भारतीय संस्कृति का नाश करतीं खान फिल्में

Khansडॉ0 इन्द्रा देवी (बागपत)

फि ल्मों का हमारे वर्तमान यथार्थ जीवन से गहरा सम्बन्ध है। श्रव्य और पाठ्य विषयों में शब्दों द्वारा कल्पना की सहायता से मानसिक चित्र उकेरे जाते हैं, परन्तु दृश्य ‘फि ़ल्म-फ ीचर’ में हमें कल्पना पर इतना बल नहीं देना पड़ता, वहाँ कल्पना की कमी अभिनेता-अभिनेत्री की भाव-भंगिमा पूरी कर देती है। लगभग इसी मानव स्वभाव को ‘नाट्य-शास्त्र’ का मूल स्रोत बताते हुए भरत मुनि लिखते हैं-एक बार वैवस्वत मनु के दूसरे युग में लोग बहुत दु:खी हुए। इस पर इन्द्र तथा अन्य देवताओं ने जाकर ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि आप मनोविनोद का कोई ऐसा साधन उत्पन्न कीजिये जिससे सबका मनोरंजन हो सके। इस पर ब्रह्मा जी ने वेदों की सहायता से पंचमवेद नाटक की रचना की। कालिदास से भवभूूति तक संस्कृत नाटकों की एक परम्परा रही है। काव्येशु नाटक रम्यम् नाटकान्त कवित्वम्’’ के द्वारा नाटक काव्य-कला का सर्वश्रेष्ठ अंग माना गया है।

हमारे यहाँ नायक को सर्वगुण सम्पन्न माना गया है। उसे विनीत, मधुर, त्यागी, दक्ष, प्रिय बोलने वाला, लोकप्रिय, युवा, बुद्धिमान, उत्साही, कलावान, आत्म-सम्मानी, शूर, तेजस्वी, दृढ़ एवं शास्त्रज्ञ माना जाता है। इन गुणों के आधार पर नायक को तीन श्रेणी में रखा गया है-01-धारोदात्त ‘राम, कृष्ण’ 02-धीर ललित ‘राजा दुष्यन्त’ 03-धीर प्रशांत ‘युधिष्ठिर। हाँ, एक चौथी श्रेणी है धीरोद्धत्त यह मायावी आत्म-प्रशंंसा-परायण, धोखेबाज और चपल होता है। प्राचीन युग में रावण, दुर्योधन और आधुनिक फि ल्मों में खलनायक- प्राण, प्रेम-चोपड़ा, अम्बरीश पुरी, डैनी, अनुपम खेर आदि। प्राय: हिन्दू ही खलनायक की भूमिका में है। मिस्टर परफेक्ट ‘आमिर खान’ दबंग ‘सलमान खान’ शहंशाह ‘शाहरूख खान’ हिन्दी फिल्मों में प्राय: धीरोदात्त, धीरललित और धीरप्रशांत श्रेणी के शास्त्रीय नायक हैं।

लगभग सातवीं सदी से संस्कृत नाट्य परम्परा का एक प्रकार से ह्रास-सा होना शुरू हो गया था और इस ह्रास के साथ ही भारतीय रंगमंच भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगा। जब ग्यारहवीं सदी के आरम्भ में भारत पर मुसलमानों के आक्रमण होने आरम्भ हो गए तो उससे देश में एक अराजकतापूर्ण स्थिति पैदा हो गई। इस स्थिति में संस्कृत साहित्य से आरम्भ नाट्य परम्पराएं और रंगशालाएं छिन्न-भिन्न हो लुप्त-सी हो गयीं। बाणभट्ट की आत्मकथा में इन रंगशालाओं का चरमोत्कर्ष है। सम्राट हर्षवद्र्धन के समय में अभिनय, रंगमंच और अभिनेता का समाज पर पडऩे वाला प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है।

सन् 1870 के लगभग पारसी थियेटरों का समय था। पेस्टन जी फ्रे मजी ने ‘ओरिजिनल थियेट्रिकल कम्पनी’ खोली जिसके उपरान्त अनेक अन्य कम्पनियों की स्थापना हुई। इन कम्पनियों ने हिन्दी को अत्यन्त उपयोगी वस्तु दी-रंगमंच (स्टेज)। कहा जाता है कि भारतेन्दु जी ने शकुन्तला की सखियों के मुख से ‘गौरी धीरे चलो कमर लचक ना जाय’ गाना सुना तो वह अभिनयशाला से उठकर चले गए थे। यही बात जयशंकर प्रसाद के सम्बन्ध में कही जाती है। वे भी सम्राट अशोक को कुत्सित गाना गाते देखकर रायकृष्णदास जी के साथ प्रेक्षागृह से बाहर आ गये थे।

