क्या अग्निहोत्री यज्ञ (हवन) किसी विशेष अवसर पर या कार्य के लिए ही करना चाहिए*

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पिछले दिनों एक संस्थान के वैदिक विद्वान सदस्य ने संस्था के अधिकारियों से आग्रह किया कि वे पुर्णिमा को उस संस्था में यज्ञ का प्रावधान करें और संस्था में यज्ञ करने की अनुमति दें। उन्हें इस अनुमति के लिए बड़ा संघर्ष करना पड़ा और अंत में दिवंगत आत्माओं के नाम पर यज्ञ हुआ।

अब एक साधारण मनुष्य के मन में प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या हवन प्रतिदिन नहीं किया जा सकता? क्या हवन करने के लिए किसी विशेष अवसर की आवश्यकता है? हवन के क्या लाभ हो सकते हैं? और शास्त्रों में इस विषय पर क्या कहा गया है ?

अग्निहोत्री या हवन रोज करने के विषय को निम्न प्रकार से अवलोकन विश्लेषण किया जा सकता है।

  1. यज्ञ का साधारण भाषा में अर्थ त्याग, समर्पण, शुभ कर्म से है। अग्निहोत्र यज्ञ करने वाला व्यक्ति अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित करता है। यह वैज्ञानिक रूप से देखा गया है कि यज्ञ के द्वारा वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है अतः इसके लिए कोई विशेष दिवस या कार्य की आवश्यकता नहीं है।

  2. क्योंकि यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ कार्य कहा गया है इसलिए यह प्रत्येक व्यक्ति को रोज करना चाहिए, जिससे अपना और संसार का भला हो सके।

  3. यजुर्वेद के अध्याय 22 की मन्त्र संख्या 23 के अनुसार जो मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्रादि यज्ञ और अपनी प्रकृति के योग्य आहार-विहार करते हैं, वे निरोग होकर बहुत अधिक जीने वाले होते हैं । अतः सभी को यज्ञ करना चाहिए।

  4. हवन करने का तरीका बहुत सरल है, ऐसे लकड़ियों से जिनमें ऑक्सीजन अधिक होती हैं और जलने पर बहुत कम कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जैसे आम, पीपल, ढाक इत्यादि से यज्ञ की अग्नि प्रज्ज्वलित करके, उसमें गाय के घी से प्रबुद्ध करके और उस प्रदीप्त अग्नि में उत्तम सामग्री की आहुति दी जाती है और साथ में वेदों के मंत्र बोले जाते हैं जिससे वातावरण शुद्ध हो।

  5. यजुर्वेद के अध्याय 3 मन्त्र 1 के अनुसार जब अग्नि में सुगन्धित पदार्थों का हवन होता है, तभी वह यज्ञ वायु आदि पदार्थों को शुद्ध करता है, तथा शरीर और औषधि आदि पदार्थों की रक्षा करके अनेक प्रकार के रसों को उत्पन्न करता है, उन शुद्ध पदार्थों के भोग से मनुष्यों के ज्ञान, विद्या और बल की वृद्धि होती है।

  6. यजुर्वेद्र के पहले अध्याय के अनुसार ही जो यज्ञ करने से वायु और जल की उत्तम शुद्धि और पुष्टि जैसी होती है वैसी अन्य प्रकार से नहीं हो सकती।कुछ लोग इत्रादि को वायु सुगंधित करने का साधन बताते हैं, जो कि गलत है क्योंकि इत्रादि में गंदी वायु को बहार फकने की क्षमता नहीं है, केवल अग्नि में ही दूषित वायु को बाहर निकालने और वातावरण को शुद्ध करने की क्षमता है।

  7. स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी अमर पुस्तक ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में स्पष्ट किया है कि यज्ञकुण्ड में डाली हुई सामग्री दुःख देने वाले रोगों को ऐसे बहाकर ले जाती है जैसे नदी झाग को बहाकर ले जाती है।

  8. अथर्ववेद के 1-8-1 और यजुर्वेद के (22.23 ) के अनुसार भी जो मनुष्य प्रतिदिन अग्निहोत्रादि यज्ञ और अपनी प्रकृति के योग्य आहार-विहार करते हैं वे निरोग होकर बहुत अधिक जीने वाले होते हैं अतः यज्ञ करने के लिए किसी विशेष अवसर या कार्य की आवश्यकता नहीं है।

  9. वैदिक विद्वानों के अनुसार यज्ञ आकाश में बोया जाता है और अन्न भूमि में।अन्न मनुष्य बोते हैं और यज्ञ देवता बोते हैं। जिस प्रकार अन्न-फल आदि जो पदार्थ भूमि में बोते हैं तो भूमि उसे हजार गुणा करके भूमि हमको देती है, वैसे ही जब हम यज्ञ द्वारा आकाश बोएँगे तो आकाश भी हजारों गुणा करके हमें दे देगा। विशेष ध्यान देने की बात है कि आकाश भूमि से करोड़ों गुणा बड़ा (विशाल) है।

9.‌ निष्कर्ष यह निकलता है कि हवन जब भी हो सके बिना किसी अवसर या कारण के, चाहे घर हो या संस्थान किया जा सकता है।

दलीप सिंह एडवोकेट

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