“यदि ईश्वर न होता तो क्या संसार का अस्तित्व होता?”

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ओ३म्

हमारे इस संसार में जन्म लेने से पूर्व से ही यह संसार इसी प्रकार व्यवस्थित रुप से चल रहा है। हमसे पूर्व हमारे माता-पिता, उससे पूर्व उनके माता-पिता और यही परम्परा सृष्टि के आरम्भ से चली आ रही है। इस परम्परा का आरम्भ कब व कैसे हुआ? इसका उत्तर है कि यह परम्परा इस सृष्टि के निर्माण के बाद मनुष्य व प्राणियों सहित सभी वनस्पतियों के लिए उपयुक्त वातावरण के बन जाने के बाद आरम्भ हुई। यह सृष्टि कैसे बनी तो इसका उत्तर है कि यह सृष्टि एक अपौरुषेय, मनुष्यों से भिन्न एक चेतन व विचारशील सत्ता जो सर्वव्यापक व सर्वशक्तिमान होने के साथ अल्पज्ञ न होकर सर्वज्ञ है और जिसे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व इसके संचालन सहित प्रलय करने का ज्ञान था, उस सत्ता के द्वारा सुदूर अतीत में बनी है। संसार में हम चेतन व जड़ दो प्रकार के पदार्थ देखते हैं। मनुष्य शरीर में उसकी आत्मा चेतन है तथा शरीर जड़ पदार्थ है। शरीर को अन्नमय कहा जाता है जो कि खेतों में कृषि कार्य करने पर उत्पन्न अन्न के सेवन से बना होता है। भूमि वा खेत जड़ अर्थात् चेतना से शून्य होने के कारण ही जड़ कहाते हैं। जड़ पदार्थों को किसी भी प्रकार सुख व दुःख की अनुभूति नहीं होती। इन जड़ पदार्थों का सूक्ष्मतम रूप प्रकृति कहलाती है जिसे भारत के प्राचीन मनीषी वा ऋषियों ने त्रिगुणात्मक अर्थात् सत्व, रज व तमों गुण वाली सत्ता बताया है। जिस प्रकार वैज्ञानिक खोज करके कोई घोषणा करता है, उसी प्रकार हमारे प्राचीन मनीषी ऋषियों ने सृष्टि व वेद आदि का सूक्ष्म व गम्भीर अध्ययन कर व सृष्टि के सबसे सूक्ष्मतम पदार्थ ईश्वर व जीवात्मा को जानकर इस रहस्य को समझा कि कार्य सृष्टि का कारण सूक्ष्मतम् त्रिगुणात्मक प्रकृति है। इसी से सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान एवं सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर सृष्टि बनाता है। ईश्वर अनादि, अजन्मा व नित्य होने से उसका ज्ञान भी अनादि व नित्य होता है जो न तो वृद्धि को ही प्राप्त होता है और न हि ह्रास को। वह ज्ञान सदा एक समान, वृद्धि व ह्रास से रहित रहता है। यह जैसा खरबों वर्ष व उससे पूर्व था वैसा ही आज है और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा। मनुष्य को इस पूरे रहस्य को जानने के लिए किसी योग्यतम वेदाचार्य से वेद, दर्शन व उपनिषदों आदि के अध्ययन करने सहित स्वयं में एक सफल व समाधि सिद्ध योगी बनना होगा, तभी वह सृष्टि को साक्षात् व यथार्थ रूप में जान सकता है।

हमने उपर्युक्त पंक्तियों में सृष्टि का आरम्भ कैसे हुआ, इस प्रश्न पर विचार किया है। कब हुआ का उत्तर यह है कि हमारी सृष्टि अति प्राचीनतम है। यदि वर्षों में इसकी अवधि जाननी हो तो यह आर्य पंचांग के अनुसार आज से एक अरब छियानवें करोड़ आठ लाख त्रेपन हजार एक सौ इक्कीस वर्ष पूर्व उत्पन्न हुई थी। यह ध्यातव्य है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को अमैथुनी सृष्टि के द्वारा उत्पन्न किया था। यह चारों ऋषि सर्वव्यापक एवं सर्वान्तर्यामी ईश्वर द्वारा एक-एक वेद के ज्ञान से प्रेरित व युक्त किए गए थे। इन्हें पल, क्षण, घंटे, दिन, रात्रि, सप्ताह, माह व वर्ष आदि का पूर्ण ज्ञान था। यह कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष सहित बारह महीनों व वर्ष का ज्ञान भी रखते थे। अतः इन्होंने प्रथम दिवस से ही वेद वा आर्य पंचांगानुसार काल गणना करना आरम्भ कर दिया था जो उत्तरोत्तर चलता रहा और अब भी चल रहा है। इस पंचांग के अनुसार ही सृष्टि का आरम्भ होने से अब तक व्यतीत हुए दिनों, महीनों व वर्षों की गणना सम्भव होती है। इसके अतिरिक्त अन्य साधनों से सृष्टि की वर्तमान वय का ठीक ठीक अनुमान लगाना सम्भव नहीं है। विज्ञान ने जो अपनी पद्धतियां कार्बन डेटिंग आदि को विकसित की है, उसके अनुसार भी काल गणना लगभग इतनी ही सिद्ध होती है। अतः इस सृष्टिकाल को स्वीकार करना ही चाहिये क्योंकि इसमें त्रुटि होने का प्रश्न नहीं है। यह भी जान लें कि सृष्टि की कुल आयु 4.32 अरब वर्ष होती है। शेष अवधि तक इस सृष्टि को चलना है। इसके लिए हमें वायु व जल सहित पृथिवी, वनों व अपनी कृषि की भूमि को उपजाऊ रखना होगा। यदि विकास आदि के कारण यह सन्तुलित व स्वच्छ नहीं रहेंगे तो सृष्टि से प्राणी जगत सहित वनस्पति जगत की सृष्टि के शेष काल के लिए समाप्ति भी हो सकती है। विश्व के सभी विकसित व विकासशील देश इससे चिन्तित हैं और इसका मार्ग ढूंढ रहे हैं, यह सन्तोष की बात है।

