ के अयोध्या कांड की रचना उन्होंने यहीं रह कर की थी।
कृष्णदास पयहारी की साधना स्थली:-
गालव ऋषि के बाद यहां एक और तपस्वी हुए, जिनका नाम पयोहारी ऋषि था. ये जाति से ब्राह्मण थे वह एक रामानुजी संत, यानी रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायी 15वीं शताब्दी की शुरुआत में गलता आए और अपनी योगिक शक्तियों से अन्य योगियों को वहां से खदेड़ दिया। जहां
गलता (जयपुर) में रामानंदी सम्प्रदाय की प्रमुख मंच की स्थापना की थी। गलताजी को रामानुज संप्रदाय में उत्तर तोताद्रि भी कहते हैं। जिसकी एक प्रमुख गद्दी जयपुर में गलता के पास स्थित रही है। उस वक्त के सबसे बड़े तपस्वी होने के बावजूद उन्होंने गलता की गद्दी नहीं ली और उनके कई शिष्य गलता की गद्दी पर बैठे. उन्होने तवज्जो सिर्फ अपनी तपस्या को दी. कृष्णदास पयहारी ‘रामानंद संप्रदाय’ के प्रमुख आचार्य और कवि थे। इनका समय सोलहवीं शती ई. कहा जाता है। कृष्णदास जी रामानंद के शिष्य अनंतानंद के शिष्य थे और आमेर के राजा पृथ्वीराज की रानी बालाबाई के दीक्षागुरू थे। कहा जाता है कि इन्होंने ‘कापालिक संप्रदाय’ के गुरु चतुरनाथ को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। इससे इन्हें ‘महंत’ का पद प्राप्त हुआ था।ये संस्कृत भाषा के पंडित थे और ब्रजभाषा के कवि थे।’ब्रह्मगीता’ तथा ‘प्रेमसत्वनिरूप’ कृष्णदास पयहारी के मुख्य ग्रंथ हैं।ब्रजभाषा में रचित इनके अनेक पद प्राप्त होते हैं। यह भी कहा जाता है कि कृष्णदास पयहारी अपने भोजन में मात्र दूध का ही सेवन करते थे।इन्ही ऋषि ने जिस धूनी पर तपस्या की थी, वो धूनी आज तक यहां जल रही है. वहीं उन्होंने नाथ संप्रदाय को निर्देश दिया था कि उसकी धूनी बुझनी नहीं चाहिए और इसलिए ही नाथ संप्रदाय इस धूनी को जलाये रखता है.
दिव्य अनुभूति वाली शांति :-
गलता जी की शांति सबके अंदर तक छूती है। यहां आकर एक दिव्य अनुभूति होगी। इस प्राचीन जगह पर पहुंचने के बाद एक अलग किस्म की आध्यात्मिकता का अहसास होता है। मान्यता है कि सतयुग में गालव ऋषि ने यहां तपस्या की थी और गंगा की धारा को यहां तक लेकर आए थे। आज भी यहां अज्ञात स्रोत से लगातार पानी बहता रहता है। यहां महिलाओं और पुरुषों के स्नान के लिए दो अलग-अलग कुंड बने हैं और बड़ी संख्या में भक्त इनमें स्नान करके पुण्य प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि कार्तिक मास की पूर्णिमा को ब्रह्मा, विष्णु और महेश यहां आते हैं और इस दिन यहां स्नान करने का फल लाखों गुना बढ़ जाता है। इस स्थान को गालव आश्रम और गलता गद्दी भी कहा जाता है, क्योंकि यह वैष्णव रामानंदी संप्रदाय की सर्वोच्च पीठ है। मौजूदा मंदिर का निर्माण महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय के दीवान राव कृपा राम ने कराया था। इस परिसर में बहुत सारे भव्य मंदिर हैं। इनमें एक रामगोपाल मंदिर भी है, जिसमें स्थापित मूर्ति में राम और कृष्ण दोनों की झलक मिलती है। यह स्थान अनेकानेक ऋषि-मुनियों और संतों की तपोस्थली रहा है।
अष्ट दिव्य कुंड :-
यहां पर प्रसिद्ध आठ कुंड हैं। जिनका नाम है:- यज्ञ कुंड, कर्म कुंड, सूक्ष्म कुंड, मरडाना कुंड, जनाना कुंड, बावरी कुंड, केले का कुंड, और लाल कुंड। इन सब मे बड़ा और मुख्य कुंड मरदाना कुंड है। इस बड़े कुंड में संगमरमर का एक गौमुख झरना निरंतर गिरता रहता है। गौमुख से गिरने वाली इस जलधारा के उद्गम स्रोतों का पता आज तक भी नहीं चल पाया है। पिछले काल से यह जलधारा विस्तृत रूप से गौमुख से कुंड मे गिरती आ रही है। यह जल धारा गंगा धाराएँ दी जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि गैलव मुनि की तपस्या से प्रसन्न गंगा जी यहां प्रकट हुई जो आज भी नियमित प्रवाह में है।
महाराजा रायपुर को कुण्ड में स्नान से कोढ़ से मुक्ति:-
