25 मानचित्रों में भारत के इतिहास का सच, भाग ……16

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कश्मीर का कर्कोट राजवंश

कश्मीर का राजा चंद्रपीड हुआ जिसने अरबों का मुंह मोड़ दिया था। ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरणों में कश्मीर के तत्कालीन कर्कोटा राजवंश के संस्थापक राजा दुर्लभवर्धन का उल्लेख करते हुए बताया है कि वह एक शक्तिशाली राजा था और अपने राज्यारोहण (625 ई.) के पश्चात उसने अपना राज्य कश्मीर से काबुल तक विस्तृत कर लिया था।
इसी कर्कोटा राजवंश में चंद्रापीड नामक शासक हुआ। इतिहासकार गोपीनाथ श्रीवास्तव हमें बताते हैं कि- ‘यह राजा इतना शक्तिशाली था कि चीन का राजा भी इसकी महत्ता को स्वीकार करता था। इसका अनुमान आप उसकी कार्ययोजना से लगा सकते हैं। 712 ई. में भारत पर मौहम्मद बिन कासिम आक्रमण करता है, और 713 ई. में चंद्रापीड अपने एक दूत को चीन इस आशय से भेजता है कि चीन अरब के विरूद्घ हमारी सहायता करे। राजा की कूटनीति और विवेकशीलता देखिए, चीन हमारे लिए बौद्घ होने के कारण धर्म का भाई था, इसलिए अरब वालों के विरूद्घ चीन से ऐसी सहायता मांगना राजा की सफल कूटनीति का संकेत हैं।
इसी राजवंश में जन्मा सम्राट ललितादित्य भी हमारे लिए एक ऐसा ही नाम है जो कि एक महान और पराक्रमी शासक था। नरेन्द्र सहगल अपनी पुस्तक ‘धर्मान्तरित कश्मीर में लिखते हैं:-‘ललितादित्य ने पंजाब, कन्नौज, बदखशां और पीकिंग को जीता और 12 वर्ष के पश्चात कश्मीर लौटा। ललितादित्य जब अपनी सेना के साथ पंजाब कूच कर निकला तो पंजाब की जनता ने उसके स्वागत में पलक पावड़े बिछा दिये। ….ललितादित्य ने अपने सैन्य अभियानों से बंगाल बिहार, उड़ीसा, तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। यह सैनिक कूच गुजरात, मालवा और मेवाड़ तक सफलतापूर्वक आगे ही आगे बढ़ता गया। ललितादित्य के इन सफल युद्घ अभियानों के कारण भारत ही नही समूचे विश्व में कश्मीर की धरती के पराक्रमी पुत्रों का नाम यशस्वी हुआ।
जबकि इतिहासकार मजूमदार हमें बताते हैं–भारत से चीन तक के कारवां मार्गों को नियंत्रित करने वाली कराकोरम पर्वत श्रंखला के सबसे अगले स्थल तक उसका साम्राज्य फैला था। …आठवीं सदी के आरंभ से अरबों का आक्रमण काबुल घाटी को चुनौती दे रहा था। इसी समय सिन्ध की मुस्लिम शक्ति उत्तर की ओर बढ़ने के प्रयास कर रही थी। जिस समय काबुल और गांधार का शाही साम्राज्य इन आक्रमणों में व्यस्त था, ललितादित्य के लिए उत्तर दिशा में पांव जमाने का एक सुंदर अवसर था। अपनी विजयी सेना के साथ वह दर्द देश अर्थात दर्दिस्तान से तुर्किस्थान की ओर बढ़ा। असंख्य कश्मीरी भिक्षुओं तथा मध्य एशियाई नगरों के कश्मीरी लोगों के प्रयासों के फलस्वरूप पूरा क्षेत्र कश्मीरी परंपराओं तथा शिक्षा से समृद्घ था।
-आर.सी. मजूमदार ‘एंशिएन्ट इण्डिया पृष्ठ 383।
इतिहासकारों ने ललितादित्य के साम्राज्य की सीमा पूर्व में तिब्बत से लेकर पश्चिम में ईरान और तुर्कीस्थान तक तथा उत्तर में मध्य एशिया से लेकर दक्षिण में उड़ीसा और द्वारिका के समुद्रतटों तक मानी है। इतने बड़े साम्राज्य पर निश्चय ही गर्व किया जा सकता है।”
इस राज्य वंश की स्थापना दुर्लभ वर्धन ने लगभग 627 ईसवी में की थी। ललितादित्य मुक्तापीड़ा का शासनकाल 723 से 760 ईसवी तक रहा। यह साम्राज्य 6250 से 832 ईसवी तक अर्थात लगभग 200 वर्ष तक राज्य करता रहा।

मेरी पुस्तक “25 मानचित्र में भारत के इतिहास का सच” से

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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