वेद और वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि संसार में ईश्वर, जीव व प्रकृति तीन नित्य पदार्थों का सदा से अस्तित्व है। ईश्वर व जीव चेतन तत्व हैं तथा प्रकृति जड़ हैं। यह तीनों ही सूक्ष्म पदार्थ हैं जिनमें ईश्वर सर्वातिसूक्ष्म है। इसके बाद जीवात्मा एकदेशी, अणुरूप व संख्या में असंख्य हैं जिनमें ईश्वर समाविष्ट व सर्वान्तर्यामी रूप से व्यापक है। प्रकृति भी सूक्ष्म है परन्तु ईश्वर व जीवात्मा, प्रकृति से भी सूक्ष्म होने के कारण, प्रकृति में प्रवेश कर सकते हैं। इसी कारण ईश्वर सर्वव्यापक है। ईश्वर सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान होने के कारण सनातन जीवों के लिए सृष्टि को बनाता है और उनके पूर्व जन्मों के कर्मों के फलों को देने के लिए उनको कर्मानुसार नाना प्रकार के शरीर देता है। सृष्टि में जो प्राकृतिक नियम व Universal Truths हैं वह सब ईश्वर के बनाये हुए नियम हैं। यह भी जान लें कि सृष्टि बनने से पहले प्रलय की अवस्था होती है और उस प्रलय से पूर्व सृष्टि होती है। यह क्रम अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक इसी प्रकार चलता रहेगा।

अब हम यह जान चुके हैं कि इस सृष्टि को, जिसे कार्य प्रकृति या कार्य जगत भी कहते हैं, उसे ईश्वर ने सब जीवों को सुख प्रदान करने के लिए बनाया है। हमें जो दुःख प्राप्त होते हैं वह हमारी अविद्या व वेद विरुद्ध अशुभ आचरण व पाप कर्मों के करने के कारण होते हैं। ईश्वर अनादि व नित्य होने से सदा से है और सदा रहेगा। उसका न जन्म होता है न मृत्यु। यह भी दार्शनिक एवं विज्ञान का नियम है कि अभाव से भाव व भाव से अभाव उत्पन्न नहीं होता। ईश्वर, जीव व प्रकृति भाव रूप सत्तायें हैं। इनमें से यदि एक भी न होता तो यह सृष्टि और प्राणी जगत, कुछ भी उत्पन्न न होता। तीनों के अस्तित्व में होने से ही यह संसार अस्तित्व में आता है। सृष्टि का उत्पन्न होना व चलना इन तीनों सत्ताओं के अस्तित्व होने पर ही निर्भर है।

हम इस प्रश्न पर विचार कर रहे हैं कि यदि ईश्वर न होता तो क्या होता? इसका उत्तर यह है कि तब जीव व प्रकृति होते या न होते, तो भी सृष्टि, वनस्पति व प्राणी जगत की किसी प्रकार की कोई रचना न होती। सब अन्धकारमय व क्रियारहित ही होता। जो लोग ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते व जानते, वह अविद्या से ग्रस्त लोग हैं, भले ही वह वैज्ञानिक हों या अन्य कोई। जिस प्रकार से सृष्टि और मनुष्य आदि प्राणियों का अस्तित्व सत्य है, यथार्थ है उसी प्रकार से ईश्वर का अस्तित्व भी स्वयं-सिद्ध, सत्य और यथार्थ है। हमारी यह सृष्टि और हमारे शरीर परमाणु व कोशिकाओं से मिलकल बने हैं। इन परमाणुओं व शरीर की कोशिकाओं को बनाने वाला भी ईश्वर का स्वचालित तन्त्र या सिस्टम है। जिस प्रकार बिना जीवात्मा के शरीर नहीं होता, आत्मा निकल जाये तो शरीर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार बिना ईश्वर के सृष्टि व प्राणी जगत आदि भी नहीं होते। ईश्वर ने ही इनको बनाकर धारण किया हुआ है। ईश्वर के न होने या सृष्टि को धारण न करने की अवस्था प्रलय की अवस्था होती है जो कि ईश्वर की रात्रि रूप होने वा ईश्वर के क्रियाशील न होने के कारण होती है। ईश्वर के न होने अर्थात् होने अथवा क्रियाशील न होने पर सृष्टि की अवस्था प्रलय रूप में होती जिसमें प्रकाश से रहित अन्धकार में सभी जीव ढके हुए सुप्त व सुषुप्ति अवस्था में होते। यह अवस्था निःसन्देह जीवात्माओं के लिए उचित न होती। आज मनुष्य जन्म पाकर हमें सदकर्म करके उन्नति व सुख प्राप्त करने सहित मोक्ष को प्राप्त होकर असीम सुख व आनन्द प्राप्त करने के अवसर प्राप्त हैं जो कि ईश्वर के न होने पर न होते। अतः संसार के सभी जीव सृष्टि उत्पन्न करने, इसे चलाने तथा सभी जीवों को उनके किए पूर्व के कर्मों के अनुसार मनुष्यादि प्राणी योनियों में जन्म देने के लिए ईश्वर के आभारी व कृतज्ञ हैं। हमें ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व आभार व्यक्त करने के लिए उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना वैदिक रीति से करनी चाहिये। करेंगे तो लाभ में रहेंगे, यदि नहीं करेंगे तो जो हानि व दुःख मिलेगा, उसकी गणना भी नहीं की जा सकती। इसी के साथ हम इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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