अध्याय 14, स्वतंत्र भारत में कश्मीरी अलगाववाद की कहानी ( क )

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जब 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरिसिंह ने जम्मू कश्मीर रियासत का भारत में विलय कर दिया तो 27 अक्टूबर 1947 से जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया ।हमें इस संदर्भ में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 1947 में भारत के साथ विलय पत्र पर जिन – जिन राजाओं ने अपनी- अपनी रियासतों के विलय किए, वह सभी रियासतें अपने-अपने राजाओं के द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर देने के पश्चात भारत का अभिन्न अंग बन गई थीं।
कहने का अभिप्राय है कि राजा के हस्ताक्षर करते ही उसकी प्रजा से यह पूछने की आवश्यकता अनुभव नहीं की गई कि वह भारत के साथ रहना चाहती है या पाकिस्तान के साथ जाना चाहती है ? राजा के द्वारा विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने को ही इस बात का प्रमाण मान लिया गया कि अमुक रियासत की प्रजा भारत के साथ ही रहना चाहती है। ऐसे में जम्मू कश्मीर के बारे में भी यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए थी कि यदि राजा ने जम्मू कश्मीर के भारत में विलय संबंधी दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए थे तो प्रजा से जनमत संग्रह कराने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी। अतः यह मांग करना सर्वथा निरर्थक और असंवैधानिक रही है कि जम्मू कश्मीर रियासत के भारत में विलय को मान्यता देने या ना देने के संबंध में जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाए। जैसा कि पाकिस्तान या उसके भारतीय पिट्ठू मांग करते रहे हैं ।

नेहरू और संयुक्त राष्ट्र संघ

जब भारत में जम्मू कश्मीर रियासत का पूर्ण विलय हो गया था तो 1948 में पंडित जवाहरलाल नेहरू को कश्मीर समस्या को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने की आवश्यकता नहीं थी। संयुक्त राष्ट्र में जाकर शिकायत करना उस समय के नेतृत्व ने अपनी दुर्बलता को प्रकट किया था।
21 अप्रैल 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने एक संकल्प प्रस्ताव पारित कर भारत और पाकिस्तान के सामने जम्मू कश्मीर के संबंध में तीन बातें रखीं पहली- सीजफायर, दूसरी- युद्धविराम, तीसरी-जनमत संग्रह की । उस समय संयुक्त राष्ट्र की मान्यता थी कि दोनों देश पहले सीजफायर लागू करें ।उसके पश्चात युद्ध विराम और सबसे अंत में जनमत संग्रह की बात पर आएं। वास्तव में संयुक्त राष्ट्र का इस प्रकार का प्रस्ताव भारत के साथ अन्याय ही था। संयुक्त राष्ट्र पक्षपाती होकर कार्य कर रहा था। अन्यथा वह कानूनी दृष्टिकोण से यदि देखता तो निश्चित रूप से जैसे अन्य राजाओं ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर अपनी-अपनी रियासतों को भारत के साथ मिला दिया था और उनके इस प्रकार के विलय प्रस्ताव को अंतिम मान लिया गया था, वैसे ही कश्मीर के महाराजा के निर्णय को अंतिम माना जाता। ऐसी परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र के लिए यह अपेक्षित था कि वह जम्मू कश्मीर के विलय संबंधी महाराजा के प्रस्ताव या सन्धि पत्र को अंतिम मानकर इस समस्या को अपने हाथ में नहीं लेता।
एक वर्ष से अधिक तक युद्ध रत रहे भारत और पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के उपरोक्त प्रस्ताव पर अमल करते हुए 31 दिसंबर 1948 को सीजफायर लागू कर दिया गया। उस समय भारत के पास जम्मू कश्मीर का दो तिहाई भाग रहा और एक तिहाई भाग पाकिस्तान के कब्जे में चला गया। तब से वही स्थिति बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र में अपने हितों के लिए लड़ना और अपने हितों को मजबूती के साथ उठाना सम्भवत: तत्कालीन भारतीय नेतृत्व के लिए संभव नहीं था।