एक ओर किवदंती के अनुसार माना जाता है कि सबसे पहले की बात यह है कि जब एक बार रायपुर के महाराजा शिकार करते हुए पहाड़ पर स्थित ऋषि के आश्रम की ओर आ गए। इस अज्ञात के साथ जुड़े हुए साधु महात्मा सिंह का रूप धारण कर पर्वतों पर विचरण करते थे। राजा ने एक सिंह पर तीर चलाया जो सिंह के पिछले पांव में लगा और यहां रक्त की धार बह निकली। उसी समय यह सिंह अपना रूप छोड़ कर एक महात्मा के वास्तविक रूप में प्रकट हुआ, और राजा से कहा !राजन! आप इस अजनबी की ओर शिकार करने की चेष्टा कैसे की?। इसके विपरीत आपको कुष्ठ रोग हो सकता है। यह श्राप देकर वह महात्मा गिर गए। कहते हैं कि वही गालब ऋषि थे। राजा अपने महल में लौटा, उसी दिन से वह कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गया और अधिक पीडित रहने लगा। बहुत उपचार पर भी राजा को रोग से राहत नहीं मिली। राजा दुखी होकर अपने कुछ साथियों के साथ घोड़ की तलाश में उसी आश्रम की ओर चला गया। अत्यंत सावधानी के बाद एक पर्वत की गुफा में समाधिस्थ मिले। समाधि के पास राजा ने प्रार्थना की हे प्रभु! मैं किसी में अज्ञानता वश शहीद शिकार खाने चला गया था। मेरा अपराध क्षमा किजिए, और कृपया इस रोग से मुक्ति का कोई उपाय बताएं। दयावान महात्मा ने राजा से कहा राजन! इस स्थान पर एक पक्का मकान और इसमें एक विशाल कुंड बनवा दिजिए। मैं उस कुंड में गंगा की एक जल धारा लाऊंगा। वह जल धारा जब तक संसार रहेगा तब तक कभी बंद नहीं होगा। उसी गंगा नदी में स्नान करने से तेरह कुष्ठ रोग चलता रहेगा और जो कोई भी श्रद्धापूर्वक स्नान करेगा या जल का आचमन करेगा वह पापों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होगा। राजा ने ऐसा ही किया और उसका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। आज भी भक्तों का मानना ​​है कि इस कुंड में स्नान करने से संकल्प की प्राप्ति होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
18वीं शताब्दी का गलताजी का मंदिर :-
दीवान राव कृपाराम ने 18वीं शताब्दी में मंदिर की आधारशिला रखी थी। कृपाराम राजा सवाई जय सिंह के दरबार में दीवान थे। जयपुर के रीगल शहर के बाहरी इलाकों में बना ये मंदिर जाने माने धार्मिक स्थलों में से एक है। इस ऐतिहासिक मंदिर को अरावली की ऊंची पहाड़ियों पर बनाया है जो घने पेड़ों और झाड़ियों से घिरा है। यह प्रभावशाली इमारत गोल छतों और खंभों से सजी चित्रित दीवारों से सुशोभित है। कुंडों के अलावा, मंदिर परिसर में मौजूद भगवान राम, भगवान कृष्ण और भगवान हनुमान के मंदिर हैं। गलताजी मंदिर के पास में मौजूद कृष्ण मंदिर, सूर्य मंदिर, बालाजी मंदिर और सीता राम मंदिर भी जा सकते हैं। मंदिर का लेआउट अद्वित्य है। यह एक शानदार संरचना, भव्य मंदिर, गुलाबी बलुआ पत्थर से बनाया गया है । पहाड़ियों के बीच, एक महल या ‘हवेली’ जैसा पारंपरिक मंदिर की तरह लग रहा है। गलता बंदर मंदिर हर पेड़-पौधों की विशेषता भव्य परिदृश्य को आपस में जोड़ देता है, और जयपुर शहर का एक आकर्षक दृश्य प्रस्तुत करता है। यह मंदिर है कि इस क्षेत्र में ध्यान केन्द्रित करना बंदरों के कई जनजातियों के लिए प्रसिद्ध है।धार्मिक भजन और मंत्र, प्राकृतिक सेटिंग के साथ संयुक्त,वहां का दौरा किसी के लिए एक शांतिपूर्ण वातावरण प्रदान करते हैं। इस पवित्र स्थल पर आपको हजारों में बंदरों की संख्या देखने को मिल जाएगी। दिलचस्प बात तो ये है कि ये बंदर यहां आने वाले भक्तों को किसी भी तरह का नुकसान भी नहीं पहुंचाते। ये चंचल जंगली बंदर सुबह और शाम के समय मंदिर परिसर में और उसके आसपास पाए जा सकते हैं। इस मंदिर के पास एक और पर्यटक आकर्षण सिसोदिया रानी का बाग है, जो एक शानदार महल और गार्डन के रूप में जाना जाता है।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
bonus veren siteler
betnano giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpipo giriş
betpipo giriş
ikimisli giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
nesinecasino giriş
nesinecasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
Betpark Giriş
betnano giriş
betnano giriş
nesinecasino giriş
betpipo giriş
nesinecasino giriş
restbet giriş
maximcasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
maximcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milosbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş