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आज हम स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक हैं। हमारी राज-भाषा हिंदी है, हिंदीभाषी विश्व में सबसे अधिक हैं। अंग्रेजी को ब्रिटेन के लगभग दो करोड़ लोग मातृभाषा के रूप में प्रयोग करते हैं, जबकि हिंदी को भारत में उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे प्रांतों में लगभग साठ- पैंसठ करोड़ लोग अपनी मातृभाषा के रूप में प्रयोग करते हैं। हिंदी संपर्क भाषा के रूप में पूरे देश में तथा  देश से बाहर श्रीलंका, नेपाल, बीर्मा, भूटान, बांगलादेश, पाकिस्तान, मारीशस जैसे सुदूरस्थ देशों में भी बोली-समझी जाती है। विश्व की सर्वाधिक समृद्घ भाषा और बोली-समझी जानेवाली भाषा हिंदी है लेकिन इस हिंदी को भारत सरकार नौकरों की भाषा बताती हैं। दोष सरकार का नही अपितु अफसरों की गुलाम मानसिकता का है।

पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश में हिंदी के स्थान हिंदुस्तानी नाम की एक नई भाषा (जिसमें उर्दू के अधिकांश तथा कुछ अन्य भाषाओँ के शब्द हों) को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने का अनुचित प्रयास किया। वे भूल गये कि हर भाषा की तरह हिंदी का अलग व्याकरण है जबकि उर्दू या हिंदुस्तानी का कोई व्याकरण नही है। इसलिए शब्दों की उत्पत्ति को लेकर उर्दू या हिंदुस्तानी बगलें झांकती हैं, जबकि हिंदी अपने प्रत्येक शब्द की उत्पत्ति के विषय में अब तो सहज रूप से समझा सकती है, कि इसकी उत्पत्ति का आधार क्या है?

कांग्रेस प्रारंभ से ही राजनीतिक अधिकारों के साथ भाषा को भी सांम्प्रदायिक रूप से बांटने के पक्ष में रही।  काँग्रेस के 25वें हिंदी साहित्य सम्मेलन सभापति पद से राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद जी ने कहा था- ’हिंदी में जितने फारसी और अरबी के शब्दों का समावेश हो सकेगा उतनी ही वह व्यापक और प्रौढ़ भाषा हो सकेगी।’ इंदौर सम्मेलन में गांधी जी और आगे बढ़ गये जब उन्होंने हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं को एक ही मान लिया था। इसीलिए भारत में साम्प्रदायिक और भाषाई आधार पर प्रांतों का विभाजन / निर्माण हुआ ।

प्रारंभ में कांग्रेसी कथित हिंदुस्तानी में उर्दू के तैतीस प्रतिशत शब्द डालना चाहते थे, मुसलमान पचास प्रतिशत उर्दू शब्द चाह रहे थे जबकि मुसलिम लीग के नेता जिन्ना इतने से भी संतुष्ट नही थे। कांग्रेसी  नेता मौलाना आजाद का कहना था कि उर्दू का ही दूसरा नाम हिंदुस्तानी है जिसमें कम से कम सत्तर प्रतिशत शब्द उर्दू के हैं। पंजाब के प्रधानमंत्री सरब सिकंदर हयात खान की मांग थी कि हिंदुस्तान की राजभाषा उर्दू ही हो सकती है, हिंदुस्तानी नहीं।

स्वतंत्रता के बाद हिंदी के बारे में हमारे देश की सरकारों का वही दृष्टिकोण रहा जो स्वतंत्रता पूर्व या स्वतंत्रता के एकदम बाद कांग्रेस का था। हिंदुस्तानी ने हिंदी को बहुत पीछे धकेल दिया। पूरे देश में अंग्रेजी और उर्दू मिश्रित भाषा का प्रचलन समाचार पत्र-पत्रिकाओं में तेजी से बढ़ा है। फलतः नई पीढ़ी हिंदी बहुत कम जानती है। हमारी मानसिक दासता के कारण अंग्रेजी हमारी शिक्षा पद्घति का आधार है। प्रारंभ से राजभाषा के रूप में हिंदी फलती-फूलती तो भाषाई दंगे कदापि नही होते। भाषा को राजनीतिज्ञों ने अपनी राजनीति चमकाने के हथियार के रूप में प्रयोग किया है। तिलक जैसे देशभक्त के प्रांत में भाषा के नाम पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राजठाकरे जो कर रहे हैं वह कतई उचित नही है।

स्वतंत्र भारत में पहले दिन से ही हिंदी राजनीतिज्ञों की उपेक्षावृत्ति व घृणापूर्ण अवहेलना का शिकार हुई। श्री नेहरू के समय में कामराज जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के पास दिल्ली से हिंदी में पत्र जाने पर उन्होंने अपने पास एक अनुवाद रखने के स्थान पर ‘इन पत्रों को कूड़े की टोकरी में फेंक दो’- ऐसा निर्देश देकर राजभाषा के प्रति अपने घृणास्पद विचारों का प्रदर्शन किया था।  भारत वर्ष में कुल जनसंख्या का पांच प्रतिशत से भी कम भाग अंग्रेजी समझता है। हमें गुजराती होकर मराठी से और मराठी होकर हिंदी से घृणा है लेकिन विदेशी भाषा अंग्रेजी से प्यार है। जो भाषा संपर्क भाषा भी नही हो सकती उसे हमने पटरानी बना लिया और जो भाषा पटरानी है उसे दासी बना दिया। आज विदेशी भाषा अंग्रेजी के कारण  देश की अधिकांश आर्थिक नीतियों और योजनाओं का लाभ देश का एक विशेष वर्ग उठा रहा  हैऔर उसे संरिद्ध होते देखकर  हिंदीभाषी व्यक्ति को लगता है जैसे हिंदी बोलकर वह अत्यंत छोटा काम कर रहा है। किसी साक्षात्कार में अभ्यर्थी ने यदि बेहिचक अंग्रेजी  में प्रश्नों के उत्तर दिये हैं तो उसके चयन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इसलिए देश में हिंदी के प्रति उपेक्षाभाव बढ़ता जा रहा है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है किंतु किसानों के लिए टीवी और रेडियो पर अंग्रेजी में या अंग्रेजी प्रधान शब्दों से भरी वार्ताएं प्रसारित की जाती हैं जिन्हें किसान समझ नही पाता, इसलिए सुनना भी नही चाहता। इसी कारण टीवी और रेडियो पर आयोजित वार्ताओं का अपेक्षित परिणाम नही मिल पाता। देश को एकता के सूत्र में पिरोये रखने के लिए राजनीति नहीं भाषा नीति की आवश्यकता है। इस हेतु शिक्षा का संस्कारों पर आधारित होना नितांत आवश्यक है। संस्कारित और शिक्षित नागरिक तैयार करना जिस दिन हमारी शिक्षा नीति का उद्देश्य हो जाएगा उसी दिन इस देश से कितनी ही समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

अभी तक के आंकड़े यही बताते हैं कि हमने मात्र शिक्षित नागरिक ही उत्पन्न किये हैं, संस्कारित नहीं। संस्कारित और देशभक्त नागरिकों का निर्माण देश की भाषा से ही हो सकता है। देश की अन्य प्रांतीय भाषाएं हिंदी की तरह ही संस्कृत से उद्भूत हैं। इन भाषाओं के नाम पर देश की राजभाषा की उपेक्षा करना राजनीति के मूल्यों से खिलवाड़ करना तथा विदेशी भाषा को अपनी पटरानी बनाकर रखना तो और भी घातक है।

राकेश कुमार आर्य
संपादक :उगता भारत

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