क्या BJP की जीत के लिए दीवाना बनेगा ‘अब्दुल’?

सावरकर का विरोध

किसके इर्द-गिर्द घूम रही है मुस्लिम राजनीति, समझिए

नदीम

आखिर ‘अब्दुल’ है कौन, जिसके इर्द-गिर्द मुस्लिम पॉलिटिक्स घूमने लगी है? दरअसल ‘अब्दुल’ पसमांदा मुस्लिम का प्रतीक बन गया है और बीजेपी ने जब से पसमांदा पॉलिटिक्स का दांव चला है, उसने ‘अब्दुल’ को अपने पाले का मान लिया है। उसने ‘बड़े मियां’ को ‘अपर कास्ट’ मुस्लिम का प्रतीक बनाकर विपक्ष के खेमे में खड़ा कर दिया है।’अब्दुल अब दरी नहीं बिछाएगा’, ‘अब्दुल अब बड़े मियां का हुक्का नहीं भरेगा’, ‘अब्दुल दरी तो बिछाएगा ही, अब पोछा भी लगाएगा’ ये शब्द बाण इन दिनों सियासी गलियारों में सुने-सुनाए जा रहे हैं। अगर, उत्तर प्रदेश के रामपुर उपचुनाव की बात की जाए, तो वहां का पूरा चुनाव ‘अब्दुल’ पर केंद्रित हो गया है। सवाल यही है कि आखिर ‘अब्दुल’ है कौन, जिसके इर्द-गिर्द मुस्लिम पॉलिटिक्स घूमने लगी है? दरअसल ‘अब्दुल’ पसमांदा मुस्लिम का प्रतीक बन गया है और बीजेपी ने जब से पसमांदा पॉलिटिक्स का दांव चला है, उसने ‘अब्दुल’ को अपने पाले का मान लिया है। उसने ‘बड़े मियां’ को ‘अपर कास्ट’ मुस्लिम का प्रतीक बनाकर विपक्ष के खेमे में खड़ा कर दिया है।

‘अब्दुल’ की एंट्री कैसे: 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत की हैट ट्रिक लगाने की रणनीति बनाने में जुटी बीजेपी को लगता है कि उसके लिए नए वोट बैंक तक पहुंच बनाना अपरिहार्य है। 2014 के चुनाव में 31 प्रतिशत वोट के साथ 282 सीट और 2019 में 37 प्रतिशत वोट के साथ 303 सीट उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है।

हिंदी भाषी राज्यों में उसकी विचारधारा से मेल खाने वाले कोर वोटर की गोलबंदी भी अपने शीर्षस्थ बिंदु पर देखी गई है। लगातार 10 साल सत्ता की वजह से विरोधी लहर भी प्रभावी हो जाता है, इसलिए उसने नए वोट बैंक तक पहुंच बनाने पर काम शुरू किया है। कौन-कौन नए वोट बैंक हो सकते हैं, बीजेपी के रणनीतिकारों ने जब इसकी पहचान शुरू की, तो उसमें उन्हें पसमांदा मुसलमान भी नजर आया।

क्या है वजह: मुसलमानों की कुल आबादी का 90 प्रतिशत पसमांदा मुसलमान हैं। पसमांदा पारसी शब्द है, जिसका अर्थ है- सफर में जो पीछे रह जाए। राजनीति में इस शब्द का इस्तेमाल वंचित या पिछड़े मुसलमानों के लिए हो रहा है। मुसलमानों में सिर्फ 10 प्रतिशत आबादी ही अपर कास्ट मुसलमानों की है, बाकी 90 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग सूची में आते हैं।

योजनाओं से लुभाया जा रहा: बीजेपी शासन की कल्याणकारी योजनाओं का जो लाभार्थी वर्ग है, उसमें भी इन्हीं 90 प्रतिशत मुसलमानों की भागीदारी है। बीजेपी के एक सीनियर लीडर ने बातचीत में कहा भी कि जो 10 प्रतिशत अपर कास्ट मुस्लिम हैं, वे बीजेपी के साथ आने वाले नहीं हैं। उन पर वक्त बर्बाद करने का मतलब नहीं है। जिन 90 प्रतिशत से संभावनाएं हैं, उन पर काम करना बेहतर होगा।

जुलाई में हैदराबाद में हुई बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री ने भी अल्पसंख्यकों के वंचित वर्ग से राब्ता बढ़ाने की जो बात कही थी, वह इसी पसमांदा वर्ग के लिए थी। इसी नजरिए से जिलावार उन पसमांदा मुसलमानों की सूची तैयार कराई है, जो लाभार्थी वर्ग में शामिल हैं और उन्हें ‘अब्दुल’ नाम दे दिया गया।

अब्दुल का क्या है अर्थ: अब्दुल का शाब्दिक अर्थ होता है- गुलाम। माना जाता है कि मुस्लिम राजनीति का रिमोट अपर कास्ट मुसलमानों के हाथ में है, लेकिन बीजेपी अब पसमांदा मुस्लिमों से आगे बढ़ने की बात कर रही है।

रामपुर के चुनाव में बीजेपी के हर बड़े-छोटे नेता ने अपनी सभाओं में ‘अब्दुल’ की ही बात की। उन्होंने कहा- अब्दुल अब बड़े मियां का हुक्का नहीं भरेगा, अब्दुल अब दरी नहीं बिछाएगा। इसी के बाद समाजवादी पार्टी के नेता आजम खां भी अपनी सभाओं में यह कहते सुने गए कि अब्दुल दरी तो बिछाएगा ही, उसे बीजेपी के दफ्तरों में पोछा भी लगाना पड़ेगा।

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