जब सम्राट विक्रमादित्य ने कराया था राम मंदिर का जीर्णोद्धार

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डॉ. अजय खेमरिया

भारतीय समाज के कम ही लोगों को पता है कि महाराज विक्रमादित्य ने भी बाबा महाकाल मंदिर की शोभा बढ़ाने के साथ साथ लोप हो चुकी अयोध्या की फिर से खोज करने तथा श्री राम जन्म मंदिर के पुनर्निर्माण कराने का महती कारज भी किया था। आज से कोई 2078 बरस पहले, जिसे बाबर के सेनापति मीर बांकी ने 1528 में ध्वस्त किया था और जिस पर अब भव्य राम मंदिर का पुनर्निर्माण हो रहा है। साथ ही अयोध्या में 240 नये मंदिरों का तथा 60 प्राचीन मंदिरों के निर्माण का श्रेय भी महाराजा विक्रमादित्य को जाता है। यह कोई कपोल कल्पित बात नहीं है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय में दी गयी तथ्यात्मक दलील का भाग है जिसे न्यायालय द्वारा मान्यता दी गयी है. इसका विस्तार से उल्लेख गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘अयोध्या दर्शन’ में भी मिलता है।
उल्लेखनीय है कि श्रीरामजन्मभूमि पक्ष की ओर से कहा गया था कि उस स्थान पर महाराजा विक्रमादित्य के समय से एक मंदिर था जिसके कुछ हिस्से को बाबर की सेना के कमांडर मीर बांकी ने नष्ट किया था और मस्जिद बनाने का प्रयास किया था। उसने उसी मंदिर के खम्भे आदि इस्तेमाल किये। ये खम्भे काले कसौटी पत्थर के थे और उन पर हिन्दू देवी-देवताओं की आकृतियां खुदी हुई थी। इस निर्माण कार्य का बहुत विरोध हुआ और हिन्दुओं ने कई बार लड़ाईयां लड़ीं जिसमें लोगों की जानें भी गई। अंतिम लड़ाई 1855 में लड़ी गयी थी। इस सबके कारण वहां मस्जिद की मीनार कभी नहीं बन सकी और वुजू के लिए पानी का प्रबंध भी कभी ना हो सका।
सुप्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने भी श्री नागेश्वरनाथ मंदिर के प्रति अपने विचार प्रकट करते हुए लिखा है कि- ‘इस मंदिर पर नामालूम कितनी आंधियां और भयंकर तूफान आए परंतु यह सबको बर्दाश्त करता हुआ अपने स्थान पर अडिग और अचल खड़ा है।’ महाराज विक्रमादित्य ने जब अयोध्या की पुनः खोज की तो सबसे पहले इसी स्थान का पता लगा। जनश्रुति के अनुसार महाकवि कालिदास को ‘स्त्रीयोनि’ में जन्म लेने का श्राप यहीं से मिला था। डाउसन के अनुसार महाराजा विक्रमादित्य ने 240 नये मंदिर बनवाये और 60 का जीर्णोद्धार किया।
शुभशील के पंचशती बोध में महाराजा विक्रमादित्य द्वारा अयोध्या में उत्खनन करके चर्मकार स्त्री की स्वर्णजरी की जूतियां अन्वेषण की कथा है। अयोध्या दर्शन (गीता प्रेस, गोरखपुर, पृष्ठ 98-99) के अनुसार महाराजा विक्रमादित्य द्वारा निर्मित प्राचीन मंदिरों में हैं-
1. श्रीरामजन्म भूमि मंदिर :
श्रीराम जन्म स्थान पर कसौटी पत्थर के 84 स्तंभों और सात कलशों वाला मंदिर महाराजा विक्रमादित्य ने बनवाया था। जिसे 1528 ई. में मुगल बादशाह बाबर के सेनापति मीरबांकी ने ध्वस्त कर दिया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किये गये उत्खनन में वहां हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां, प्रतीक और स्तंभ प्राप्त हुए हैं जिसके आधार पर वहां एक भव्य मंदिर था, इस बात की पुष्टि हुई है।
