पूर्वोत्तर भारत में तीर्थ स्थल और उनका महत्व

images (17)


वीरेंद्र परमार

पूर्वोत्तर भारत में हिन्दू धर्म की तीनों शाखाओं – शैव, वैष्णव, शाक्त के उपासक विद्यमान हैं। पूर्वोत्तर भारत में हिंदू धर्म की तीनों शाखाओं से संबंधित अनेक तीर्थ स्थल हैं जिनके प्रति हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले आदिवासी और गैर – आदिवासी सभी समुदायों के लोगों की श्रद्धा है।
कामाख्या मंदिर (असम) – सुविख्यात शक्तिपीठ मां कामाख्या मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से आठ किलोमीटर दूर नीलाचल पर्वत पर स्थित है। इस शक्तिपीठ का वर्णन समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तंभ पर भी अंकित है। सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मां शक्ति यहां कामाख्या के रूप में विद्यमान हैं। सहस्त्राब्दियों पूर्व यहां स्थापित मूल मंदिर 16वीं शताब्दी के आरंभ में ही ध्वस्त हो गया था। इसके बाद 17वीं शताब्दी में कूचबिहार के राजा नरनारायण ने इसका पुनर्निर्माण कराया। मंदिर परिसर में खुदे कुछ अभिलेखों से ऐसे संकेत मिलते हैं। इस पर्वत पर तारा, भैरवी, भुवनेश्वरी और घंटाकर्ण के मंदिर भी मौजूद हैं। कामाख्या मंदिर एक प्रमुख शक्तिपीठ है। इस शक्तिपीठ के संबंध में अनेक पौराणिक आख्यान प्रचलित हैं। कहा जाता है यहां देवी का योनि भाग होने की वजह से यहां माता रजस्वला होती हैं। इसीलिए कामाख्या देवी को बहते रक्त की देवी भी कहा जाता है। कामाख्या देवी के भक्तों का मानना है कि हर साल जून के महीने में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनके बहते रक्त से पूरी ब्रह्मपुत्र नदी का रंग लाल हो जाता है। इस दौरान तीन दिनों तक यह मंदिर बंद रहता है लेकिन मंदिर के आसपास अम्बूवासी पर्व मनाया जाता है। इस दौरान देश-विदेश से सैलानियों के साथ तांत्रिक, अघोरी साधु और पुजारी इस मेले में शामिल होने आते हैं। शक्ति के उपासक, तांत्रिक और साधक नीलांचल पर्वत की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना कर सिद्धियां प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। कामाख्या के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद के दर्शन करना आवश्यक है जो गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जाग्रत होने पर सदाशिव ने उसे भस्म कर दिया था। असम में स्थित ये मंदिर हमारी संस्कृति की प्राचीनता तथा आध्यात्मिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं।
नवग्रह मंदिर (असम) – यह नौ ग्रहों का मंदिर है जो गुवाहाटी के पूर्व में चित्रसाल पर्वत चोटी पर स्थित है। प्राचीन काल में यह खगोल विज्ञान और ज्योतिष अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र था। नवग्रह मंदिर एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। ऐसा माना जाता है कि नवग्रह मंदिर को 18वीं शताब्दी में अहोम राजा राजेश्वर सिंह और बाद में उनके बेटे रुद्र सिंह या सुखरुंगफा के शासन काल में बनवाया गया था। 