मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा अध्याय – 13 ( ख ) बाबर को किसने बुलाया था ?

images (92)

फिर बाबर को किसने बुलाया ?

    यदि बाबर को महाराणा संग्राम सिंह ने भारत पर आक्रमण करने के लिए नहीं बुलाया था तो फिर उसे बुलाया किसने था ? यह प्रश्न बड़ा स्वाभाविक है। यदि हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो पता चलता है कि भारत पर आक्रमण करने की बात जब बाबर सोच रहा था तो उस समय पंजाब के राज्यपाल दौलत खान लोदी ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। इब्राहिम लोदी इस दौलत खान लोदी का भतीजा था । उस समय अपने अपने सत्ता स्वार्थों के चलते  चाचा भतीजे की आपस में ठनी हुई थी। इस प्रकार अपनी परिवारिक शत्रुता या रंजिश के कारण पंजाब के तत्कालीन राज्यपाल ने बाबर को इब्राहिम लोदी के विरुद्ध भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया था। पंजाब के इस राज्यपाल ने बाबर के समक्ष यह शर्त भी रख दी थी कि बाबर पंजाब का शासक बन जाएगा तथा दिल्ली आलम खान को मिलेगी।
  यहां पर यह बात भी उल्लेखनीय है कि यदि महाराणा संग्राम सिंह विदेशी आक्रमणकारी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करते तो उनसे हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी कभी मिलने नहीं जाते। क्योंकि बाबर के द्वारा तथाकथित रूप से आमंत्रित किए गए बाबर ने सर्वप्रथम इन्हीं लोगों को आहत किया था। वह दोनों महाराणा संग्राम सिंह से मिलने इसीलिए गए थे कि महाराणा भी विदेशी बाबर के विरोधी थे। बाबर के विरुद्ध जब महाराणा संग्राम सिंह हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी के साथ वार्ता कर रहे थे तो तीनों के बीच इस बात पर सहमति बनी कि बाबर के विरुद्ध मिलकर लड़ाई लड़ी जाएगी।

