गीता का दसवां अध्याय और विश्व समाज

”तुझे पर्वतों में खोजा तो लिये पताका खड़ा था।
तुझे सागर मेें खोजा तो मां के चरणों में पड़ा था।
सर्वत्र तेरे कमाल से विस्मित सा था मैं,
मुझे पता चल गया तू सचमुच सबसे बड़ा था।।”
ईश्वर को खोजने वाली दृष्टि होनी चाहिए-फिर सारी सृष्टि में वही दिखायी देगा। वह देहधारी नहीं है, और ना हो सकता है-पर जब उसे देखने की बात आ जाएगी तो कहीं उसके पैरों का विस्तार दिखायी देगा तो कहीं उसकी बाजुओं का विस्तार दिखायी देगा। कहीं वह हमें माता की भांति दुलार रहा होगा तो कहीं पिता की भांति अपने वात्सल्य की वर्षा कर रहा होगा और कहीं मित्र की भांति हमसे बड़े प्रेम से वात्र्तालाप कर रहा होगा। तब पता चलेगा कि वह कितना विराट है? उसके इस विराट स्वरूप को ही गीताकार ने गीता के ग्यारहवें अध्याय का विषय बनाया है। इसमें अर्जुन की जिज्ञासा जागृत हो गयी है। अब वह ईश्वर की विभूतियों में उसे खोजने की इच्छा से आगे बढ़ गया है। वह चाहता है कि इधर-उधर भागूं-दौडूं और उसकी विभूतियों को खोजता फिरूं, इससे तो बढिय़ा यह होगा कि वह परमात्मा साक्षात ही देखा जाए?
श्रीकृष्ण जी अपने शिष्य के भीतर ऐसी ही आग सुलगा देना चाहते थे और अब उनको इसमें सफलता मिल गयी। उनका शिष्य अर्जुन ग्यारहवें अध्याय में बोल पड़ा-‘दृष्टुमिच्छामि ते रूपमं’-अर्थात अभी तक जो कुछ आपने दिखाया या समझाया यह तो बहुत छोटी बात हुई-मेरा काम तेरे इस रूप को देखने से नहीं चलने वाला, मुझे तो तेरे साक्षात दर्शन चाहिए। ईश्वर का विराट रूप मैं देखना चाहता हूं। अब मन को चैन तभी मिलेगा जब उसके विराट स्वरूप के दर्शन होंगे। मैं चाहता हूं कि मेरे सामने वह खड़ा हो, मैं उसे देखूं कि कैसा है वह?
श्रीकृष्णजी भी अर्जुन को इसी पराकाष्ठा पर ले आना चाहते थे। बात भी तभी बनती है-जब दोनों ओर चाह की आग लगी हो। ऐसा नहीं हो सकता कि गुरू तो चाहे कि मेरे शिष्य को मैं ये ज्ञान दे दूं और ‘वह’ ज्ञान दे दूं-पर शिष्य गुरू से पिण्ड छुड़ाना चाहे या शिष्य तो ‘और-और’ की रट लगा रहा हो और गुरू ‘बस करो-बस करो’ -कहकर हाथ उठा रहा हो।
यहां जिस गुरू-शिष्य का संवाद चल रहा है वह कोई साधारण गुरू-शिष्य नहीं हैं, वे दोनों ही असाधारण हैं। अत: शिष्य की किसी भी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए गुरू प्रयोग करके दिखाने को भी तैयार है। ‘महाभारत’ का युद्घ संसार का अकेला ऐसा युद्घ है जहां युद्घ से पहले और युद्घ के ही मैदान में एक गुरू अपने उस शिष्य को बड़ी प्रयोगशाला में लेकर चल देता है-जिसे अभी बीस मिनट बाद ही युद्घ करना है। ‘युद्घ’ और ‘बुद्घ’ (बुद्घिवाद) का अद्भुत संगम हमें कुरूक्षेत्र के मैदान में दिखायी देने लगा है। आज के विश्व के लिए तो ऐसा ‘युद्घवाद’ और ‘बुद्घिवाद’ कल्पनातीत हैं-वह सोच भी नहीं सकता कि युद्घ के बादलों के नीचे खड़े होकर भी विवेक और वैराग्य की बातें की जा सकती हैं?