1897 में इस क्षेत्र में आए भयानक भूकंप में मंदिर का काफी बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया था। हालांकि बाद में लोहे के चदरे की मदद से इसका पुननिर्माण किया गया। ऐसा माना जाता है कि गुवाहाटी के पुराने नाम प्रागज्योतिषपुर की उत्पत्ति मंदिर में स्थित खगोलीय और ज्योतिषीय केन्द्र के कारण ही हुई है। मंदिर परिसर में बना सिलपुखुरी तालाब भी यहां का एक प्रमुख आकर्षण है। यह तालाब पूरे साल भरा रहता है। शहर के अन्य हिस्सों से यह मंदिर अच्छे से जुड़ा हुआ है। असम में स्थित तमाम मंदिर न केवल हमारी संस्कृति की प्राचीनता, बल्कि आध्यात्मिक विरासत के भी जीवंत प्रतीक हैं। सदियों पुराने यहां के अधिकतर प्रमुख मंदिर विभिन्न पुराणों में वर्णित पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक गौरवगाथा का मूर्त रूप प्रस्तुत करते हैं।
वशिष्ठ आश्रम (असम) – गुवाहाटी शहर के दक्षिणी छोर में संध्याचल पर्वत पर स्थित वशिष्ठ आश्रम एक प्रसिद्ध पौराणिक स्थल है। कहा जाता है कि यहाँ पर महान वैदिक ऋषि वशिष्ठ रहते थे। संध्या, ललिता और कांता नामक तीन जल धाराएं यहाँ प्रवाहित होती हैं जो इस आश्रम की भव्यता को और बढ़ा देती हैं। इसका निर्माण 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अहोम राजा राजेश्वर द्वारा कराया गया था। अहोम वंश के शासकों द्वारा निर्मित इस आश्रम को अंतिम स्मारक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन नदियों की जलधारा में डुबकी लगाने से व्यक्ति की आयु बढती है और उसके द्वारा किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। ऋषि वशिष्ठ और इस आश्रम से जुडी अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। एक लोकप्रिय कथा है कि ऋषि वशिष्ठ अपने आश्रम के नजदीक प्रवाहित हो रही नदी में अपनी संध्या करते थे। एक बार उस जलधारा में इंद्र अपनी रानी शची और स्वर्ग की अन्य अप्सराओं के साथ जलक्रीडा कर रहे थे। इसके कारण ऋषि वशिष्ठ भगवान इंद्र पर बहुत क्रोधित हो गए क्योंकि नदी का पानी अशुद्ध हो गया था। परिणामस्वरूप ऋषि ने इंद्र को शाप दे दिया कि उसे एक दैत्य स्त्री के साथ यौन संबंध स्थापित करने के लिए विवश होना पड़ेगा। इस अभिशाप के कारण इंद्र एक सामान्य व्यक्ति में तब्दील हो गए। भगवान इंद्र ने उस दैत्य स्त्री को आशीर्वाद दिया कि उसका बेटा राजा बनेगा। बाद में उसका पुत्र अहोम साम्राज्य के पूर्वज बने और पूरे असम क्षेत्र पर शासन किया।
उमानंद (असम) – ब्रह्मपुत्र ने अपने प्रवाह मार्ग में अनेक छोटे-बडे द्वीपों का निर्माण किया है। इन्ही द्वीपों में से एक द्वीप है – उमानंद द्वीप। उमानंद द्वीप दुनिया का सबसे छोटा बसावटयुक्त नद द्वीप है। गुवाहाटी के कचहरी घाट के एकदम सामने स्थित है उमानंद नदद्वीप। बांह फैलाये ब्रह्मपुत्र, बीच में उमानंद। कथा है कि भगवान शिव ने देवी उमा के साथ अपने आनन्दमयी समय को व्यतीत करने के लिए इस द्वीप का निर्माण किया था। इसीलिए इसे उमानंद द्वीप कहा जाता है। उमा यानी देवी पार्वती और आनंद यानी खुशी। कहते हैं कि उमानंद स्थित भैरव मंदिर का दर्शन किए बगैर मां कामाख्या देवी का दर्शनफल अधूरा रहता है। अत: तीर्थयात्री कामाख्या मंदिर जाने से पहले यहां आते हैं। विध्न डालने