भारतेन्दु जी और जयशंकर प्रसाद का प्रसंग इन कम्पनियों के कुत्सित और भौंडे अभिनय से एक ओर जहाँ जनसामान्य को इनकी ओर आकर्षित हुआ दर्शाता है, वहीं दूसरी ओर सभ्य-सुशिक्षित वर्ग की चेतना को जाग्रत करता है, वह इनकी खामियों को दूूर करने का प्रयत्न करता है। आज की हिन्दी फि ल्म का जन्म पारसी कम्पनियों के गर्भ से हुआ है। फि ल्म के निर्माता-निदेशक आरम्भिक समय में फ ारसी धर्मावलम्बी ही थे। अधिकांशत: गाीतकार, संगीतकार, गायक-गायिका, अभिनेता-अभिनेत्री मुस्लिम थे। फि र भी हिन्दी पट्टी में अपनी स्वीकार्यता सिद्ध करने के लिए इन हीरो-हीरोइनों को हिन्दू उपनामों को अपनाना पड़ा जैसे- दिलीप कुमार, सुरैया, मीना कुमारी एवं मधुबाला आदि। ‘बैजू बावरा’ फि ल्म के गीतकार शकील बदायूॅंनी, संगीतकार- नौशाद, गायक-मौ0 रफ ़ी, अभिनेता-दिलीप कुमार, अभिनेत्री-मीना कुमारी के भजन-‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज’ एवं ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले’ आज भी मंदिरों की आरती में गूँज रहे हैं।

सुप्रसिद्ध कलाकार पृथ्वीराजकपूर का पृथ्वी-थियेटर्स, हिन्दू अभिनेता और मुस्लिम अभिनेत्री की एक नई परम्परा आरम्भ करता है- राजकपूर-नरगिस, गुरूदत्त-वहीदा रहमान, राजेन्द्र कुमार-सायरा बानो, देवानन्द- मधुबाला, राजकुमार-मीना कुमारी, राजेश खन्ना-मुमताज आदि। कुछ फि ल्मी पात्र ऐसे रहे जिन्होंने हिन्दू मुस्लिम दोनों शब्दों का समन्वय किया। जैसे-सरोज खान, पार्वती खान एवं संजय खान आदि।

समाज अपने आरम्भिक युग से नेता-अभिनेता के कार्य व्यवहार, बोलचाल, वेशभूषा आदि से प्रभावित होता है। उन्हें अपना रोल मॉडल मानता है। गाँधी-टोपी, गाँधी-खादी, गाँधी-चष्मा, गाँधी-घड़ी, जवाहर कट, नेहरू की भाँति अंग्रेजी के शब्दों को खींचकर बोलना, आजकल मोदी जैकेट और केजरीवाल-मफ लर इसका प्रमाण है।

दूसरी ओर सलमान खान की ‘तेरे नाम’ फि ल्म का हेयर स्टाइल एवं कटी-फ टी बैलबोटमनुमा जीन्स युवा वर्ग के फैशन में खूब फ बी है। अनेक फि ल्मी नाम हमारी माँ अपने पुत्रों के रखने लगी-राजेन्द्र कुमार, राजकुमार, राजेश, जितेन्द्र, धर्मेन्द्र, अशोक, किशोर, अमिताभ, शशि, ऋ षि, रणबीर, रेखा, शर्मिला, मुमताज, नूतन, सुलोचना, शबाना, करिश्मा, उर्मिला, जूही, माधुरी आदि। ये पात्र फि ल्मों से टी0 वी0 में आए और टी0 वी0 के द्वारा उपर्युक्त मायावी दुनिया का सीधा प्रवेश हमारे घर और बैडरूम तक हो गया।

