‘आप’ के शुभचिंतकों के लिए चिंता…….

तनवीर जाफ़री

जनता को भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का सपना दिखाकर मात्र दो वर्ष पूर्व गठित की गई आम आदमी पार्टी जहां तेज़ी से बढ़ते हुए अपने जनाधार के लिए जानी जा रही है वहीं इतने कम अंतराल में ही इसके कई प्रमुख बल्कि पार्टी का गठन करने वाले स्तंभ रूपी नेताओं का पार्टी छोडक़र चले जाना या फिर पार्टी से उनका विमुख होना अथवा उनकी अवहेलना होना जैसी बातें ‘आप’ के शुभचिंतकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं। ‘आप’ में अरविंद केजरीवाल सहित जितने भी गिने-चुने चेहरे पार्टी के प्रमुख नेताओं के रूप में दिखाई दे रहे हैं उनकी ईमानदारी व योग्यता पर आसानी से संदेह नहीं किया जा सकता। निश्चित रूप से दिल्ली की जनता ने भी यही सब देख व समझकर तथा भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति की उम्मीद लेकर आम आदमी पार्टी के प्रति अपना भरपूर स्नेह व समर्थन ज़ाहिर किया है। दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के किसी भी राज्य में आज तक इतने बड़े समर्थन व अनुपात के साथ कोई भी दल किसी भी विधानसभा में विजयी होकर नहीं आया। सवाल यह है कि जब आम जनता आम आदमी पार्टी को इतनी जल्दी आम आदमी की पार्टी समझने लगी है, अरविंद केजरीवाल सहित इसके सभी नेताओं पर पूरा भरोसा करने लगी है,यहां तक कि किरण बेदी जैसी ईमानदार,दबंग व होनहार आईपीएस आफ़िसर जिन्होंने कि केजरीवाल के बजाए भाजपा का दामन थामा उन्हें भी जनता ने सबक सिखाया। शाजि़या इल्मी जोकि केजरीवाल की खास सहयोगी रह चुकी थी उनके बहकावे में भी जनता नहीं आई? ऐसे में एक बार फिर योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण जैसे पार्टी के स्तंभ सरीखे नेताओं को पार्टी की राजनैतिक मामलों की समिति से अलग किया जाना आखिर क्या संदेश दे रहा है?

क्या अरविंद केजरीवाल व उनके तथाकथित वफादार शुभचिंतक आम आदमी पार्टी को उसके वास्तविक लक्ष्य से दूर कर पार्टी पर वर्चस्व व एकाधिकार की राजनीति करना चाह रहे हैं? किन परिस्थितियों में प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव की बातों की तथा उनके विचारों की अनसुनी करते हुए पार्टी की राजनैतिक मामलों की समिति ने बहुमत से इन दोनों नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया? पार्टी के गठन में तथा इसे मज़बूती से खड़ा करने में इन दोनों ही नेताओं की योग्यता तथा कुर्बानियों की अनदेखी हरगिज़ नहीं की जा सकती। इसके बावजूद अरविंद केजरीवाल के समर्थक सदस्यों ने बजाए इसके कि वे बीच का रास्ता निकाल कर इन दोनों के साथ सुलह-सफाई के साथ पेश आते और इन्हें पूरा मान-सम्मान देने की कोशिश करते ठीक इसके विपरीत कार्य समिति का बहुमत केजरीवाल के पक्ष में खड़ा हो गया और इन दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया? केजरीवाल व स्वयं को उनका खास समझने वाले सभी ‘आप’ नेताओं को कांग्रेस पार्टी के गठन से लेकर उसके पतन तक के पूरे घटनाक्रम को गौर से देखना चाहिए। कोई भी पार्टी जब किसी एक व्यक्ति अथवा परिवार के वर्चस्व अथवा एकाधिकार का शिकार हुई है तब-तब उसे देर-सवेर पतन की ओर बढऩा पड़ा है। किसी भी पार्टी को अपने सिद्धांतों,विचारों के आधार पर अपना लक्ष्य निर्धारित करना पड़ता है। यदि पार्टी मेंं लोकतंत्र नहीं है, पार्टी के सदस्यों की बात सुनी नहीं जा रही हो और वह भी ऐसे सदस्यों की जिन्होंने अपना सब कुछ कुर्बान कर पार्टी को अपने खून-पसीने से सींचा हो फिर आिखर ऐसी पार्टी के उज्जवल भविष्य की कल्पना कैसे की जा सकती है? आज यदि अरविंद केजरीवाल पार्टी के एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं तो इसमें उनकी पार्टी के इन्हीं प्रमुख नेताओं की भी बहुत अहम भूमिका है। केजरीवाल ने जब-जब देश के उद्योगपतियों के विरुद्ध मोर्चा खोला या सरकार के विरुद्ध उसकी अनियमितताओं या सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध आरोप लगाए उस समय उनकी ढाल के रूप में प्रशांत भूषण उनके साथ संवाददाता सम्मेलन से लेकर अदालत तक में खड़े दिखाई दिए। दिल्ली के पूरे चुनाव में टेलीविज़न स्टूडियो से लेकर जनसभाओं तक में योगेंद्र यादव ने अपने सरल व उदार स्वभाव तथा अपनी हाजि़र जवाबी से अपनी पूरी काबिलियत का परिचय देते हुए आम आदमी पार्टी को दिल्ली की सत्ता तक पहुंचाने में अपनी अहम भूमिका अदा की। परंतु आनन-फानन में अरविंद केजरीवाल के समर्थकों ने इन नेताओं के साथ जो व्यवहार किया वह आम आदमी पार्टी के समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए चिंता का विषय है।

