भारत में दलित विमर्श और उससे संबंधित साहित्य

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डॉ. त्रिभुवन सिंह

भारत के आज के दलित विमर्श को समझना हो तो आपको वर्ष 1930 से पहले के लिखी पुस्तकों को पढऩा चाहिए। इससे हमें पता चलता है कि वर्ष 1750 से 1900 के बीच भारत की जीडीपी विश्व जीडीपी का 25 प्रतिशत से घटकर मात्र 2 प्रतिशत बचती है और जिसके कारण 800 प्रतिशत लोग बेरोजगार और बेघर हो जाते हैं। गणेश सखाराम देउसकर और विल दुरान्त ने लिखा है कि मात्र 1875 से 1900 के बीच 2.5 से 5 करोड़़ लोगों की मौत अन्नाभाव और संक्रामक रोगों की चपेट में आने से हो जाती है, इसलिए नहीं कि अन्न की कोई कमी थी, बल्कि बेरोजगार हुये भारत का निर्माता वर्ग के पास जीवन रक्षा हेतु, अन्न खरीदने का पैसा नहीं था। लेकिन आज के विद्वानों ने इसके लिए केवल ब्राह्मणवाद को जिम्मेदार ठहराया है। इस इतिहास लेखन में भारत के आर्थिक इतिहास को काटकर अलग कर दिया गया। लेकिन ईसाई संस्कृतज्ञों द्वारा हमारे पूर्वजों को धूर्त दुष्ट घमंडी ब्राह्मणों की उपाधि से नवाजे जाने के पूर्व डॉ फ्रांसिस बुचनन की 1807 में लिखी एक पुस्तक जर्नी फ्राम मद्रास थ्रु द कंट्रीज ऑफ मैसूर, कैनरा एंड मालाबार के कुछ वाक्यांश उस समय के भारत की झलक देते हैं।
डॉ फ्रांसिस बुचनन उद्धृत करते हैं कि कोमारापेसा कोंकणी की एक ऐसी ट्राइब है, जो कि विशुद्ध शूद्र है, ये उस इलाके में ऐसे ही बसते हैं, जैसे मलयालम के विशुद्ध शूद्र नायर हैं। ये पैदाइशी खेतिहर और योद्धा हैं और इनका झुकाव डकैती की तरफ रहता है। इनके मुखिया वंशानुगत रूप से नायक कहलाते हैं जो किसी को भी आपस में सलाह करके जात बाहर कर सकते थे। ये पुराने शास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं और मांस तथा शराब का भी सेवन कर सकते हैं। श्रृंगेरी के स्वामलु उनके गुरु हैं जो उनको पवित्र जल, भभूत और उपदेश देते हैं शादी विवाह नामकरण और शगुन तिथियों को बताने के लिए इनके निश्चित ब्राह्मण पुरोहित हैं। ये मंदिरों में विष्णु और शिव जी की पूजा करते हैं जिनकी देखभाल कोंकणी ब्राह्मण करते हैं। तुलवा भाषी मूलनिवासी, जो लोग खजूर/ ताड़ के पेड़ों से गुड और शराब बनाने के लिए उनका रस/जूस निकलते हैं उनको बिलुआरा नामक जात से जाना जाता है,वे अपने को शूद्र कहते हैं लेकिन कहते हैं कि वे बुन्त्स से सामजिक स्तर पर नीचे मानते हैं। लेकिन इनमें से कुछ लोग खेती भी करते हैं। ज्यादातर लोग मजदूर हैं इन खेतों में, लेकिन काफी लोग खेतों के मालिक भी हैं। इनके आपसी मामलों को निपटने के लिए एक व्यक्ति नियुक्त होता है जिसको गुरिकारा के नाम से जाना जाता है, उसे किसी व्यक्ति को अपने समाज के वरिष्ठ लोगों से सलाह करके, जात से बाहर करने या मृत्युदंड देने का अधिकार है। (भाग 3, पेज, 52-53)
इस विवरण से यह साबित होता है कि शूद्र जातियाँ कभी भी अछूत नहीं रही हैं। इन्हें धन कमाने, जमीन का स्वामी बनने और न्याय व्यवस्था के संचालन का अधिकार होता था। ब्राह्मण उनके पुरोहित भी होते थे। यानी इस विवरण से पूरा दलित विमर्श धाराशायी हो जाता है।
यह पुस्तक तीन वॉल्यूम में संकलित है। लगभग 1450 पेज में। गूगल आर्काइव से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं। 3000 वर्षो की अछूत कथा धड़ाम से गिर पड़ेगी क्योंकि इसके 1450 पेजो में एक पैराग्राफ भी अछूतपन और अछूत के बारे में नहीं है। अछूत शब्द प्रथम बार 1932 में विधिक रूप से प्रकाश में आया। यह अनटचेबल शब्द का हिंदीकरण है। 1930 के पूर्व लिखी गयीं अनेक पुस्तकें हैं, जो मैंने पढ़ी हैं।
1. Tevernier and Vernier in Mughal era.
2. Papers Related To East India Affairs 1804.
3. Francis Hamilton Buchanan 1807
4. Caste and tribes of India – MA Sharring 1872
5. Poverty and Un-British Rule in India – Dada Bhai Nauroji 1901
6 Economic History of Early Colonial India – Ramesh dutt1904
7. देश की बात – गणेश सखराम देउसकर 1904
8. India in Bondage – J Sunderland 1929.
9. The Case of India – Will Durant 1030.
10.Al Beruni’s India 1030 AD.
11. Bankruptcy of India HM Hyndman 1875
12. Article of Karl Mar& about India 1853.
लगभग 12,000 पन्नो से अधिक होंगी यह सब मिलाकर। इन पुस्तको के किसी भी लेखक ने अछूत या अनटचेबल जैसे शब्द का प्रयोग नहीं किया है। विल दुरान्त ने शुचिता अर्थात सैनिटेशन शब्द का प्रयोग अवश्य किया है। क्यों नहीं किया हैं, क्या यह प्रश्न विचारणीय नहीं है?
हो सकता है इस सूची में कुछ किताबें छूट गयी हों। कुछ लोग पूछते रहते हैं कि इतिहास की पढ़ाई कैसे शुरू करूं। यह सूची है उन पुस्तको की जो भारत के बारे में सच्चाई बयान करती हैं, लेकिन कोई भी पुस्तक पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है।

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