के कारण कामदेव को भगवान शिव द्वारा जहां भस्म किया गया था वह जगह भी उमानंद द्वीप ही है। अत: इस नदी द्वीप का एक नाम भस्माचल द्वीप भी है। दूर से मयूरपंख की छटा जैसा दिखने के कारण किसी ब्रितानी अधिकारी ने इस द्वीप का उल्लेख पिकाक आइलैण्ड के नाम से किया है। मोटरबोट से उमानंद द्वीप पर आना-जाना बेहद आसान हो गया है। तीर्थयात्रियों के लिए उमानंद द्वीप का सबसे प्रमुख आकर्षण उमानंद मंदिर है। दिलचस्प है कि ब्रह्मपुत्र में आई ऊंची से ऊंची बाढ़ भी उमानंद मंदिर के भीतर अब तक कभी प्रवेश नहीं कर सकी। इस द्वीप पर पांच और मंदिर हैं – गणेश मंदिर, हरगौरी मंदिर, चलंतिका मंदिर, चन्द्रशेखर मंदिर और वैद्यनाथ मंदिर। उमानंद द्वीपवासियों के लिए महाशिवरात्रि सबसे पवित्र दिन होता है। इस सिद्धस्थल पर मंदिर का निर्माण 17 वीं सदी में आहोम शासक गदाधर सिंह ने करवाया था। हालांकि उनका बनवाया हुआ मंदिर एक भूकंप के दौरान ध्वस्त हो गया था। बाद में बीसवीं शताब्दी के आरंभ में यहां फिर से मंदिर का निर्माण करवाया गया। इस द्वीप को उर्वशी द्वीप भी कहते हैं। यहां उर्वशी कुंड है।
तेजपुर (असम)- गुवाहाटी से 185 किमी की दूरी पर स्थित असम का तेजपुर नगर पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। तेजपुर ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है। पहले तेजपुर को शोणितपुर के नाम से जाना जाता था। यहाँ अवस्थित अग्निगढ़ का किला उत्तर पूर्वी भारत के प्रणय स्थल के रूप में विख्यात है। इस किले का निर्माण वाणासुर द्वारा किया गया था। किले के चारों ओर अहर्निश अग्नि प्रज्वलित होती रहती थी ताकि कोई शत्रु किले के अन्दर प्रवेश न कर सके। तेजपुर नगर (शोणितपुर) भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और वाणासुर की पुत्री राजकुमारी ऊषा के प्रेम का साक्षी है। अपने पिता की इच्छा के विपरीत ऊषा ने अनिरुद्ध का वरण किया था। इसके परिणामस्वरूप श्रीकृष्ण और वाणासुर के बीच भीषण युद्ध हुआ था। युद्ध इतना भीषण था कि रक्त से पृथ्वी लाल हो गई। अंतत: युद्ध में वाणासुर परास्त हुआ तथा अनिरुद्ध और ऊषा का विवाह हुआ। तेजपुर एक शांत जगह है और यहाँ पर अनेक उद्यान बने हुए हैं। इन उद्यानों के अलावा यहाँ पर अनेक हिंदू मंदिर और ऐतिहासिक इमारतें भी हैं। इन ऐतिहासिक इमारतों से अनेक कथाएँ और घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। तेजपुर में अग्निगढ़, कालिया भोमोरा सेतु, पदम पुखुरी, महाभैरव मंदिर, हलेश्वर मंदिर आदि देखने लायक स्थान हैं। कलिया भोमोरा सेतु तेजपुर और कलियाबोर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी पर निर्मित सड़क पुल है। इसका नामकरण अहोम जनरल कालिया भमोरा फूकन के नाम पर किया गया है। यह पुल ब्रह्मपुत्र के दक्षिण तट पर नगांव जिले के साथ उत्तरी तट पर शोणितपुर को जोड़ता है। इस पुल की लंबाई 3015 मीटर है। पुल का निर्माण 1981 से 1987 के बीच हुआ था। पूर्वोत्तर भारत के विकास में इस सेतु की महती भूमिका है।