बाबर के विरुद्ध बना संयुक्त मोर्चा

इस संयुक्त मोर्चे का बनना इस बात का संकेत है कि तीनों ही समान रूप से बाबर को अपना शत्रु मानते थे। महाराणा संग्राम सिंह यद्यपि किसी भी मुस्लिम शासक को भारत में देखना नहीं चाहते थे। परंतु राजनीति कई बार अलग दिशा में चलती हुई दिखती है जबकि कूटनीति कभी-कभी दूसरी दिशा में जाती दिखाई देती है। कहने का अभिप्राय है कि राजनीति में रहकर जब कूटनीति चली जाती है तो उस समय यह आवश्यक नहीं होता कि जो दीख रहा होता है वही सच होता है। उसका कोई ना कोई निहित अर्थ होता है, जो ढूंढ कर निकाला जाता है। यदि इन तीनों के गठबंधन पर विचार किया जाए तो राणा संग्राम सिंह की सोच केवल एक थी कि घर की छोटी मोटी बातों या समस्याओं को तो बाद में भी समाप्त कर लिया जाएगा पर इस समय बड़ी बुराई से निपटने के लिए सबका साथ रहना आवश्यक है।
इस मंत्रणा में हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी ने महाराणा संग्राम सिंह की सर्वोच्चता को स्वीकार किया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि युद्ध का परिणाम हमारे अनुकूल आता है तो दिल्ली के अधिपति महाराणा संग्राम सिंह ही होंगे।
इस प्रकार के निर्णय से स्पष्ट होता है कि उस समय हसन खान मेवाती और महमूद खान लोदी दोनों देशभक्ति की भावना से सराबोर थे। उन्हें भी बाबर मुक्त भारत की ही इच्छा थी। वास्तव में उस समय इन तीनों शक्तियों का मिलना भारत के भविष्य को तय कर रहा था। इस बैठक से यह निश्चित हो गया था कि अब बाबर का संघर्ष महाराणा संग्राम सिंह से होना अनिवार्य हो गया है। बैठक ने यह भी निश्चित कर दिया था कि आने वाले भारत की दिशा क्या होगी ? देश के प्रबुद्ध वर्ग को इस बात का संकेत मिल गया था कि बाबर को इस देश में भारतवर्ष की सबसे बड़ी शक्ति से भिड़कर ही अपने भविष्य का निश्चय करना होगा।
ऐसा नहीं माना जा सकता कि बाबर इन तीनों के गठबंधन से अपरिचित रहा हो। निश्चय ही वह भी अपने गुप्तचरों के माध्यम से उन तीनों की इस बैठक पर पूरी सजगता के साथ नजर गड़ाए होगा। जब भी आप किसी अपरिचित स्थान पर होते हैं तो वहां पर स्वाभाविक रूप से अधिक चौकसी करनी पड़ती है। बाबर के साथ भी यही हो रहा था। उस समय बाबर का जयेष्ठ पुत्र हुमायूं अपनी सेना के साथ बढ़ता – बढ़ता पूरब के राज्यों में बहुत दूर तक अपना अधिकार स्थापित कर चुका था। तब बाबर दक्षिण की ओर अपनी सेना लेकर आगे बढ़ा। महाराणा संग्राम सिंह ने इस अवसर को अपने लिए अनुकूल समझा। उन्होंने जब यह सुना कि बाबर उनकी ओर बढ़ रहा है तो वह अपनी सेना सहित उसी ओर आगे बढ़ने लगे जिस ओर से बाबर चढ़ा आ रहा था। राणा संग्राम सिंह संग्राम को ढूंढते फिरते रहते थे। वह भारत की क्षत्रिय परंपरा के प्रतीक पुरुष थे। क्षत्रियों का कार्य ही अन्याय के विरुद्ध लड़ना होता है। संसार के किसी भी कोने में होने वाले अत्याचारों को मिटाना उनका धर्म होता है। महाराणा संग्राम सिंह अपने धर्म को भली प्रकार जानते थे। यही कारण था कि वह बाबर से भिड़कर उसका सर्वनाश कर देना चाहते थे। महाराणा संग्राम सिंह की सेना ने बाबर की सेना को अपनी ओर बढ़ने से रोकने का असफल प्रयास भी किया।

मुस्लिम किलेदारों ने की देश के साथ गद्दारी

बाबर ने धौलपुर, बियाना और ग्वालियर के किलों को बड़ी सहजता से अपने साथ मिला लिया। वहां से उसे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली। इससे उसका मन और भी अधिक बढ़ गया था। इन किलों के किलेदार मुसलमान ही थे। उन्होंने बाबर का साथ देकर देश के साथ गद्दारी की और सांप्रदायिक आधार पर एक विदेशी आक्रमणकारी का साथ देकर यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि उनके लिए राष्ट्र से पहले मजहब है। इन गद्दारों को अपने साथ मिलाकर बाबर और भी अधिक उत्साहित हो गया था। उसने इन गद्दारों को उचित पुरस्कार देते हुए जागीरें भी प्रदान कर दी थीं। इस सबके उपरांत भी महाराणा संग्राम सिंह के मनोबल  पर किसी प्रकार का कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा । वह अपने उत्साह को यथावत बनाए हुए आगे बढ़ रहे थे । वह जानते थे कि गद्दारी कहां से हो सकती है ? और ये गद्दार उनके लिए कितने अधिक खतरनाक हो सकते हैं ?
 जब महाराणा संग्राम सिंह को यह पता चला कि बियाना में किले की सुरक्षा के लिए तुर्क सेना छोड़ दी गई है तो राणा की सेना ने बियाना पर आक्रमण किया और बाबर की सेना को बड़ी संख्या में मार कर बियाना के किले पर अधिकार स्थापित कर लिया। तत्कालीन परिस्थितियों में महाराणा संग्राम सिंह को मिली यह जीत बहुत अधिक महत्व रखती थी। यद्यपि वर्तमान इतिहास में इस जीत को कोई स्थान नहीं दिया गया। द्वेष भाव से लिखे गए इतिहास में भारत के इस महानायक को यहां भी उपेक्षित करने का प्रयास किया गया है। यदि इसके महत्व पर हम प्रकाश डालें तो पता चलता है कि बाबर की सेना को परास्त करने के लिए या उससे खानवा का युद्ध करने से पूर्व किस प्रकार एक योजनाबद्ध ढंग से महाराणा संग्राम सिंह के द्वारा कार्य किया गया था ? इस पहली झड़प से ही बाबर को महाराणा संग्राम सिंह के महत्व और उनके बल का आभास हो गया था। उसे पता चल गया था कि उसका विशाल सैन्य दल महाराणा के मनोबल के सामने कुछ भी नहीं है।

