ई-कचरे की अनदेखी के खतरे

सतीश सिंह
बेकार मोबाइल, कंप्यूटर मदरबोर्ड, खराब हो चुके फ्रिज, वातानुकूलक आदि ई-कचरा की श्रेणी में आते हैं। आज की तारीख में ई-कचरा प्रबंधन केंद्रों में प्रबंधन के नाम पर ई-कचरे से कीमती धातुओं जैसे सोने, चांदी, प्लेटिनम और पैलेडियम के अंश को निकाले जाने का काम किया जा रहा है। कंप्यूटर के दूसरे हिस्सों को भी बेच दिया जाता है। हालांकि इस प्रक्रिया में जहरीली गैस निकलने की आशंका बनी रहती है। इससे श्रमिकों को श्वसन संबंधी गंभीर बीमारियां लग जाती हैं। इस कार्य से जुड़े लोगों को कैंसर होने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
सरकार द्वारा डिजिटलीकरण को प्रोत्साहन देने से ई-कचरे में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि बेहतर प्रबंधन से ई-कचरे का नवीनीकरण या कम से कम सुरक्षित निपटान किया जा सकता है। वर्तमान में केवल डेढ़ फीसद का औपचारिक नवीनीकरण किया जा रहा है। लगभग आठ प्रतिशत ई-कचरे से गड््ढों को भरा जा रहा है और बाकी ई-कचरे का प्रबंधन अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा किया जा रहा है। लगभग नब्बे प्रतिशत ई-कचरे का पुनर्चक्रण आज असंगठित क्षेत्र द्वारा किया जा रहा है, जिसमें छोटे पैमाने पर कचरा बटोरने वाले भी शामिल हैं। ऐसे लोग कीमती धातुओं को निकालने के लिए जो तरीका अपनाते हैं वह न केवल नुकसानदेह है, बल्कि अपनाई गई प्रक्रिया में कीमती धातुओं का पचहत्तर प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो जाता है।
बंगलुरु में ई-कचरा इक_ा करने वाली बारह मशीनें लगाई गई हैं, जिनके जरिए ई-कचरे का निपटान किया जा रहा है। लेकिन मशीनों की संख्या सीमित है। इन मशीनों से दस महीनों में केवल 4.4 टन ई-कचरे का निपटारा किया जा सका। भारत में मुंबई और दिल्ली के बाद बंगलुरु में सबसे ज्यादा ई-कचरा पैदा होता है। यहां प्रतिवर्ष सैंतीस हजार टन ई-कचरा पैदा होता है। वैसे कोलकाता भी इस मामले में तेजी से आगे बढ़ रहा है। कोलकाता में बिजली और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से करीब नौ हजार टन कचरा पैदा होता है, जिसमें कंप्यूटर और उससे जुड़े अन्य उपकरणों से उत्पन्न कचरे की हिस्सेदारी लगभग तीन हजार टन है।
पर्यावरण मंत्रालय की ओर से तैयार किए गए ई-कचरा प्रबंधन नियम-2016 के मुताबिक भारत में इलेक्ट्रॉनिक सामान के विनिर्माताओं को ई-कचरे के पुनर्चक्रण की व्यवस्था करनी है। इस नियम में ई-कचरे के प्रसंस्करण को लेकर उत्पादकों की जवाबदेही बढ़ाने पर जोर दिया गया है। देश में ई-कचरे के प्रबंधन को संगठित स्वरूप देने के लिए सरकार परंपरागत कचरा प्रबंधक ‘कबाड़ीवालों’ को इस काम में लगाने पर विचार कर रही है। कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय ने ‘प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना’ के तहत अगले दस साल में तीन लाख कबाड़ी वालों को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई है, जिससे ई-कचरे का प्रभावी तरीके से निपटान किया जा सके।
ई-कचरे के निपटान के लिए नए नियम पांच साल पहले जारी किए गए थे, लेकिन मौजूदा संदर्भों में इनके बेमानी होने के कारण नए नियम बनाए गए हैं। वर्ष 2011 में राज्यसभा सचिवालय द्वारा कराए गए एक अध्ययन के मुताबिक देश के तमाम कचरा क्षेत्रों के सत्तर प्रतिशत हिस्से पर ई-कचरा भरा हुआ है। नए नियमों में बेकार हो चुके सीएफएल, जिसे कॉम्पैक्ट फ्लूरोसेंट लैंप के नाम से भी जाना जाता है, को भी ई-कचरा माना गया है, क्योंकि इनमें पारा होता है। धातुएं, जैसे कांच तथा प्लास्टिक आदि का दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन पारा जैसे पदार्थों को न केवल ई-कचरे से बरामद करना मुश्किल होता है, बल्कि ये भूजल को भी प्रदूषित करते हैं।