2. कनक भवन :
अयोध्या राजवंश के पराभव के बाद कनक भवन भी जर्जर होकर ढह गया। सोने का यह महल माता कैकेयी ने सीताजी को मुंह दिखाई में दिया था। यह श्रीराम-जानकी का विहारस्थल है। महाराजा विक्रमादित्य ने 57 ई.पू. में कनक भवन पुनःनिर्मित कराया। उसे लगभग 11वीं शती ई. में यवनों ने ध्वस्त कर दिया। वर्तमान कनक भवन का निर्माण ओरछा नरेश सवाई महेन्द्र श्रीप्रतापसिंह की धर्मपत्नी महारानी वृषभानुकुंवरि द्वारा सन् 1891ई. में करवाया।
3. रत्नसिंहासन मंदिर :
जन्मस्थान के पास रत्नमंडप ही रत्नसिंहासन मंदिर है। यहां भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था। कनक भवन के निकट दक्षिण में है। यहां विक्रमादित्यकालीन तीन मूर्तियां हैं। दुर्र्भाग्य से यह स्थान अपनी स्वतंत्र पहचान खोता जा रहा है।
4. लक्ष्मण मंदिर, सहस्त्रधारा तीर्थ :
सहस्त्रधारा तीर्थ (लक्ष्मण घाट पर) लक्ष्मणजी के शरीर छोड़ने के स्थान पर यह मंदिर है। यहां रामांज्ञा से श्री लक्ष्मणजी शरीर छोड़कर परमधाम पधारे थे। यहां मंदिर में शेषावतार लक्ष्मणजी की 5 फुट ऊंची चतुर्भुज मूर्ति है। यह मूर्ति सामने कुंड में पायी गयी थी। लक्ष्मण घाट पर यह मंदिर लक्ष्मणकिला के निकट स्थित है। नागपंचमी एवं पूरे वैशाख मास में यहां विशेष भीड़ रहती है।
5. बड़ी देवकाली (शीतलादेवी दुर्गाकुण्ड पर)ः
इन्हें भगवान श्रीरामचंद्रजी की कुलदेवी कहा जाता है। द्वापर युग में सूर्यवंशी महाराज सुदर्शन द्वारा यहां एक मंदिर की स्थापना की गई। कालांतर में महाराजा विक्रमादित्य ने शालग्राम शिलामय की त्रिदेवियों की स्थापना की गयी। यहां एक ही शिला में महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती शक्तियंत्र सहित अंकित है। अयोध्या के इस आदिशक्तिपीठ पर आज भी अयोध्यावासी बड़ी श्रद्धा रखते हैं। यहां एक जल से परिपूर्ण सरोवर (कंुड) भी है। 2002ई. में मंदिर एवं सरोवर का जीर्णोद्धार किया गया है। यह फैजाबाद चौक से आग्नेय (दक्षिण पूर्व) कोण में स्थित है।
6. छोटी देवकाली गिरिजा (ईशान देवी) नामक प्रसिद्ध मंदिर है। इस विग्रह की स्थापना त्रेतायुग में श्रीसीताजी द्वारा की गई थी जिसे वे अपने साथ जनकपुर से लायी थीं। यह स्थान मत्तगजेन्द्र चौराहे के पास सप्तसागर के निकट अयोध्या में ही है। (पृष्ठ-98-99)
वर्ष 2019 को उच्चतम न्यायालय का फैसला प्रकट हुआ। तद्नुसार श्रीरामजन्म भूमि पक्ष की ओर से कहा गया था कि उस स्थान पर महाराजा विक्रमादित्य के समय से एक मंदिर था। (पृष्ठ-81)
उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने इसकी खोज कर इस (अयोध्या) को पुनः बसाया।(पृष्ठ-92)
महाराजा विक्रमादित्य ने अयोध्या की पुनः खोज की तो सर्वप्रथम नागेश्वर मंदिर मिला। (पृष्ठ-75)
एक कथानुसार महाकवि कालिदास को स्त्री योनि में जन्म लेने का श्राप यहीं से मिला था। (पृष्ठ-45-46)