बियाना में हुआ भयंकर संघर्ष

फलस्वरूप बाबर ने अब युद्ध के लिए और भी बड़े स्तर पर तैयारी आरंभ कर दी थी। बड़े सैन्य दल के साथ अब वह महाराणा से युद्ध करने के लिए रण क्षेत्र की ओर बढ़ने लगा। भरतपुर राज्य के बियाना नामक स्थान पर राणा संग्राम सिंह की सेना से बाबर का भयंकर युद्ध हुआ। उस समय बाबर के साथ काबुल की पूर्व सेना के साथ-साथ दिल्ली की वह मुस्लिम सेना भी थी जो उसे लोदी को हटाने के पश्चात मिली थी। इस प्रकार एक विशाल सैन्य दल का सामना महाराणा संग्राम सिंह की सेना को इस समय करना पड़ रहा था।
इस सबके उपरांत भी महाराणा संग्राम सिंह और उनकी सेना अपने शत्रु पर भारी होती जा रही थी। महाराणा संग्राम सिंह परम प्रतापी थे। अपने प्रताप और पराक्रम के बल पर वह शत्रु से युद्ध रत थे । उनके प्रताप और पराक्रम से उनकी सेना को भी निरंतर ऊर्जा प्राप्त हो रही थी। वह सूर्य के समान पराक्रमी होकर शत्रु पर टूटते थे और उसी का अनुकरण करते हुए शत्रु के खून की प्यासी होकर उनकी सेना भी शत्रु पक्ष पर टूट पड़ती थी। बड़ी संख्या में विदेशी शत्रुओं के शव धरती पर गिरते जा रहे थे। राणा के सैनिक भूखे शेर की तरह अपने शत्रुओं पर टूट पड़ते थे। अपनी मातृभूमि के लिए बलिदान देना मेवाड़ की शान रही थी । आज अपनी उसी शान को प्रकट करने के लिए जब परीक्षा की घड़ी आई तो कोई भी हिंदू वीर योद्धा पीछे हटने को तैयार नहीं था। अनेक शत्रु सैनिकों का संहार करके अपने प्राणोत्सर्ग करने की उनमें होड़ मची हुई थी।
अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए एक – एक इंच भूमि को मुक्त करने के संकल्प के साथ हर – हर महादेव का गगनभेदी उद्घोष करते हुए भारत की वीर सेना शत्रु पर टूट पड़ती थी। जिधर भी हमारे वीर योद्धा आगे बढ़ते उधर ही शत्रु सेना में कोहराम मच जाता था। उस समय युद्ध का रोमांच अपने शिखर पर था। आज हमारे वीर योद्धा विदेशी शत्रु, विदेशी धर्म और विदेशी सोच को मिटाने के लिए युद्धरत थे। वह दिल्ली से ही नहीं अपितु भारत की एक-एक इंच भूमि से शत्रु को भगा देने के लिए युद्ध में अपना कौशल दिखा रहे थे। शत्रु सेना भी उस समय भारत को पाने के लिए प्राणपण से संघर्ष कर रही थी। उन्हें अपने दीन के प्रचार – प्रसार के लिए बड़े सौभाग्य से मिली हिंदुस्तान की भूमि को खोने की उतनी ही चिंता थी जितनी अपनी आन, बान, शान को बनाए रखने की चिंता हमारे देश के महानायक महाराणा संग्राम सिंह और उनकी सेना के सैनिकों को थी।