माजुली द्वीप (असम) – उत्तर-पूर्वी भारत के युगांतरकारी महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव की पुण्यभूमि के रूप में ख्यात माजुली द्वीप विश्व का सबसे बड़ा नदी द्वीप है। यह असम में जोरहाट के निकट ब्रह्मपुत्र नदी में अवस्थित है। इस द्वीप पर श्रीमंत शंकरदेव का स्पष्ट प्रभाव महसूस किया जा सकता है। इस द्वीप का निर्माण ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों मुख्यत: लोहित द्वारा धारा परिवर्तित करने के कारण हुआ है। समृद्ध विरासत, पर्यावरण अनुकूल पर्यटन और आध्यात्मिकता के कारण माजुली देशी – विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन गया है। यह द्वीप पक्षियों के लिए स्वर्ग है। कार्तिक पूर्णिमा के समय आयोजित होनेवाली रासलीला के अवसर पर यहाँ असमिया संस्कृति जीवंत हो उठती है। इस अवसर पर पारंपरिक नृत्य, गीत और नाटिका की प्रस्तुति पर्यटकों का मन मोह लेती है। यहाँ की संस्कृति और नृत्य – गीत पर आधुनिकता का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। वैसे तो बरसात को छोड़कर कभी भी इस द्वीप का भ्रमण किया जा सकता है लेकिन जिन्हें असमिया संस्कृति की झलक देखनी हो उन्हें रासलीला के समय अवश्य आना चाहिए। अतीत में माजुली का कुल क्षेत्रफल 1,250 वर्गकिलोमीटर था लेकिन भूक्षरण के कारण इसका क्षेत्र सिमटकर अब मात्र 422 वर्गकिलोमीटर रह गया है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या आदिवासी है। वर्तमान में यहाँ लगभग 22 वैष्णव सत्र हैं जिनमे औनीअति सत्र, दक्षिणपथ सत्र, गरमुर सत्र और कालीबारी सत्र महत्वपूर्ण हैं। यहाँ का सामागुरी सत्र मुखौटा निर्माण के लिए प्रख्यात है। इस सत्र में मुखौटा निर्माण का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। पंद्रहवीं शताब्दी में इसी द्वीप पर वैष्णव संत शंकरदेव एवं उनके शिष्य माधवदेव का पहली बार मिलन हुआ था। सर्वप्रथम श्रीमंत शंकरदेव ने सत्रों की स्थापना की थी जिसका उद्देश्य वैष्णव धर्म का प्रसार करना और असमिया संस्कृति को अक्षुण्ण रखना था। सत्र को आसान भाषा में वैष्णव मठ कहा जा सकता है। ये मठ सामाजिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र हैं। माजुली विगत पांच सौ वर्षों से असमिया सभ्यता और संस्कृति की राजधानी बना हुआ है। इस द्वीप पर मुख्यत: तीन जनजातीय समुदाय के लोग निवास करते हैं – मिशिंग, देवरी और सोनोवाल कछारी। द्वीप पर 144 गाँव हैं और कुल जनसंख्या लगभग डेढ़ लाख है। यहाँ चावल की एक सौ से अधिक किस्मे उत्पादित की जाती हैं और इनके उत्पादन के लिए किसी प्रकार के कीटनाशक और रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया जाता है। यहाँ शहर का कोलाहल नहीं, प्रदूषण नहीं, शांत वातावरण और सरल जीवन है, आध्यात्मिक शांति है। माजुली जाने के तीन रास्ते हैं – जोरहाट, धेमाजी और उत्तरी लखीमपुर। तीनों शहरों से माजुली जा सकते हैं। गुवाहाटी से जोरहाट की दूरी 312 किमी है। जोरहाट जाने के लिए परिवहन की अच्छी सुविधा उपलब्ध है। गुवाहाटी से सड़क मार्ग द्वारा चार – पांच घंटे में जोरहाट पहुँचा जा सकता है। गुवाहाटी से जोरहाट के लिए प्रतिदिन ट्रेन और फ्लाइट सुविधा भी मौजूद है। कोलकाता से सप्ताह में चार दिन जोरहाट के लिए फ्लाइट सेवा उपलब्ध है। जोरहाट के निमाटी घाट से माजुली की दूरी मात्र 14 किलोमीटर है जहाँ से मोटरचालित नाव द्वारा माजुली पहुंचा जा सकता है।
