राजनीति तो केवल सत्ता सुख भोगने का एक ज़रिया

निर्मल रानी

राजनीति यदि पूरी जि़म्मेदारी,ईमानदारी,पारदर्शिता तथा जनकल्याण आदि के मक़सद को लेकर की जाए तो निश्चित रूप से यह कोई कम पुनीत पेशा नहीं है। परंतु हमारे देश की वर्तमान राजनीति तो गोया केवल सत्ता सुख भोगने का एक ज़रिया बन कर रह गई है। चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में प्रधानमंत्री चाणक्य से जब कोई व्यक्ति रात्रि के समय मिलने आता था और वे कोई सरकारी कार्य कर रहे होते थे उस समय वे मिलने वाले व्यक्ति के बारे में पूछते थे कि वह किसी राजकीय कार्य हेतु उनसे मिलने आया है अथवा निजी मुलाकातवश? यदि वह राजकीय कारणों से उनसे मिलने आता तो वे दीपक जलता रहने देते अन्यथा उसे बुझा कर अंधेरे में ही उससे बात करते। उनका ऐसा करने के पीछे यह संदेश था कि राजकीय खर्च से खरीदा गया मिट्टी का तेल केवल राजकीय विचार-विमर्श के लिए ही खर्च किया जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि यह परंपरा चाणक्य के साथ ही समाप्त हो गई। बल्कि उस नीति का अनुसरण लाल बहादुर शास्त्री,गुलज़ारी लाल नंदा तथा इन जैसे स्वतंत्र भारत के और कई नेताओं ने किया। शास्त्री जी देश के पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने एक रेल दुर्घटना के चलते दुर्घटना की नैतिक जि़म्मेदारी लेते हुए रेलमंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया था। वे अपने परिवार के किसी सदस्य को रेलमंत्री व प्रधानमंत्री रहते हुए निजी कार्यों हेतु सरकारी गाड़ी अथवा किसी दूसरे सरकारी सुख-साधन का उपयोग नहीं करने देते थे। ज़ाहिर है जब राजनीति में ऐसे ईमानदार लोग थे और अभी भी अनेक राजनेता हैं तो निश्चित रूप से उनके सोच-विचार,उनकी बोल-भाषा,उनकी वाणी,उनका रहन-सहन सब कुछ उनके इसी स्वभाव के अनुरूप ही था और है। ऐसे नेता जब बोलते थे तो जनता उन्हें पूरे धैर्य व प्यार के साथ सुनती थी। उनकी बातों पर विश्वास करती थी। परंतु समय बदलने के साथ-साथ ऐसा लगता है कि हमारे देश की राजनीति का चेहरा भी अत्यंत कुरूप हो चुका है। यही राजनीति अब केवल साम-दाम,दंड-भेद के द्वारा सत्ता हथियाने का हथकंडा बन कर रह गई है। राजनीति में सिद्धांत अथवा विचारधारा नाम की कोई चीज़ अब नज़र नहीं आती। किसी राजनेता का नाम लीजिए तो यह सोचना पड़ता है कि अमुक नेता इन दिनों किस पार्टी में है। ज़ाहिर है कुरूप होती इस राजनीति में नेताओ्रं के न केवल राजनैतिक मकसद बदले हैं बल्कि इसी के साथ-साथ उनके सोच-विचार,उनकी वाणी,लहजा सब कुछ काफी बदल गया है। एक कवि ने कहा है कि-

हाथों में उनके शंख थे वे क्या बजा गए।

जंगल में जितने सांप थे बस्ती में आ गए?

 कोयल किसी भी डाल पे अब कूकती नहीं

कौए कि बोल-बोल मेरे कान खा गए??