नब्बे के दशक में भूमण्डलीकरण का दौर शुरू हुआ। भारतीय नैतिक मूल्यों का भारी ह्रास हुआ। क्रिकेट और फि ल्म में पूँजी निवेश अधिक लाभकारी रहा। एक बड़ा मुस्लिम वर्ग दर्शक या श्रोता के रूप में उभर कर आया। बाजार और फि ल्म उद्योग ने समाज की नब्ज को पकड़ा। हिन्दू युवती और मुस्लिम युवक की नई फि ल्मी जोडी बनी। आमिर-जूही  चावला -‘कयामत से कयामत तक’ शाहरूख खान-काजोल-दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे, सलमान खान-भाग्य श्री ‘प्रीती जिंटा-शाहरूख, वीरजारा, सलमान खान-माधुरी दीक्षित-’हम आपके हैं कौन’, सोनाक्षी सिन्हा-सलमान खान-दबंग, आमिर-अनुष्का शर्मा-पी0 के0 जैसे अनेका-अनेक फि ल्में तो सफ लता एवं मोटी कमाई का आधार बन गई। सफ लता के साथ-साथ समाज में खान परिवारों की स्वीकार्यता भी बढ़ी।

हिन्दी फि ल्म के इसी स्वर्णिम दौर में एक संक्रान्ति भी बन गई। पहले माता-पिता सन्तान के नामकरण में हीरो-हीरोइन का अनुकरण कर रहे थे, अब हिन्दी युवतियां इन सर्वगुण सम्पन्न एवं मिस्टर कूल, परफेक्ट खानों में अपने स्वप्नों के राजकुमार खोजने लगी। वह अपने अवचेतन मन में इन्हें खोजने-मिलने का अवसर ढूँढने लगी। इसका एक प्रमाण यह भी है कि शाहरूख खान एक पोर्ट-”कौन बनेगा करोड़पति’’ का संचालन करते हैं, अनेक हिन्दी युवतियाँ उस कार्य क्रम में किसी भी तरह बस शाहरूख खान का अंग स्पर्श करना चाहती हैं।

नब्बे के दशक से आज तक इतनी हिन्दी युवतियों ने मुसलमान युवकों से प्रेम विवाह किया है या प्रेम के लिए धर्म परिवर्तन किया कि ग्यारहवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक इतनी संख्या नही हैं। सह शिक्षा के केन्द्र-स्कूल, कॉलिज एवं विश्वविद्यालय प्रशासन इस स्थिति से परेशान हैं। टीन-एज के मुस्लिम युवक छेड़-छाड़ या बलात्कार के यौन अपराधों में अधिकांशत: सलाखों के पीछे हैं।

शिक्षार्थी हिन्दी युवती खान युवक में जो कि आसपास ही सहज सुलभ है, अपना जीवन साथी देखती है। मुस्लिम युवक छेड़-छाड़ या चुहल बाली अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है, क्योंकि तीन घण्टे की फि ल्म में वह खान बन्धुओं को लगभग प्रेम का संघर्ष करते ही देखता है। जब तक इन युवकों को रील लाइफ और रियल लाइफ का अन्तर पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

मुजफ्फ रनगर दंगा जो देश की दशा और दिशा बदल गया, उसकी जड़ में भी हिन्दू युवती से मुस्लिम युवक की छेड़छाड़ ही है, केरल के जज और मुख्यमंत्री की टिप्पणी आखिर युवतियाँ मुस्लिम धर्म ही क्यों अपना रही हैं? मुलायम और औवेसी को जेल में मुस्लिम युवकों की संख्या और चिन्ता सामान्य घटनाएँ नही हैं। सेकूलर राजनीति, बुद्धिजीवी वर्ग, महिला आयोग, मीडिया एवं संवेदनशील फि ल्म समीक्षक इस ज्वलन्त स्थिति पर आश्चर्यजनक मौन है? मुजफ्फ रनगर और केरल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या विश्व हिन्दू परिषद के गढ़ नही हैं।  नही ये हमे अपने पड़ोसी से लड़ा सकते है। भारत-पाक विभाजन के समय भी इन गाँवों में दंगा नहीं हुआ था? लेकिन आज ये गाँव छेड़-छाड़ या लव जिहाद रूपी ढेर पर विद्यमान है। योगी आदित्यनाथ, साक्षी महाराज, साध्वी प्राची आर्या, औवेसी एवं आजम खां आदि के बयान यदि आग में घी का कार्य करते हैं तो दूसरी ओर समस्त बुद्धिजीवी वर्ग और वामपंथी वर्ग की ठण्डी चुप्पी क्या आग पर रेत डालकर उसे धीरे-धीरे और सुलगने, धधकने का अवसर नहीं दे रही है?

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