वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में भूमिगत जलशिराओं का सिद्धान्त”

images - 2022-06-23T105709.506

लेखक:- डॉ. मोहन चंद तिवारी
(12मार्च, 2014 को ‘उत्तराखंड संस्कृत अकादमी’, हरिद्वार द्वारा ‘आईआईटी’ रुड़की में आयोजित विज्ञान से जुड़े छात्रों और जलविज्ञान के अनुसंधानकर्ता विद्वानों के समक्ष मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य ‘प्राचीन भारत में जलविज्ञान‚ जलसंरक्षण और जलप्रबंधन’ से सम्बद्ध चर्चित और संशोधित लेख)

प्राचीन काल के कुएं बावड़ियां,नौले आदि जो आज भी लोगों को पेयजल की आपूर्त्ति के महत्त्वपूर्ण जल संसाधन हैं,उनमें बारह महीने निरंतर रूप से शुद्ध और स्वादिष्ट जल पाए जाने का एक मुख्य कारण यह भी है कि ये कुएं,बावड़ियां या नौले हमारे पूर्वजों द्वारा वराहमिहिर द्वारा अन्वेषित ‘बृहत्संहिता’ में भूगर्भीय जलान्वेषण की पद्धतियों का अनुसरण करके बनाए गए थे.

भारतीय जलविज्ञान का सैद्धांतिक स्वरूप अन्तरिक्षगत मेघविज्ञान और वृष्टिविज्ञान के स्वरूप को जाने समझे बिना अधूरा ही है.मैंने अपने पिछ्ले दो लेखों में अन्तरिक्षगत मेघ विज्ञान, वृष्टि विज्ञान और वर्षा के पूर्वानुमानों से सम्बद्ध भारतीय मानसून विज्ञान के विविध पक्षों पर चर्चा की.अब इस लेख में विशुद्ध भूमिगत जलविज्ञान के बारे में प्राचीन भारतीय जलविज्ञान के महान् वराहमिहिर प्रतिपादित भूगर्भीय जलान्वेषण विज्ञान के बारे में विशेष चर्चा की जा रही है.
जल वैज्ञानिक वराहमिहिर ने पृथिवी, समुद्र और अन्तरिक्ष तीनों क्षेत्रों के प्राकृतिक जलचक्र को संतुलित रखने के उद्देश्य से ही भूमिगत जलस्रोतों को खोजने और वहां कुएं, जलाशय आदि निर्माण करने वाली पर्यावरण मित्र जलसंग्रहण विधियों का भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुरूप निरूपण किया है.

भारतीय जलवैज्ञानिक वराहमिहिर जिसने सबसे पहले अन्तरिक्ष में मंगल ग्रह पर1500 वर्ष पूर्व जल की खोज कर ली थी और पृथिवी में भी भूमिगत जल की खोज करते हु्ए सर्वप्रथम इस भूवैज्ञानिक सिद्धान्त को स्थापित किया कि मनुष्यों के शरीर में जिस तरह नाड़ियां होती हैं उसी प्रकार भूमि के नीचे भी जलधारा को प्रवाहित करने वाली शिराएं होती हैं. वराहमिहिर का जलविज्ञान एकांगी रूप से केवल भूगर्भीय जल पर आधारित सैद्धान्तिक विज्ञान ही नहीं है बल्कि वर्षाकालीन अन्तरिक्षगत मेघों के पर्यवेक्षण, मौसमविज्ञान सम्बन्धी जलवायु परीक्षण तथा भूगर्भीय जल की खोज पर आधारित ‘औब्जर्वेटरी’ और प्रायोगिक विज्ञान भी है.

वैदिक कालीन मंत्रद्रष्टा ऋषियों की जलविज्ञान सम्बन्धी मान्यताओं को ही छठी शताब्दी ई.में हुए महान् खगोलशास्त्री, ज्योतिषाचार्य तथा जलवैज्ञानिक वराहमिहिर ने अपने ग्रंथ ‘बृहत्संहिता’ में एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक पद्धति से प्रस्तुत किया है.
वराहमिहिर ने अपने युग में प्रचलित जलविज्ञान की मान्यताओं का संग्रहण करते हुए जलविज्ञान का विवेचन दो प्रकार से किया किया. इनमें से एक प्रकार का जल अन्तरिक्षगत जल है जो समुद्र आदि से वाष्पीभूत होकर आकाश में बादलों के रूप में संचयित होता है और दूसरे प्रकार का जल बादलों से बरस कर भूमिगत जल बन जाता है. आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से अन्तरिक्षगत जल का विवेचन ‘मौसमविज्ञान’ के अन्तर्गत किया जाता है तो भूमिगत जल का विवेचन ‘जलविज्ञान’ के धरातल पर होता है.वराहमिहिर ने भी आधुनिक विज्ञान के समान जल प्राप्ति के इन दो वैज्ञानिक आयामों का विवेचन दो अलग अलग शाखाओं के अन्तर्गत किया है.