धारा 370 और भारतीय संविधान

यदि हम धारा 370 को भारतीय संविधान में स्थापित करने की प्रक्रिया पर विचार करें तो तथ्यों से पता चलता है कि  जुलाई 1949 में शेख अब्दुल्ला, मिर्जा अफसल बेग, मसूदी और मोती राम बागड़ा को भारत की संविधान सभा में सम्मिलित कर भारतीय संविधान के सर्वाधिक आपत्तिजनक अनुच्छेद 370 पर चर्चा आरंभ हुई। शीघ्र ही जम्मू कश्मीर की सरकार ने भारत के संविधान को अनुच्छेद 370 से संबंधित एक प्रारूप अपनी ओर से तैयार करके प्रस्तुत किया । इस पर चर्चा करने के उपरांत 17 अक्टूबर 1949 को भारत के संविधान में यह आपत्तिजनक अनुच्छेद स्थापित कर दिया गया । जिसको स्थापित कराने में पंडित जवाहरलाल नेहरु की विशेष भूमिका रही थी।
यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि भारत की संविधान सभा में तो जम्मू कश्मीर के शेख अब्दुल्ला और उसके साथियों को सम्मिलित किया गया, परंतु जब 1951 में जम्मू कश्मीर की संविधान सभा का आयोजन किया गया तो उसमें केवल नेशनल कांफ्रेंस के प्रतिनिधि ही सम्मिलित थे , जो कि शेख अब्दुल्लाह की पार्टी थी। यदि जम्मू कश्मीर के हितों की रक्षा के लिए जम्मू कश्मीर के प्रतिनिधियों को भारत की संविधान सभा में आमंत्रित किया जा सकता था तो भारत के हितों की रक्षा के लिए यह भी आवश्यकता था कि जम्मू कश्मीर की संविधान सभा में भारतीय हितों की रक्षा करने वाले कुछ प्रतिनिधि भेजे जाते , परंतु नेहरू ने ऐसा नहीं किया। कुल मिलाकर पंडित नेहरू पर शेख अब्दुल्लाह भारी रहा । इतना ही नहीं, उसने भारत और जम्मू कश्मीर सरकार के बीच हुए दिल्ली समझौता – 1952 में भारत सरकार को इस बात के लिए भी अपने दबाव में ले लिया कि धारा 370 के अंतर्गत जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त होगा । जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री और राज्यपाल को सदरे रियासत कहा जाएगा।

35A को संविधान में डलवाना

1953 में जब परिस्थितियों को समझ कर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपने मित्र और कश्मीरियत के शत्रु शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया और उसकी सरकार गिर गई तो बख्शी गुलाम मोहम्मद को जम्मू कश्मीर का नया प्रधानमंत्री बनाया गया था । इसी समय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत के संविधान में चुपके से तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के आदेश से अनुच्छेद 35 Aजुड़वा दिया। इस आपत्तिजनक अनुच्छेद के माध्यम से यह व्यवस्था कर दी गई कि जम्मू कश्मीर रियासत का कौन निवासी स्थायी निवासी के रूप में मान्यता प्राप्त होगा और कौन नहीं ? – इसको तय करने की जिम्मेदारी राज्य विधानसभा की होगी । एक प्रकार से केंद्र ने यह व्यवस्था लागू करके हिंदुओं की दुर्दशा को आमंत्रित किया।
इस आपत्तिजनक अनुच्छेद के माध्यम से यह व्यवस्था की गई कि 14 मई 1954 के 10 वर्ष पहले तक यदि जम्मू-कश्मीर में कोई व्यक्ति निवास करता रहा हो और उसके पास वहां संपत्ति हो, तो उसे स्थायी नागरिक कहा जाएगा। 1956 की नवंबर में जम्मू कश्मीर का अपना संविधान बनकर तैयार हो गया था, परंतु उसे 26 जनवरी 1957 से लागू किया गया। इसके पश्चात वहां की संविधान सभा भंग हो गई और उसके स्थान पर विधानसभा अस्तित्व में आई। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री और राज्यपाल को सदरे रियासत के रूप में मान्यता देने वाले प्रावधान जो पंडित जवाहरलाल नेहरु के द्वारा स्थापित किया गया था, उसे लाल बहादुर शास्त्री जी के समय में 1965 में समाप्त कर दिया गया। शास्त्री जी का यह निर्णय बहुत ही उचित और ऐतिहासिक निर्णय था। उन्होंने अपने इस ऐतिहासिक निर्णय के माध्यम से बहुत बड़ा काम कर दिखाया था ।शास्त्री जी के समय में ही 1965 में पाकिस्तान और भारत का युद्ध हुआ। 23 सितंबर को यह युद्ध समाप्त हो गया था।

ताशकंद समझौता और नया षड़यंत्र

1966 की जनवरी के प्रारंभ में ही रूस ने दोनों देशों के बीच हस्तक्षेप करते हुए शांति बहाली का प्रयास किया और दोनों देशों के नेताओं को ताशकंद में बैठक के लिए आमंत्रित किया। जिसमें पाकिस्तान की ओर से अयूब खान और लाल बहादुर शास्त्री जी भारत की ओर से उपस्थित रहे। 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौता अस्तित्व में आया।
लाल बहादुर शास्त्री जी के साथ ताशकंद समझौता करने के समझौते की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान और कश्मीर के अलगाववादियों ने षड़यंत्र के नए दौर को आरंभ कर दिया। उसी समय जम्मू कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग को उठाया। भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का भी इस षड़यंत्र को समर्थन प्राप्त था। वास्तव में इस प्रकार की मांग पूर्णतया अलगाववादी थी, परंतु कांग्रेस के नेतृत्व के लिए जम्मू कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नेता कभी अलगाववादी नहीं रहे, वह उन्हें दूध पिलाती रही। जब आतंकवाद और आतंकवादियों के प्रति किसी देश की बड़ी पार्टी या सत्तारूढ़ पार्टी का इस प्रकार का दृष्टिकोण होता है तो उसे किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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