शिबसागर (असम) – असम का शिबसागर ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। यह ऐतिहासिक नगर पहले रंगपुर के नाम से विख्यात था। इस ऐतिहासिक नगर को अहोम राजाओं की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह वर्ष 1699 से 1788 तक अहोम राजाओं की राजधानी था। अंग्रेजों के आगमन के पूर्व लगभग छह सौ वर्षों तक यहाँ अहोम राजाओं का शासन था। अहोम राजाओं के शासन काल में शिबसागर शासन – प्रशासन का प्रमुख केंद्र था। रंग घर, शिबसागर ताई संग्रहालय, तलातल घर, शिव डोल, विष्णु डोल, देवी डोल, अजान पीर दरगाह इत्यादि शिबसागर के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल हैं जो पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। शिव डोल मंदिर भारत के सबसे ऊंचे शिव मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण लगभग 300 वर्ष पहले रानी अम्बिका द्वारा कराया गया था। यह 180 फीट ऊंचा है। शिव डोल मंदिर के आस – पास विष्णु डोल और देवी डोल मंदिर स्थित है जो क्रमश: विष्णु एवं दुर्गा को समर्पित है।
अश्वक्लांता या अश्वक्रान्ता (असम) – गुवाहाटी के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी किनारे पर अश्वक्लांता या अश्वक्रान्ता स्थित है। वर्ष 1720 में अहोम राजा शिवसिंघा द्वारा अश्वक्लान्ता मंदिर का निर्माण किया गया था। शिवसिंघा ने असम के अधिकांश बड़े हिंदू मंदिरों का निर्माण कराया था जिसमे शिवसागर का प्रसिद्ध शिव डोल मंदिर भी शामिल है। उस स्थान पर दो मंदिर हैं – एक पर्वत की तलहटी में और दूसरा ऊपर पहाड़ी पर स्थित है जिनके नाम कुर्मयनर्दन और अनंतशायी है। इस स्थान का पौराणिक महत्व है। इस सम्बन्ध में कई मिथक प्रचलित हैं। एक कथा है कि भगवान श्रीकृष्ण नरकासुर को मारने के लिए उसकी खोज में निकले। नरकासुर की खोज करते- करते इस स्थान पर आकर उनका घोड़ा थक गया। इसलिए इस जगह का नाम अश्वक्लान्ता पड़ा। अश्व का मतलब घोडा और क्लांत का अर्थ थकना है। एक अन्य किंवदंती के अनुसार यह कहानी महान पांडव और कृष्ण के मित्र अर्जुन से जुड़ी हुई है। कौरवों ने अर्जुन के विरुद्ध षड्यंत्र किया था। उन्होंने अर्जुन को इस जगह पर लौटने के लिए राजी कर लिया ताकि अभिमन्यु का वध किया जा सके। षड्यंत्र को असमिया भाषा में अभिक्रांता कहते हैं। बाद में लोग अभिक्रांता को अश्वक्लांता कहने लगे। वर्ष 1897 में आए भीषण भूकंप में मंदिर क्षतिग्रस्त हो गया था। असम के तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन के संरक्षण में इसकी मरम्मत करायी गई। पहले बलि देने के लिए मंदिर के निकट एक कुंड था। अब यह कुंड मौजूद नहीं है। मंदिर के में दो प्रतिमाएं हैं एक जनार्दन और दूसरी अनंतशायी विष्णु की। मंदिर में एक शिलालेख भी है।