‘बृहत्संहिता’ के 21वें‚ 22वें और 23वें अध्यायों में वराहमिहिर ने मेघों से प्राप्त होने वाले अन्तरिक्ष जल की चर्चा की है.और भूमिगत जलविज्ञान का विस्तृत विवेचन वराहमिहिर ने ‘बृहत्संहिता के ‘दकार्गल’ नामक 54वें अध्याय में किया है. ‘दकार्गल’ वस्तुतः ‘उदकार्गल’ के लिए प्रयुक्त शब्द है. ‘उदक’ जल को कहते हैं ‘अर्गल’ का अर्थ है रुकावट अर्थात् जल की प्राप्ति में होने वाली रुकावट या बाधा. वराहमिहिर के अनुसार जिस विद्या या शास्त्र से भूमिगत जल की बाधाओं का निराकरण किया जा सके उस धर्म और यश को देने वाले ज्ञान विशेष को ‘दकार्गल’ कहते हैं –

“धर्म्यं यशस्यं च वदाम्यतोऽहं
दकार्गलं येन जलोपलब्धिः.”
-बृहत्संहिता‚54.1
वराहमिहिर कहते हैं कि आकाश से केवल एक ही स्वाद वाला जल पृथिवी पर गिरता है किन्तु वही जल भूमि की विशेषता से अनेक रंग और स्वाद वाला हो जाता है. इसलिए जल की परीक्षा करनी हो तो पहले भूमि के रंग‚ रस और स्वाद की जांच करनी चाहिए-

“एकेन वर्णेन रसेन चाम्भश्च्युतं
नभस्तो वसुधाविशेषात्.
नानारसत्वं बहुवर्णतां च गतं
परीक्ष्य क्षितितुल्यमेव..”
– बृहत्संहिता‚54.2

भूमिगत जलशिराओं का सिद्धान्त
जलविज्ञान के क्षेत्र में वराहमिहिर ने सर्वप्रथम इस भूवैज्ञानिक सिद्धान्त की स्थापना की है कि मनुष्यों के शरीर में जिस तरह नाड़ियां होती हैं उसी प्रकार भूमि के नीचे भी जलधारा को प्रवाहित करने वाली शिराएं होती हैं-
“पुंसां यथाङ्गेषु शिरास्तथैव क्षितावपि प्रोन्नतनिम्नसंस्था.” – बृहत्संहिता‚ 54.1
वराहमिहिर के अनुसार पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण आदि आठ दिशाओं के स्वामी देवता हैं- इन्द्र‚ अग्नि, यम, निऋर्ति, वरुण, वायु‚ सोम‚ और ईशान देव.इन्हीं दिशा स्वामियों के नाम से प्रसिद्ध ‘ऐन्द्री’,‘आग्नेयी’, ‘याम्या’ आदि आठ प्रकार की भूमिगत मुख्य जलशिराएं भी होती हैं तथा इनके मध्य में एक बड़ी जल की धारा होती है जिसे ‘महाशिरा’ कहा जाता है. इन प्रमुख जल शिराओं से जुड़ी हुई भूमिगत जल की अन्य सैकड़ों जलशिराएं होती हैं जिनकी सहायता से भूमि के गर्भ में जल की सक्रियता बनी रहती है-

“पुरुहूतानलमयनिऋर्ति-वरुणपवनेन्दुशङ्करा देवाः.
विज्ञातव्याः क्रमशः
प्राच्याद्यानां दिशां पतयः..
दिक्पतिसंज्ञाश्च शिरा
नवमी मध्ये महाशिरानाम्नी.
एताभ्योऽन्याः शतशो
विनिसृता नामभिः प्रथिताः..”
-बृहत्संहिता‚ 54-3.4
‘बृहत्संहिता के ‘दकार्गल नामक 54वें अध्याय में वराहमिहिर ने क्षेत्र, देश आदि के अनुसार विभिन्न वृक्षों-वनस्पतियों,जलीय जीवों, मिट्टी के रंग, पथरीली जल चट्ठानों आदि की निशानदेही करते हुए भूगर्भस्थ जल की उपलब्धि हेतु पूर्वानुमान पद्धतियों का वैज्ञानिक धरातल पर विश्लेषण किया है. यहां यह भी बताया गया कि किस स्थिति में कितनी गहराई पर जल हो सकता है. फिर अपेय जल को शुद्ध कर कैसे पेय बनाया जाय, यह विधि भी बताई गई है. वराहमिहिर के इस विवरणात्मक ज्ञान से सूखे तथा अकालपीड़ित प्रदेशों में भी भूगर्भस्थ जल की प्राप्ति का प्रयास किया जा सकता है.

अपने समय में वराहमिहिर ने प्रचलित लोकविश्वासों और जलवैज्ञानिक मान्यताओं की परीक्षा करके भावी जनता के लिए मार्गदर्शन का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों के लोग भूगर्भस्थ जल का स्वयं परीक्षण कर सकें और तदनुसार कुएं, बावड़ी, तालाब आदि खोदकर जल प्राप्त करने का प्रयास कर सकें साथ ही उन उपायों से प्राणियों तथा फसलों के लिए भी पानी उपलब्ध करा सकें.

आगामी लेख में पढिए – “वराहमिहिर के अनुसार वृक्ष-वनस्पतियों की निशानदेही से भूमिगत जल की खोज”.
✍🏻डॉ मोहन चंद तिवारी, हिमान्तर में प्रकाशित आलेख
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

1 thought on “वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में भूमिगत जलशिराओं का सिद्धान्त”

  1. मैं एक किसान हूं मुझे यह लेख बहुत पसंद आया

Comment:

betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
orisbet giriş
orisbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
parobet giriş
parobet giriş