समय शक्ति संपत्ति का, नाश करे है विवाद

बिखरे मोती-भाग 97

गतांक से आगे….
दुर्भाव से सद्भाव के,
मिटते जायें संबंध।
जैसे बदबू की हवा,
खाती जाय सुगंध ।। 929 ।।

व्याख्या :-
हृदय की शुद्घि सद्भाव से होती है। हृदय में प्रसन्नता भी सद्भाव से ही रहती है। यदि किसी कारणवश हृदय में दुर्भाव पैदा हो जाए तो वह गोखरू के कांटे की तरह बढ़ता जाता है, और हर क्षण चुभता रहता है। यहां तक कि वह एक दिन सद्भावों और घनिष्ठ संबंधों को समाप्त कर देता है फिर वे चाहे पति पत्नी के हों, पिता-पुत्र के हों अथवा मित्र-रिश्तेदार के हों, उन्हें दुर्भाव ठीक इस प्रकार समाप्त कर देता है जैसे बदबूदार हवा सुगंध को समाप्त कर देती है। इसलिए मनुष्य को हृदय में काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईष्र्या, द्वेष, घृणा, अहंकार के दुर्भावों को कभी पनपने नही देना चाहिए।

जीतना है दुर्भाव को,
सुदृढ़ कर सद्भाव।
राग को जीत वैराग से,
अन्य को आर्त-भाव ।। 927।।

व्याख्या :
प्राय: देखा गया है कि यदि मनुष्य दुव्र्यसन और दुर्भावों के भंवर में फंस जाता है तो निकल नही पाता है, किंतु दृढ़ संकल्प शक्ति इनके भंवर से निकालने में रामबाण सिद्घ होती है। राग सभी दुर्भावों की जड़ है। यदि राग को जीतना है तो हृदय में उपरति अर्थात वैराग्य का भाव जगाने से राग स्वत: ही सरलता से समाप्त हो जाता है। ठीक इसी प्रकार अन्य जितने भी दुर्भाव हैं, उनके प्रति हृदय में आर्तभाव रखिए। जैसे किसी पागल के कुछ ऊंट पटांग कहने पर आप सरलता से हंस देते हैं और उसकी बात का बुरा न मानकर उसे क्षमा कर देते हैं। तत्क्षण आपके हृदय में यह आर्त-भाव जाग्रत होता है-पागल है बेचारा। इस संसार में न जाने कितने लेाग दुर्भावों से पागल हैं। कोई क्रोध मंक पागल है, कोई काम में पागल है, कोई घृणा में पागल है, कोई लोभ में पागल है, कोई अहंकार में पागल है।
इन सब पर तरस खाईए, करूणा का भाव रखिए एक डॉक्टर की तरह। दुर्भावों का इलाज सद्भावों से कीजिए जैसे क्रोध के वेग को क्षमा से काम के वेग को आत्मसंयम अथवा ब्रह्मचर्य से घृणा के वेग को प्रेम से, लोभ के वेग को त्याग से अहंकार के वेग को विनम्रता से नियंत्रित किया जा सकता है। याद रखो, आर्तभाव की हृदय में प्रधानता मनुष्य को क्षमाशील और महान बनाती है। जैसा कि ईसामसीह ने अपने हत्यारों के लिए बड़े आर्तभाव से कहा था-हे खुदा इन्हें क्षमा कर देना, ये जानते ही नही हैं कि ये क्या कर रहे हैं? ध्यान रहे, आर्तभाव में करूणा की प्रधानता होती है।
समय शक्ति संपत्ति का,
नाश करे है विवाद।
चिंताएं विपदा बढ़ें,
अपयश का हो नाद ।। 928 ।।

व्याख्या :
हमेशा याद रखो जहां लड़ाई होती है, वहां समय, संपत्ति, शक्ति का नाश हो जाता है। तरह तरह की चिंताएं और मुसीबतें मनुष्य को आ घेरती हैं।
इतना ही नही मनुष्य का यश, अपयश में परिणत हो जाताा है इसका सशक्त उदाहरण महाभारत है।

अत: कलह क्लेश लड़ाई झगड़े से जितना हो सके दूर रहना चाहिए।

क्रमश:

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