इस अध्याय की शुरूआत ही अर्जुन के इस वाक्य से होती है कि अब मेरा मोह दूर हो गया है। मैंने बड़े ध्यान से आपकी बातों को सुना है। इन सब बातों को सुनने के पश्चात मैं चाहता हूं कि आपका साक्षात दर्शन हो तो अच्छा है, अर्थात ईश्वर के उस विराट स्वरूप का दर्शन कराइये जिसकी अभी तक आपने मुझे विभूतियों के नाम पर हल्की सी झलक दिखायी है। मैं चाहूंगा कि तेरा वह अव्यय अविनाशी रूप मैं देखूं जो इन सभी विभूतियों के लिए जिम्मेदार है।
तेरे अविनाशी स्वरूप को देखन चाहें नैन।
विराट पुरूष को देखकर मिलेगा दिल को चैन।।
अर्जुन की जागी हुई इस जिज्ञासा के गरम लोहे पर श्रीकृष्णजी ने भी तुरन्त ही चोट मारना उचित समझा। अत: वह कहने लगे-
नाना रूप धार के रहते हैं भगवान।
बहुरूपिया है वह कुछ ऐसा ऐसा जान।।
अर्जुन मेरे नाना रूप हैं, नाना आकृति हैं, कितने ही रूपों में होने के कारण ईश्वर ‘बहरूपिया’ है। उसके दिव्य ‘बहुरूपिये’ स्वरूप को दिव्यार्थों में ही समझने की आवश्यकता है।
हे भारत! आदित्यों, वसुओं, रूद्रों-दोनों अश्विनी-कुमारों और मरूतों को देख और अदृष्टपूर्व आश्चर्यों को देख-ऐसा आश्चर्य जो पहले कभी देखे ही नहीं गये।
तू यहां मेरे देह में सारे जगत को एक जगह सिमटा हुआ देख, जो कुछ भी तू देखना चाहता है उसे ही देख।
पर ध्यान रखना कि तू मुझे अपनी इन चर्मचक्षुओं से नहीं देख सकेगा, मैं तुझे दिव्य चक्षु=ज्ञान चक्षु=दिव्य दृष्टि प्रदान करता हूं, क्योंकि मेरे दर्शन दिव्य दृष्टि से ही होने संभव है।
अलौकिक को लौकिक से, अदृश्य को दृश्य से और दिव्य को किसी भौतिक से नहीं देखा जा सकता। जितना बड़ा शिकार हो, वैसे ही हथियार लेकर चलने की आवश्यकता है। जब साधक अपनी साधना की गहराई में पहुंचने लगता है और उसका आसन दृढ़ से दृढ़तर होता जाता है तो ये चर्मचक्षु अपने आप ही बंद होने लगते हैं। इन्हें अपनी शक्ति और सीमा का पता चल जाता है। अत: ये साधक से स्वयं ही कहने लगते हैं कि अब हमारा काम नहीं, अब यहां से आगे तू किसी और का सहारा पकड़। जैसे-जैसे हमारे चर्मचक्षु बंद होते जाते हैं, वैसे-वैसे ही हमारे दिव्य चक्षु खुलने लगते हैं। आश्चर्य की बात ये है कि हम कब चर्म, चक्षुओं से दिव्य- चक्षु या दिव्य-दृष्टि को प्राप्त कर लेते हैं-यह हमें पता ही नहीं चलता।
महाभारत के युद्घ में ऐसा नहीं था कि श्रीकृष्ण जी ने अपने पिटारे में से नये चश्मे निकाले और अर्जुन को लगाकर उससे बोल दिया कि अब तू मेरा तमाशा इन चश्मों से देख। इसके स्थान पर उन्होंने संध्याप्रेमी और भगवद्प्रेमी अर्जुन को यही बताया कि अर्जुन उसके विराट स्वरूप को देखने के लिए तुझे अपने उन्हीं दिव्यचक्षुओं का प्रयोग करना पड़ेगा, जिन्हें हम भगवद्भजन के समय लगाने के अभ्यासी हैं। ‘मैं तुझे दिव्य दृष्टि देता हूं’-का अभिप्राय यही है कि मैं तुझे उसी दिव्य दृष्टि का स्मरण कराता हूं, तू उसी को धारण कर और परमात्मा के विराट स्वरूप के दर्शन कर। डा. राधाकृष्णनजी ने भी दिव्य दृष्टि का अर्थ ‘एक आध्यात्मिक अनुभूति’ ही किया है। स्वामी चिन्मयानन्द जी ने दिव्य दृष्टि का अर्थ ‘बौद्घिक ज्ञान’ से किया है। वह कहते हैं कि रसायन शास्त्र में कभी कहा जाता था कि संसार के अनन्त पदार्थ प्रयोगशाला में जाकर सिर्फ 92 तत्व रह जाते हैं। किसी समय हमारे वैज्ञानिक लोग इन 92 तत्वों में ही संसार के अनन्त तत्वों के दर्शन कर लेते थे, आज के अणु युग में कहा जाता है कि इलेक्ट्रान, प्रोटान तथा न्यूट्रोन-इन तीन ‘ट्रोनों’ में विश्व के दर्शन हो जाते हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ‘एक ब्रह्मतत्व’ में विश्व का दर्शन करा दिया। क्रमश:

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