युद्ध का परिणाम

 इस घनघोर युद्ध का परिणाम यह निकला कि कुछ ही समय में राणा की सेना शत्रु पक्ष पर निर्णायक विजय पानी की दिशा में आगे बढ़ने लगी। शत्रु पक्ष की सेना अब भागने की स्थिति में आ गई थी। उसका मनोबल टूटने लगा था और हिंदू वीरों की वीरता के समक्ष उसके पांव उखड़ चुके थे। युद्ध क्षेत्र को छोड़कर बाबर की सेना अंत में भाग खड़ी हुई। इस रणभूमि ने अपना निर्णय हिंदू हितों के रक्षक महाराणा संग्राम सिंह की सेना और उसके पराक्रम के पक्ष में दिया। 

महाराणा संग्राम सिंह से यहां पर एक चूक हुई कि उन्होंने भागती हुई शत्रु की सेना का दूर तक पीछा नहीं किया। यदि वह दूर तक भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा करके उसे मारते काटते चले जाते तो फिर कभी शत्रु का उनकी ओर लौटना संभव नहीं हो पाता। उन्होंने उदारता दिखाते हुए युद्ध क्षेत्र से भागी हुई सेना का पीछा नहीं किया । हमारी उदारता का दिव्य गुण हमारे लिए फिर बीच में आ गया।
यदि इस प्रकार के मानवीय गुण भारत को युद्ध क्षेत्र में परेशान नहीं करते या हमारे महान योद्धाओं के सिद्धांतों के आड़े नहीं आते तो हम मोड़ लेने के लिए लालायित इतिहास को निर्णायक मोड़ लेटे हुए देखते। इस युद्ध के पश्चात भी महाराणा संग्राम सिंह के लिए अभी ‘दिल्ली दूर थी।’ उन्हें दिल्ली को लेने के लिए अभी कुछ और भी करना था। दिल्ली को शत्रुविहीन करने के लिए महाराणा संग्राम सिंह यदि उस समय भागती हुई मुस्लिम सेना को लगे हाथों दिल्ली से भी भगा देते तो दिल्ली बड़ी सहजता से उनके हाथों में आ जाती। तब भारतवर्ष का इतिहास भी कुछ दूसरा होता।
कहते हैं कि युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं है । युद्ध से तो समस्याएं आरंभ होती हैं। यहां भी जो युद्ध लड़ा गया था वह समस्या का अंत नहीं था अपितु यहां से एक समस्या आरंभ हुई थी और वह समस्या यही थी कि दिल्ली को पाने के लिए नए युद्ध की तैयारी में जुटा जाए। फलस्वरूप महाराणा भी दिल्ली को पाने के लिए नए युद्ध की तैयारी में लग गए , और शत्रु बाबर भी नए युद्ध की तैयारी में लग गया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

(हमारी यह लेख माला आप आर्य संदेश यूट्यूब चैनल और “जियो” पर शाम 8:00 बजे और सुबह 9:00 बजे प्रति दिन रविवार को छोड़कर सुन सकते हैं।)

Comment:

betbox giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş
galabet giriş
galabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
galabet giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
Betgar güncel
Betgar giriş
Betgar giriş adresi
betnano giriş
galabet giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betasus giriş
norabahis giriş
nitrobahis giriş
noktabet giriş
betvole giriş
betvole giriş
betkolik güncel giriş
betkolik güncel
betkolik giriş
yakabet giriş
betasus giriş
betnano giriş
romabet giriş
yakabet giriş
queenbet giriş
queenbet giriş
betnano giriş
winxbet giriş
betamiral giriş
livebahis giriş
grandpashabet giriş
wojobet giriş
wojobet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betkare giriş
kareasbet giriş
noktabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
nisanbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betsat giriş
betsat giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betorder giriş
wojobet giriş
wojobet giriş
livebahis giriş
livebahis giriş
nisanbet giriş
nisanbet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betsat giriş
betsat giriş
betgaranti giriş
betpark giriş