नए नियमों में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्माताओं को विस्तारित उत्पादकजवाबदेही की श्रेणी में रखा गया है। ऐसे उत्पादकई-कचरे के संग्रहण और विनियमन के लिए उत्तरदायी होंगे। ई-कचरे के प्रबंधन के मामले में उत्पादकका उत्तरदायित्व पहले वर्ष में तीस प्रतिशत रहेगा और सातवें वर्ष तक वह बढ़ कर सत्तर प्रतिशत हो जाएगा। वैसे, बड़े इलेक्ट्रॉनिक्स सामान विनिर्माताओं, जैसे सैमसंग, एलजी, वीडियोकॉन, पैनासोनिक, वर्लपूल, वोल्टास आदि ने खतरनाक ई-कचरे पर लगाम लगाने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, लेकिन इस संबंध में अपेक्षित परिणाम नजर नहीं आ रहे हैं।
वर्ष 2005 में ग्रीनपीस के एक सर्वेक्षण से पता चला था कि ई-कचरे से जुड़े कानून के अस्तित्व में आने से पहले केवल दो भारतीय उत्पादकोंएचसीएल और विप्रो के पास ही पुराने उत्पादों को वापस लेने की व्यवस्था थी। उस दौरान देश में कार्यरत बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक के पास ऐसी व्यवस्था नहीं थी। नए नियमों के तहत ई-कचरा उत्पन्न करने वाली कंपनियों को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में पंजीकरण कराना होगा और ई-कचरे के पुनर्चक्रण में लगे कर्मचारियों को समुचित प्रशिक्षण देने और उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखने की जिम्मेदारी का निर्वहन भी करना होगा। दुनिया भर केई-कचरे में भारत की हिस्सेदारी महज चार प्रतिशत है, लेकिन वर्ष 2014 के आंकड़ों के मुताबिक वैश्विक जीडीपी की तुलना में यह ढाई प्रतिशत है, अर्थात जीडीपी के बरक्स हमारा ई-कचरा बहुत ज्यादा है, जबकि चीन में दोनों का अनुपात लगभग बराबर है। अमेरिका में ई-कचरे की हिस्सेदारी जीडीपी की तुलना में कम है।
पर्यावरणविदों के मुताबिक ई-कचरे को निपटाने या उसके नवीकरण में बढ़ती लागत के कारण विकसित देश भारत में ई-कचरा डंप कर रहे हैं। कमजोर प्रशासन तंत्र, कठोर पर्यावरणीय नियमों का अभाव, प्रभावशाली तंत्र के न होने और अपेक्षया सस्ते मजदूरों की मौजूदगी की वजह से विकसित देशों के लिए ऐसा करना आसान है। एक मोटे आकलन के मुताबिक भारत में हर साल तकरीबन 3,30,000 टन ई-कचरा डंप किया जाता है। इस आंकड़े में अवैध आयात का हिस्सा शामिल नहीं है। भारत में ई-कचरा प्रबंधन के नियम लागू तो हो गए हैं, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद विनिर्माताओं और पुनर्चक्रण कारोबार से जुड़े लोगों का मानना है कि किसी लक्ष्य के निर्धारण और उत्पादकों व उपभोक्ताओं को प्रोत्साहित किए बिना देश में ई-कचरे की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। ई-कचरा प्रबंधन और निगरानी नियम, 2011 के मुताबिक उत्पादकों को ई-कचरे में कमी लाने और पुनर्चक्रण के लिए जवाबदेह बनाना होगा।
देश में हर साल उत्पन्न होने वाले ई-कचरे में सत्रह हजार टन की हिस्सेदारी पुराने मोबाइल फोन की है। इस समस्या ने संगठित पुनर्चक्रण नामक एक नए क्षेत्र को जन्म दिया है। अब तक छब्बीस कंपनियां मोबाइल पुनर्चक्रण के क्षेत्र में उतर चुकी हैं। बाजार में ऐसे मोबाइल फोन भी हैं, जिनके निर्माण में सोना, चांदी और प्लेटिनम के साथ-साथ तांबे जैसी धातुओं का इस्तेमाल किया जाता है।
इसमें पैलेडियम तेरह प्रतिशत, कोबाल्ट पंद्रह प्रतिशत और भारी मात्रा में तांबा, इस्पात, निकल और एल्यूमीनियम का भी इस्तेमाल किया जाता है। मोबाइल फोन के प्रिंटेड सर्किट बोर्ड से धातु निकालने के लिए विदेश स्थित स्मेल्टिंग कंपनियों के पास भेजा जाता है। कीमती धातुओं के अलावा एक औसत मोबाइल फोन में लेड और मर्करी जैसे जहरीले रसायन भी होते हैं। यदि सही तरीके से इनका निपटान न किया जाए तो पर्यावरण तथा इंसान के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा हो सकता है।
कहा जा सकता है कि उपभोक्तावाद बढऩे के कारण ई-कचरे का निष्पादन देश के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। आज हमारी विनिर्माण प्रक्रियाओं को बेहतर तकनीक की जरूरत है, ताकि ई-कचरा कम उत्पन्न हो। हाल के वर्षों में ई-कचरा बहुत तेजी से बढ़ा है। ग्रीनपीस के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में ई-कचरा प्रतिवर्ष पंद्रह प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। इसलिए सरकार को गंभीरता से इस समस्या से छुटकारे की पहल करनी चाहिए।

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