मुलायम सिंह यादव : व्यक्तित्व, विरासत और देश की राजनीति

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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री समाजवादी आंदोलन के एक सशक्त नेता के रूप में ख्याति प्राप्त रहे श्री मुलायम सिंह यादव का एक लंबी बीमारी के बाद गुडगांव स्थित मेदांता अस्पताल में निधन हो गया है। श्री यादव 82 वर्ष के थे। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे। उन्होंने अपनी जिंदगी में कई ऐसे काम किए जिनके लिए वह देर तक याद किए जाएंगे।
श्री मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में बहुत से साहसिक एवं विवादास्पद निर्णय भी लिए थे। अब उनके वे सभी निर्णय उनकी विरासत बन गए हैं। इतिहास में दर्ज खट्टे मीठे अनुभव अब उनके साथ जोड़ जोड़कर लोग देर तक याद किया करेंगे।
भारतीय राजनीति में नेताजी के नाम से विख्यात रहे मुलायम सिंह यादव को उनके आलोचकों ने कभी इस बात के लिए माफ नहीं किया कि उन्होंने मायावती के ऊपर अपने गुंडों की मार्फत लखनऊ के वीआईपी गेस्ट हाउस में प्राण लेवा हमला करवाया था। राजनीति को व्यक्तिगत रंजिश में परिवर्तित कर “कांटों” को रास्ते से बाहर कर देने की राजनीति की शुरुआत करने वाले मुलायम सिंह यादव को उनके आलोचकों ने कई बार अपनी आलोचना का पात्र बनाया। लोकतंत्र में इस प्रकार की हिंसा को कभी सहने की आ सकता । ना ही लोकतंत्र में किसी प्रकार की तानाशाही को पसंद किया जाता है। जन भावनाओं के अनुरूप कार्य करना और जन भावनाओं का सम्मान करना राजनीति में विशेषकर लोकतंत्र में अनिवार्य होता है।
श्री अटल बिहारी वाजपेई द्वारा अति शीघ्र निर्णय लेते हुए बहन मायावती को संरक्षण प्रदान करके उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुमारी मायावती को स्थापित किया था। इसका श्रेय श्री अटल बिहारी वाजपेई को जाता है कि उन्होंने मायावती की रक्षा की और उनको प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया ।
भारतीय संविधान संप्रदाय, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव करने की राजनीति को पूर्णतया नकारता है। नागरिकों के मध्य इस प्रकार के भेदभाव को प्रोत्साहित करना पूर्णतया अनैतिक है। जिन लोगों ने राजनीति में जाति को प्रमुखता देकर हिंदू समुदाय को विभाजित करने की राजनीति को प्रोत्साहित किया उन्हें भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दृष्टिगत गंभीर लोगों ने कभी प्रमुखता नहीं दी । पता नहीं, यह एक संयोग था या फिर श्री मुलायम सिंह यादव द्वारा जानबूझकर इसे अपनाया गया कि उन्होंने भारतीय राजनीति में जाति को प्रमुखता देने वाले दलों, गठबंधनों और विचार को ही अपनाया। उन्होंने जाति के आधार पर राजनीति में स्थान मांगने के एक नए प्रयोग की शुरुआत की। जिससे राजनीति संकीर्ण होती चली गई। श्री यादव के व्यक्तित्व की इस फितरत को लेकर भी उनके आलोचक उनकी आलोचना करते रहें।
भारतीय राजनीति में उनके प्रत्येक विरोधी ने उन पर परिवारवाद को प्रोत्साहित करने का भी आरोप लगाया। इसके लिए लोगों ने अनेक प्रकार के तथ्य एकत्र किए। वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी भी उनको “परिवारवादी” कहकर संबोधित करते रहे।
बदायूं की बलात्कार की घटना के संबंध में” लड़कों से गलती हो ही जाती है” ऐसा कहकर भी नेता जी उस समय विवादों में घिर गए थे। उनके इस बयान पर उनकी बहुत किरकिरी हुई थी।
उन जैसे जिम्मेदार और बड़े नेता से ऐसे बयान की अपेक्षा नहीं थी। पर राजनीति में कई बार सस्ती वाहवाही लूटने के लिए बड़े बड़ों से गलतियां हो जाती हैं। श्री यादव ने अपनी राजनीति की दबंगई का परिचय देते हुए उत्तराखंड की मांग करने वाले लोगों पर गोली चलवा दी थी, इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई ने यही नहीं उसी समय मध्यप्रदेश से छत्तीसगढ़ और बिहार से झारखंड को पृथक राज्यों का दर्जा प्रदान कर दिया गया था।