आज यदि हम नेताओं के भाषणों पर नज़र डालें तो ऐसी-ऐसी शब्दावली का प्रयोग इन तथाकथित नेताओं द्वारा किया जाने लगा है कि इनके द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रयोग में लाए गए शब्दों को टेलीविज़न का संपादक मंडल जनता को सुनाना नहीं चाहता। समाचार पत्र ऐसे शब्दों को छापने से परहेज़ करते हैं। परंतु दुर्भाग्यवश हमारे देश के यह सांसद,विधायक या जनप्रतिनिधि हैं जोकि अपनी विषैली ज़ुबान से ज़हर उगलने से बाज़ नहीं आते। यह इनकी बदज़ुबानी का ही ‘प्रताप’ है कि आज पूरे देश में वैमनस्य का बाज़ार गर्म है। भ्रष्टाचार अपने चरम पर है। सांप्रदायिकता और जातिवाद सर चढक़र बोल रहे हैं। भारतीय समाज विभिन्न वर्गों में बंटता जा रहा है। परंतु हमारे यह गैरजि़म्मेदार नेता हैं जोकि अपनी बदज़ुबानी,बदकलामी तथा बदनीयती से बाज़ नहीं आ रहे। राजनीति को समाज सेवा का नहीं बल्कि ऐशपरस्ती का एक साधनमात्र मान लिया गया है।     ज़रा पूरी ईमानदारी के साथ यह सोच कर देखिए कि यदि देश का कोई नेता आपसे चुनाव पूर्व यह कहे कि मैं प्रधानमंत्री बना तो दस लाख रुपये की क़ीमत का सूट धारण करुंगा। क्या मतदाता ऐसे व्यक्ति को उसकी ऐसी बात सुनकर चुनाव में वोट दे सकते हैं?हरगिज़ नहीं। परंतु जब वही व्यक्ति यह कहे कि मैं चुनाव जीता और सत्ता में आया तो विदेशों में जमा काले धन की एक-एक पाई वापस लाऊंगा। और काला धन वापस आने के बाद आपके खाते में 15-15 लाख रुपये पड़ सकते हैं। ज़ाहिर है देश की जनता किसी नेता के इस बोल पर विश्वास कर सकती है। परंतु ऐसे सब्ज़बाग दिखाकर जब वही व्यक्ति आपके नाम के खाते तो खुलवा दे परंतु उन खातों में पैसे डालने के बजाए दस लाख रुपये का अपना सूट सिलवा ले, जनता के साथ इससे बड़ा विश्वासघात व धोखा और क्या हो सकता है? इसी प्रकार देश में और भी तमाम नेता ऐसे हैं जो अपने बेतुके व कड़वे वचनों के लिए ‘कुख्यात’ हो चुके हैं। कोई नेता यह कहता सुनाई देता है कि यदि कोई मतदाता अमुक नेता अथवा पार्टी को वोट नहीं देता तो वह देश छोडक़र पाकिस्तान चला जाए। दुर्भाग्वश ऐसे कटु वचन बोलने वाले व्यक्ति को समझाने या उस पर लगाम लगाने के बजाए उसे मंत्री बनाकर उसकी हौसला अफज़ाई की जाती है। कई जनप्रतिनिधि इन दिनों देश में घूम-घूम कर यह कहते फिर रहे हैं कि चार-पांच अथवा दस बच्चे पैदा करो। विश्व स्वास्थय संगठन विश्व की जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रहा है। भारत में भी जनसंख्या नियंत्रित रखने हेतु कई उपाय अपनाए जा रहे हैं। यहां तक कि इस मिशन को प्रोत्साहित करने हेतु लोगों को धनराशि भी दी जाती है। परंतु ठीक इसके विपरीत सत्तारूढ़ दल के ही सांसद सार्वजनकि रूप से परिवार नियोजन नीति का विरोध करें आिखर राजनीति का यह कैसा चेहरा है?     