पूर्व राष्ट्रपति जैल सिंह और कांग्रेस

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केसी त्यागी, पूर्व सांसद

ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति पद से रिटायर होकर चाणक्यपुरी के पास स्थित सर्कुलर रोड में रहने लगे थे। उसी दौर में 1987 में देवीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। सीएम बनने के बाद वह जैल सिंह से मिलने उनके आवास पहुंचे। मैं भी इस मुलाकात का साक्षी रहा हूं। देवीलाल और जैल सिंह पहले संयुक्त पंजाब में कांग्रेस पार्टी में बड़े पद पर रह चुके थे। प्रताप सिंह कैरों के विरुद्ध चली मुहिमों में दोनों साझीदार भी रह चुके थे। खैर, जैल सिंह से मुलाकात में देवीलाल ने उनसे तंज भरे अंदाज में एक सवाल पूछा। उन्होंने पूछा- संसदीय दल की बैठक के सर्वसम्मत प्रस्ताव के बगैर आपने राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ क्यों दिलाई? जैल सिंह के पास इसका कोई तार्किक उत्तर नहीं था। उनका फैसला भावनाओं पर केंद्रित था। जैल सिंह ने माना कि इससे देश बड़े नरसंहार से बच गया। राजीव को शपथ दिलाने की वजह से उस वक्त जो दंगे शुरू हुए थे, उन पर काबू पाया जा सका। फिर भी संवैधानिक मान्यताओं को दरकिनार करने की जो तोहमत जैल सिंह पर लगी, उसने उनका पीछा नहीं छोड़ा। वैसे, उनकी शैक्षणिक योग्यता अधिक नहीं थी, लेकिन उन्होंने धार्मिक ग्रंथों की पढ़ाई की थी। इसलिए उन्हें ज्ञानी की पदवी मिली। फरीदकोट रियासत में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने का श्रेय भी उन्हें जाता है। वह तो आजादी के बाद भी जेल में बंद थे। इत्तफाक से सरदार पटेल वहां एक कार्यक्रम में शामिल होने गए तो उन्हें जैल सिंह का स्मरण आया। सरदार तब जेल में जाकर उनसे मिले। यहीं से उनकी रिहाई की प्रक्रिया आसान हो गई। 1972 में इंदिरा गांधी का विश्वासपात्र होने के नाते जैल सिंह मुख्यमंत्री बने। इसी दौरान क्रांतिकारी उधम सिंह के अवशेष लंदन से भारत लाकर उन्होंने काफी लोकप्रियता कमाई। वहीं, 1980 में प्रकाश सिंह बादल की मुख्यमंत्री पद से बर्खास्तगी को पंजाब की जनता ने पसंद नहीं किया। लिहाजा आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के जरिये पंजाब धधक उठा। पंजाब में भी जैल सिंह के मुख्यमंत्री दरबारा सिंह से रिश्ते खराब हो चले थे।

भिंडरवाले से बढ़ी नजदीकी
इन हालात में अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए ज्ञानीजी ने भिंडरवाले से संपर्क किया, जो उस समय दमदमी टकसाल के प्रमुख थे। कट्टर विचारों से लैस कुरीतियों के विरुद्ध उनका रुख सिखों के बड़े वर्ग को प्रभावित कर रहा था। कहा तो यहां तक जाता है कि एक मौके पर उनकी मुलाकात संजय गांधी से भी कराई गई। भिंडरवाले पर हत्या के लिए उकसाने से लेकर राष्ट्रीय विरोधी तकरीर करने के दर्जनों मुकदमे दर्ज थे। इन्हीं दिनों दिल्ली की सड़कों पर खुलेआम शस्त्रों का प्रदर्शन करते हुए वह कानून व्यवस्था के रखवालों को ठेंगा दिखाकर वापस अमृतसर लौट आए। उनकी गिरफ्तारी नहीं हो पाई। ऐसा गृह मंत्री जैल सिंह के प्रभाव के चलते होने की बात कही जाती है। पंजाब में रोज-ब-रोज हालात बिगड़ रहे थे। इसे काबू में करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जैल सिंह को 1982 में राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित करा दिया। उन्हें लगता था कि इससे अकाली आंदोलन पर काबू पाया जा सकेगा। उधर, ज्ञानीजी और भिंडरवाले की मित्रता बढ़ती गई। दूसरी ओर वहां की चुनौतियों से निपटने के लिए पंजाब प्लान तैयार हुआ, जिसकी राष्ट्रपति होते हुए जैल सिंह को भनक तक नहीं होने दी गई। 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से आतंकवादियों को निकालने के लिए ब्लू स्टार नाम से ऑपरेशन किया गया, जिसमें सेना की मदद ली गई। इसमें पवित्र अकाल तख्त को भी भारी नुकसान पहुंचा। इसे लेकर ज्ञानी जैल सिंह पर इस्तीफा देने का दबाव बढ़ने लगा। जैल सिंह की जिद के सामने सरकार को झुकना पड़ा, जब उन्होंने स्वर्ण मंदिर का निरीक्षण करने का मन बना लिया। ज्ञानीजी इस घटना के बाद राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित करना चाहते थे, लेकिन उनको इसका मौका नहीं दिया गया।

अविश्वास की छाया
31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की उनके ही सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। इससे समूचे देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया। जगह-जगह सिख विरोधी दंगे भड़कने लगे। राजीव गांधी तब बंगाल के दौरे पर थे। उन्होंने दिल्ली आने का फैसला किया। उनके साथ वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी भी थे। वह कैबिनेट में दूसरे स्थान पर आसीन थे। ऐसे अवसरों पर एक सीनियर मिनिस्टर को कुछ समय के लिए कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाने का रिवाज रहा है। पंडित नेहरू और शास्त्री जी की मृत्यु के बाद गुलजारी लाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने थे। लेकिन राजीव गांधी के आस-पास की चौकड़ी तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त करने में लगी थी। राष्ट्रपति जैल सिंह उस समय ओमान दौरे पर थे। अरुण नेहरू वाली चौकड़ी को भय था कि ज्ञानीजी राजीव गांधी के बजाय प्रणब या किसी अन्य को कार्यवाहक प्रधानमंत्री की शपथ दिला सकते हैं। उस समय उपराष्ट्रपति पद पर वेंकट
रमण विराजमान थे। इसी के तहत उपराष्ट्रपति के हाथों शपथ दिलाने का प्लान भी तैयार किया गया। प्रणब मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा में इसका उल्लेख भी किया है कि किस तरह अविश्वास के चलते बाद में उन्हें कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखाया गया। ज्ञानी जैल सिंह जब इंदिरा गांधी के अंतिम दर्शन करने से लौट रहे थे कि अचानक कांग्रेसी पार्षद अर्जुन दास ने राष्ट्रपति की गाड़ी रोककर नारेबाजी की और मिनटों में राजधानी सिख विरोधी दंगे की नगरी बन गई। कैबिनेट के कई सदस्य उन पर महाभियोग चलाने का माहौल बनाने लगे थे। केके तिवारी तब केंद्र में राज्यमंत्री हुआ करते थे। उन्होंने राष्ट्रपति भवन को आतंकवादियों की शरणस्थली करार दे दिया। राजीव सरकार ने एक अवसर पर पोस्टल संशोधन बिल स्वीकृति हेतु भेजा, जिसे जैल सिंह ने लंबे समय तक अपने पास रोके रखा।

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