अभयापुरी (असम) – बंगाईगाँव जिले में स्थित अभयापुरी एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केंद्र है। राजा बिजीत नारायण उर्फ चंद्र नारायण द्वारा 1671 में स्थापित अभयापुरी प्राचीन बिजनी साम्राज्य की राजधानी थी। बिजीत नारायण परीक्षित नारायण के पुत्र थे जो प्रसिद्ध कोच जनरल और युवराज सुक्लध्वज उर्फ चिलराई के पोता थे। बिजनी साम्राज्य की पहली राजधानी आधुनिक बिजनी शहर (1671-1864) था लेकिन बाद में राजधानी को डुमुरिया (जिसे अब डालन भंगा कहा जाता है) में स्थानांतरित कर दिया गया। 12 जून 1897 के भीषण भूकंप में डुमुरिया का शाही महल बुरी तरह ध्वस्त हो गया। इसलिए राजधानी को फिर से देवहटी वन क्षेत्र में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया जिसे बाद में देवी अभया माता के नाम पर अभयापुरी नाम रखा गया। यहाँ ऐतिहासिक महत्व के अनेक मंदिर हैं जिनमें अष्टधातु से निर्मित देवी अभया का मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
अलीपुखुरी (असम) – असम राज्य के वर्तमान नगाँव जिले के बोरदोवा के निकट अलीपुखुरी में श्रीमंत शंकरदेव का 1449 में जन्म हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था और उनकी दादी ने उनका पालन- पोषण किया था। उनकी शादी जल्द हो गई थी लेकिन शादी के तीन वर्ष बाद ही उनकी पत्नी का निधन हो गया। इसके बाद वे ज्ञान की तलाश में उत्तर भारत की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। अपनी तीर्थ यात्रा में वे उत्तर भारत के प्रसिद्ध संत कबीर के साथ-साथ कई ऋषियों और महापुरुषों से मिले। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद श्रीमंत शंकरदेव माजुली द्वीप में बस गए और वैष्णव धर्म का प्रचार करना शुरू कर दिया। वे कर्मकांड और अर्थहीन संस्कार और अनुष्ठानों के खिलाफ थे तथा लोगों को धर्म के सरल मार्ग का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने संगीत और भजन गायन के महत्व को प्रमुखता से रेखांकित किया। अलीपुखुरी असम के लोगों के लिए एक पुण्य भूमि है। बोरदोवा सत्र का असम में विशेष महत्व है। यहाँ एक कीर्तन घर है जिसके निकट पत्थर का एक टुकड़ा रखा है। इस पत्थर को पादशिला के नाम से जानते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस पर श्रीमंत शंकरदेव के पद चिह्न अंकित हैं। यहाँ पर होली का त्योहार और वैष्णव संतों की जयंती और पुण्य तिथि धूमधाम से आयोजित की जाती है।
दा परबतिया मंदिर (असम) – तेजपुर से 5 किमी पश्चिम में दा परबतिया मंदिर अवस्थित है। माना जाता है कि इस हिंदू मंदिर का निर्माण छठी शताब्दी के दौरान किया गया था। मंदिर का गर्भगृह चौकोर है जबकि मंडप आयताकार है। यहाँ असम की मूर्तिकला के प्राचीनतम नमूने उपलब्ध हैं। अहोम शासनकाल में यहाँ पर ईंट से एक शिव मंदिर का निर्माण किया गया था जो 1987 के भीषण भूकंप के दौरान ध्वस्त हो गया। पत्थर के दरवाजे देवी गंगा और यमुना की छवि से सुशोभित हैं। उनके हाथों में माला है। दाईं ओर गंगा के तीन परिचर और बायीं ओर यमुना के दो परिचर हैं। वर्ष 1989-90 में एएसआई द्वारा दा परबातिया मंदिर की खुदाई की गई थी। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्वावधान में संरक्षित एक पुरातात्विक स्थल है।

Comment:

betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş
galabet giriş
galabet giriş
betplay giriş