इससे भी आगे बढ़ें तो हमें दिखाई देगा कि हमारे राजनेता अपने मुखारविंद से हरामज़ादे,हरामखोर,कुत्ते के बच्चे जैसे अभद्र व असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल अपने विरोधी नेताओं के लिए करते देखे जा रहे हैं। कोई अपने विरोधी को गधा कह रहा है तो कोई बंदर। कोई कुत्ते का पिल्ला बता रहा है। क्या देश की आज़ादी दिलाने वाले हमारे पूज्य स्वतंत्रता सेनानियों ने कभी ऐसा सोचा होगा कि दुनिया को तमीज़ व तहज़ीब सिखाने वाले भारतवर्ष में इस प्रकार के असभ्य राजनेता देश की सत्ता पर भविष्य में काबिज़ होंगे? क्या महात्मा गांधी के मुंह से किसी ने कभी कोई कड़वे शब्द सुने? किसी अन्य राजनेता यहां तक कि गर्म दल से संबंध रखने वाले नेता भी न केवल वैचारिक व सैद्धांतिक रूप से सच्चे राजनेता व देशभक्त थे बल्कि वे सभी अपने विरोधी विचारधारा रखने वाले नेताओं के प्रति भी बेहद सद्भावपूर्ण वातावरण बनाकर रखते थे। वे सभी अत्यंत मृदुभाषी थे। अंग्रेज़ों के प्रति पूरी तरह आक्रामक रुख रखने के बावजूद उनका व्यक्तित्व बेहद सहनशील व मिलनसार था। वे कभी सपने में भी यह सोच नहीं सकते थे कि समाज को विभाजित कर लोगों में फूट डालकर सत्ता की राजनीति की जाए। या अपने विरोधी विचारधारा के लोगों को अपमानित करने के लिए गाली-गलौच अथवा असंसदीय भाषा का प्रयोग किया जाए। परंतु दुर्भाग्यवश आज की राजनीति में देश की जनता न चाहते हुए भी यह सब देखने व सुनने को मजबूर है।     परंतु निराशा व अंधकारमय राजनीति के इसी दौर में स्वतंत्रता के 6दशकों के बाद देश में अरविंद केजरीवाल नामक एक ऐसे नेता का उदय हुआ है जो देश की जनता की आकांक्षाओं के अनुरूप दिखाई दे रहा है। केजरीवाल का रहन-सहन,उनकी बोल-भाषा,उनकी कार्यशैली,विचारधारा सबकुछ लगभग वैसी है जैसी कि इस देश में आम जनता चाहती है। दस लाख रुपये का सूट पहनना तो दूर वह मंहगी कारों तक में चलना पसंद नहीं करते। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पूर्व ही मंहगी ज़ेड प्लस सुरक्षा लेने से इंकार कर दिया है। उन्होंने दिल्ली के विधानसभा चुनाव के दौरान अपने ऊपर कौन-कौन से शब्दबाण नहीं झेले। उन्हें अनारकिस्ट यानी अराजकता फैलाने वाला व्यक्ति कहा गया। उनकी तुलना नक्सलियों से की गई। धरनेबाज़,ड्रामेबाज़,उपद्रवी गोत्र का, बंदर, हरामखोर,चोर,सत्ता का भूखा,भगौड़ा,प्रधानमंत्री पद की लालसा रखने वाला तथा बच्चों की झूठी क़समें खाने वाला आदि न जाने क्या-क्या कहा गया। परंतु आरोपों की इतनी झड़ी सहने के बावजूद मात्र 47 वर्षीय इस शिक्षित युवा नेता के चेहरे पर कोई शिकन न आई। और आिखरकार दिल्ली की जनता ने उसे ऐतिहासिक मतों से व उसकी पार्टी को 70 में से 67 सीटों पर विजय दिलवाकर देश को यह संदेश दे दिया कि राजनीति को कुरूप करने वाले समाज को बांटने वाले अपशब्द बोलने वाले या सत्ता को ऐशपरस्ती का साधन समझने वाले नेताओं को जनता फूटी नज़र भी देखना पसंद नहीं करती। देश की जनता वास्तव में लोकतंत्र को उसके अर्थानुसार संचालित करने वाले राजनेताओं को ही पसंद करती है। यानी जो यह समझे कि लोकतंत्र जनता का तंत्र है जो जनता के लिए जनता द्वारा निर्वाचित किया गया है। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि देश में दूषित होती जा रही राजनीति के वर्तमान दौर में अरविंद केजरीवाल एक उम्मीद की किरण के समान हैं।

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