अरविंद केजरीवाल को चाहिए कि वे एक दूरदर्शी राजनीतिज्ञ का परिचय देते हुए अपनी पार्टी में पैदा किए जा रहे ‘हाईकमान कल्चर’ से बाज़ आएं। वे पार्टी पर वर्चस्व या एकाधिकार की राजनीति करने की कतई कोशिश न करें। दिल्ली चुनाव से पूर्व किरण बेदी व शाजि़या इल्मी की बात जनता ने बेशक नहीं सुनी परंतु सत्ता में आने के बाद पार्टी के भीतर आने वाले इस प्रकार के राजनैतिक भूचाल पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। जिस प्रकार केजरीवाल ने देश की जनता को भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति का सपना दिखाया है उसी तरह उनकी पार्टी के और भी कई लोग काफी कुछ त्यागकर उनके कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए हैं जो पार्टी में पैदा हो रहे ऐसे हालात से खुश नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर मयंक गांधी को ही प्रशांत भूषण व योगेंद्र यादव के साथ हुआ अन्याय रास नहीं आया। उन्होंने भी इस कार्रवाई की निंदा की है। वे स्वयं भी आम आदमी पार्टी की राजनैतिक मामलों के सदस्य होने के बावजूद बैठक में उपसिथत नहीं हुए थे। दूसरी ओर अपने विरुद्ध हुई कार्रवाई के बावजूद योगेंद्र यादव ने अपने समर्थकों व शुभचिंतकों की आम आदमी पार्टी नामक ‘विचार’ से सहयोग बनाए रखने की अपील कर अपने बडक़पन का परिचय दिया है। कहीं ऐसा न होकि गत् एक वर्ष के भीतर आम आदमी पार्टी में अनेक नेताओं के साथ होने वाली इस तरह की कार्रवाईयां व उनका पार्टी से मोह भंग होना इस बात की पुष्टि कर दे कि अरविंद केजरीवाल व उनकी चौकड़ी पार्टी पर अपनी तानाशाही थोपना चाह रही है और पार्टी से इन नेताओं के मोहभंग होने का कारण अरविंद केजरीवाल की पार्टी पर वर्चस्व व एकाधिकार की मंशा मात्र है। केजरीवाल मीडिया के समक्ष तथा जनता के बीच जितने उदार व सरल स्वभाव के तथा हर तरह की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहने वाले व्यक्ति नज़र आते हैं यहां तक कि वे अपने स्वास्थय की चिंता किए बिना अपनी जान पर खेलकर जनता की सेवा के लिए हर वक्त तैयार दिखाई देते हैं उन्हें अपनी पार्टी के दूसरे सम्मानित नेताओं के साथ भी उसी विनम्रता के साथ पेश आना चाहिए। पार्टी कभी भी किसी एक व्यक्ति की तानाशाही या उसके अपने अकेले विचारों के आधार पर कतई नहीं चल सकती। पार्टी में स्तंभरूपी सभी नेताओं का ही नहीं बल्कि मामूली से मामूली कार्यकर्ता का भी अपना महत्व होता है। अरविंद केजरीवाल की कुर्बानी,उनकी योग्यता,उनका समर्पण सबकुछ सराहनीय है। उनके विचार व दर्शन निश्चित रूप से जनता को वह सपने दिखा रहे हैं जिसकी महात्मा गांधी तथा अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने उम्मीद की थी। परंतु छोटी-छोटी स्वार्थपूर्ण बातों के चलते अथवा कथित रूप से राज्यसभा की सीटों के बंटवारे को लेकर या फिर पार्टी पर अपने एकाधिकार के चले जाने के भय से पार्टी में विघटन के हालात पैदा कर देना या फिर अपने घनिष्ठ सहयोगियों को उनकी अनसुनी कर नाराज़ कर देना यह बातें कतई मुनासिब नहीं हैं।

जिस प्रकार उन्होंने आम जनता के दिलों में अपनी जगह बनाई है अरविंद केजरीवाल को चाहिए कि उसी प्रकार अपनी पार्टी के नेताओं में वे लोकप्रिय व सर्वमान्य बनने की कोशिश करें। यदि उनकी वजह से या उनके कथित खास साथियों की वजह से कुछ लोग नाराज़ हो रहे हों तो वे स्वयं इस पर नज़र रखें और पार्टी में ऐसी स्थिति कतई पैदा न होने दें। इतना ही नहीं बल्कि पार्टी छोडक़र गए उनके वह सहयोगी जो भ्रष्टाचार मुक्त भारत तथा भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति के मिशन में उनके साथ थे उन्हें भी पूरे उदार हृ्दय के साथ पार्टी में वापस जगह दें। केजरीवाल को यह ध्यान रखना चाहिए कि भारतवर्ष एक विशाल देश है। यहां राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक दल का गठन करना कोई आसान काम नहीं है। उनके जो सहयोगी नेता उन्हें छोडक़र जा रहे हैं या उनसे किसी कारणवश विमुख हो रहे हैं यह सिलसिला तो बंद होना ही चाहिए। साथ-साथ उन्हें अपने संगठन के भीतर अपने व्यवहार से ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए कि देश के दूसरे राजनैतिक दलों में रहकर घुटन महसूस करने वाले नेतागण जोकि खुद भी भ्रष्टाचार मुक्त देश का सपना तो ज़रूर देख रहे हैं परंतु कोई मुनासिब राजनैतिक विकल्प न होने के कारण किसी न किसी दल में फंसे हुए हैं वे भी आम आदमी पार्टी की ओर आकर्षित हो सकें। परंतु यदि इसी प्रकार की नकारात्मक खबरें पार्टी से बार-बार आती रहीं तो यह आम आदमी पार्टी के भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.

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