डॉ. श्रीराम अवतार ‘श्रीराम जन्मभूमि : अयोध्या का इतिहास मे’ लिखते हैं कि सात मोक्षदायिनी नगरियों में प्रथम नगरी अयोध्या सतयुग में महाराज मनु ने बसायी थी। सरयू नदी के किनारे बसी यह नगरी 12 योजन (144 किलोमीटर) लम्बी तथा 3 योजन (36 किलोमीटर) चौड़ी थी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथजी ने इसे विशेष रूप से बसाया था। इसमें सभी प्रकार के बाजार थे। तथा इसकी रक्षा खाइयों, किवाड़ों, और शताध्रियों से होती थी। महाराज इक्ष्वाकु, अनरण्य, मान्धाता, प्रसेनजित, भरत, सगर, अंशुमान, दिलीप, भगीरथ, ककुत्थ्य, रघु, अम्बरीष जैसे सम्राटों की यह राजधानी रही। श्रीरामजी की आज्ञा से इसके प्रधान देवता हनुमानजी हैं।
वे आगे लिखते हैं कि श्रीराम के परमधाम पधारने पर यह नगरी जनशून्य हो गई थी। तब महाराज कुश ने इसे पुनः बसाया था। यह पावन नगरी जब पुनः लुप्त हो गई तब लगभग 2500 वर्ष पूर्व उज्जयिनी के सम्राट विक्रमादित्य ने इसकी खोज कर इसे पुनः बसाया था। 1525 ई. में बाबर के मीर बांकी ने यहां के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की रक्षा के लिए संघर्ष का इतिहास काफी लम्बा है।
लेखक के अनुसार बाबर के पुत्र हुमायूं के शासनकाल में हसवर के स्वर्गीय राजा रणविजयसिंह की महारानी जयकुमारी ने तीस हजार स्त्री सैनिकों के साथ मंदिर पर पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया था। उनके गुरु स्वामी रामेश्वरानंद ने हिन्दू-जागरण किया। किन्तु तीसरे दिन हुमायूं की सेना आ गयी और पुनः मुसलमानों का कब्जा हुआ। अकबर के समय में हिन्दुओं ने बीस बार आक्रमण किये किन्तु उन्नीस बार असफल रहे। 20वीं बार रानी और उनके गुरु बलिदान हो गये। किन्तु हिन्दुओं ने चबूतरे पर कब्जा कर राम मंदिर बनाया।
जहांगीर एवं शाहजहां के समय में शांति रही। औरंगजेब ने जांबाज के नेतृत्व में सेना भेजी, पर स्वामी वैष्णवदास के दस हजार चिमटाधारी साधुओं ने रेलवे के सोहावल स्टेशन के निकट अपना पड़ाव डाला था। खिलजी के आक्रमण से मंदिर का बाहरी भाग तो ध्वस्त हो गया किन्तु जब मुख्य भाग पर उसने आक्रमण किया, उस समय स्थानीय जनता ने ठाकुर परशुरामसिंह था श्री गणराजसिंह के नेतृत्व में आक्रमणकारियों से डटकर लोहा लिया। अंत में आताताइयों को बुरी तरह से यहां हारना पड़ा। तीसरा बड़ा आक्रमण इस मंदिर पर औरंगजेब का हुआ। उसने नागेश्वर मंदिर के निकटस्थ अहिल्याबाई घाट पर स्थिति श्रीत्रेतानाथ के मंदिर को ध्वस्त कर उस स्थान पर विशाल मस्जिद खड़ी कर दी, जो आज भी टूटी-फूटी अवस्था में खड़ी है।
इस संबंध में हैमिल्टन नामक विद्वान ने अपनी पुस्तक ‘वॉकिंग ऑफ द वर्ल्ड’ में लिखा है-‘मुसलमानी शासनकाल में अयोध्या के प्रसिद्ध नागेश्वरनाथ के मंदिर को गिरवाकर वहां मस्जिद खड़ी करने के विचार से दो बार आक्रमण किये गये, मगर वे नाकामयाब रहे।’
अयोध्या के इस अत्यंत प्राचीन शिव मंदिर के सम्बन्ध में पाश्चात्य इतिहासकारों ने, जिनमें उल्लेखनीय है- रैमिन्टन, कर्निंघम, जार्ज विलियम रेनॉल्ड्स, विसेंट स्मिथ, मैक्स मूलर, बेवर, लूथर, वूलर, हण्ट, सिटनी, ह्रिटमैन, बिल्फ्रेड, एच. इलियेट, सर जॉन फ्रांकिक तथा इनके अतिरिक्त भारतीय विद्वान श्री भांडारकर प्रभृति ने बहुमूल्य ऐतिहासिक तथ्य, संस्मरण एवं जानकारीपूर्ण उद्गार प्रस्तुत किये हैं। जिनसे नागेश्वरनाथ मंदिर के इतिहास एवं गौरवशाली अतीत पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।
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