इसके अतिरिक्त मैं कहां से आया हूं। मैं क्यों आया हूं? मुझे कहां जाना है? मैं क्या कर रहा हूं? मुझे क्या करना चाहिए? ‘मैं’ और ‘वह’ अर्थात आत्मा और परमात्मा का संबंध क्या है? इसे कैसे प्रगाढ़ किया जा सकता है? यह सृष्टिक्रम क्या है? हम अपने स्वामी कैसे बने? परमात्मा को कैसे प्राप्त किया जा सकता है? इन रहस्यों के पर्दे वेद की ऋचाएं खोलती हैं। वेद की ऋचाओं में जो शब्द हैं-ये शब्द नहीं, मेरी दृष्टि में ऊर्जा के कण हैं, जो व्यक्ति के जीवन को और विश्व की व्यवस्था को अनुप्राणित करते हैं तथा आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
स्मरण रहे, जिनका सत्य स्वभाव नहीं, वे वेद के ज्ञान को नही समझ सकते हैं। वेद की शिक्षाओं को चित्त में ही नहीं अपितु आत्मा में धारण करना होगा, जैसे-
ओ३म् ईशावास्यमिदं सर्व यत्किच जगत्यां जगत।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद्घनम्।।
‘उठो, जागो आगे बढ़ो’ कर्म करते हुए जीओ। परस्पर हम एक दूसरे को मित्र की आंख से देखें। ‘सदा संगठित रहो,’ ‘हमारे विचार एक हों’ इत्यादि ऐसे सूक्त हैं जो जीवन सन्देश हैं।
वेद हमें आत्मसाक्षात्कार के लिए प्रेरित करता है। वेद कहता है-”मन, बुद्घि चित्त और अहंकार से पार जाना ही आत्मसाक्षात्कार कहलाता है। भाव यह है कि आत्मा में रमण करना ही आत्मसाक्षात्कार कहलाता है। वेद इस प्रकार आत्मा को दिव्यता प्राप्त कराता है। वेद हमारे आचरण को शुद्घ और सात्विक बनाता है, जिससे मन को वश में करना सरल होता है। हमारे ऋषि-मुनि अपनी संतानों को इसीलिए वेदाध्ययन के साथ-साथ आत्मसाक्षात्कार की शिक्षा प्रदान करते थे और उसका अभ्यास कराते थे। वेद हमें आंतरिक और बाह्य रूप से सचेतन करता है। वेद को समझने के लिए मनुष्य को पहले अपनी प्रकृति को उच्च, शुद्घ और सात्विक बनाना पड़ता है। जिसके हृदय में आध्यात्मिक चेतना का अभाव है, वह वेद को नहीं समझ सकता है। इसलिए वेद को समझने के लिए चेतना की पवित्रता का होना अत्यंत आवश्यक है। वेद इस संदर्भ में मार्ग प्रशस्त करता है। वेद जब यह कहता है-‘सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाओ।’ इससे अभिप्राय है कि मनुष्य को ‘सम्पूर्ण मानव’ बनाओ अर्थात उसके दुर्गुण, दुव्र्यसन का प्रक्षालन करो और उसके दिव्य गुणों को उभारो उनका पूर्ण प्रकटीकरण करो, तभी ऐसे व्यक्ति को ‘आर्य’ कहना सार्थक सिद्घ होगा। आर्य शब्द की महिमा और गम्भीरता पर प्रकाश डालते हुए महर्षि अरविन्द कहते हैं-जो आत्मसत्य में निवास करता है अर्थात जो आत्मस्वरूप में अवस्थित है उसे आर्य कहते हैं। वेद आत्मा की विशालता में जीना सिखाता है। इस अवस्था को प्राप्त करना सहज, सरल और स्वाभाविक नहीं है अपितु इसके लिए शुद्घ, सात्विक और आस्तिकता का जीवन जीना पड़ता है, जिसका पथप्रदर्शन वेद करता है। इस प्रकार वेद हमें आत्मा की विशालता में जीना सिखाता है। यह अद्भुत जीवन-शैली है, जो वेद की अनुपम देन है।
वेद एक चेतना है, वेद के सहारे हम जड़ पदार्थों में भी चेतना उत्पन्न कर सकते हैं। वेद श्रेष्ठ कर्मों में और शुद्घ सात्विक भावों में जीना सिखाता है, दुष्ट और आततायियों का दमन सिखाता है, ‘स्व’ और ‘स्वाभिमान’ की रक्षा भी सिखाता है। वेद, मन, बुद्घि, चित्त अहंकार का प्रक्षालन करता है। सामाजिक व्यवस्था को उच्च आदर्शों से सुसज्जित करता है। वेद मनुष्य को स्वधर्म निभाने के साथ-साथ राष्ट्रधर्म का निष्पादन करने तथा विश्वमंगल के लिए प्रेरित करता है। वेद प्रेम, एकता, सहचर्य, सौहार्द और मर्यादित जीवन जीना सिखाता है, आत्मीयता का संदेश देता है, यथा :-
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दु:ख भाग भवेत।।
क्रमश:

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