मुलायम सिंह यादव मुस्लिम तुष्टिकरण की अपनी मानसिकता का परिचय देते हुए अपने आप को मुल्ला मुलायम कहलाने में आनंद की अनुभूति करते थे। एक “अच्छे राजनीतिज्ञ” का परिचय देते हुए उन्होंने राम भक्तों पर गोली चलवा दी थी। उसको लेकर भी उनकी उस समय कटु आलोचना हुई थी।
हिंदू हितों की बलि चढ़ा कर मुस्लिम हितों को प्राथमिकता देने वाले राजनीतिज्ञों में शुमार मुलायम सिंह यादव ने सत्ता को प्राप्त करने के लिए हर उस हथकंडे को अपनाया जो उन्हें मुस्लिमपरस्त बनाने में सहायक हो सकता था। उनकी इस प्रकार की नीतियों को जब देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज ने समझा तो न केवल उन्हें सत्ता से बाहर किया गया बल्कि उनकी पार्टी को भी लोगों ने नकारना भी आरंभ कर दिया।
2003 में गौतम बुध नगर जनपद को तहस-नहस करके गाजियाबाद एवं बुलंदशहर में यथारूप प्रस्तावित करने का निर्णय लेकर भी मुलायम सिंह यादव ने अपने आप को स्थानीय लोगों की आलोचना का पात्र बनाया था।
श्री मुलायम सिंह यादव के व्यक्तित्व का जहां यह दुर्बल पक्ष रहा वहीं उनके बारे में यह भी कहा जा सकता है कि वह एक बहुत छोटे से घर से निकल कर राजनीति के शिखर पर पहुंचे। निश्चय ही इसके पीछे उनका संघर्ष काम कर रहा था। उन्हें सत्ता की जल्दी थी, इसलिए वह शॉर्टकट रास्ते को पकड़कर सत्ता में पहुंचने के लिए उतावले रहे। जब कोई राजनीतिक व्यक्ति इस प्रकार का उतावलापन दिखाता है तो वह गलतियां कर बैठता है। परंतु यह भी सत्य है कि दूरदृष्टि रखने वाला राजनीतिज्ञ ही राजनेता होता है। अपने राजनेता के स्वरूप को सुरक्षित रखने के लिए वह सत्ता के साथ सौदा नहीं करता, ना ही वह सत्ता का वरण करता है, बल्कि सत्ता उसके साथ सौदा करती है, सत्ता ही उसका वरण करती है। राजनीति में रहकर सत्ता के प्रति एक उचित दूरी बनाकर जो व्यक्ति चलता है, सत्ता उसकी ओर दौड़ी दौड़ी आती है । इस प्रकार राजनीति में धैर्य बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि कोई व्यक्ति सत्ता में रहकर निहत्थे लोगों पर गोली चलवाता है या अपने आप को किसी वर्ग विशेष के प्रति समर्पित करके दिखाता है तो समझ लो कि वह सत्ता का दास है।
हम मुलायम सिंह यादव को उनकी अपनी विरासत से दूर नहीं कर रहे हैं, ना ही हमको यह अधिकार है कि हम उन्हें उनकी ही भव्य विरासत से दूर कर दें। वैसे भी जब इस काम को उनके बेटे के द्वारा ही कर दिया गया है तो हम आप ऐसा करने वाले होते कौन हैं ? राजनीति के हाशिए पर उनको उनके बेटे के द्वारा ही फेंक दिया गया था। राजनीति के हाशिए पर सिसकते हुए वह संसार से गए हैं। वे सत्ता के केंद्र में रहना चाहते थे और इसी रूप में संसार को छोड़ना चाहते थे , पर उनके सपूत ने उनकी इस इच्छा पर भी पानी फेर दिया। उनके उपरांत भी हम उनके उस प्रत्येक कार्य को नमन करते हैं, जो उन्होंने राष्ट्रहित और जनहित में उचित समझ कर लिया। उनके संघर्षशील स्वभाव को भी हम नमन करते हैं, क्योंकि राजनीति में संघर्ष के बल पर ही आगे बढ़ा जाता है। मृत्यु के उपरांत कभी किसी के प्रति वैमनस्य नहीं रखना चाहिए, यह भारतीय चिंतन की विशेषता है। जाने वाले के प्रति यदि उसकी मौत पर भी दुर्भाव का प्रदर्शन किया गया तो यह हमारे समाज में उचित नहीं माना जाता। अंत में हम यह कहना चाहेंगे कि हमने यहां जो कुछ लिखा है वह एक जीते हुए राजनीतिज्ञ के लिए लिखा है, पर आज जिस राजनीतिज्ञ का शव हमारे बीच में है उस पर हम विनम्रता से अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनके शुभ कार्यों का उन्हें अवश्य अच्छा फल मिलना चाहिए।
अब ऐसी राजनीतिक विरासतों पर पूर्ण विराम लगना चाहिए जिनके चलते सत्ता बाजार की वस्तु बन जाती है, निहित स्वार्थों को साधने और तुष्टीकरण के माध्यम से अपने राजनीतिक लक्ष्य तक पहुंचने की तरकीबों और तिकड़मों को अपनाकर व्यक्ति के व्यक्तित्व के साथ ही खिलवाड़ करने लगती है।

देवेन्द्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन उगता भारत

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