जातियों की साधना में सियासी लामबंदी?

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प्रभुनाथ शुक्ल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक जुमला खूब चलता है कहते हैं ‘दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से गुजरता है’। देश के सबसे बड़े राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। नतीजा राज्य की सियासत गर्म हो गई है। राजनीतिक दल और सरकारें अपने विकास को भूल कर जातिवाद का भजन करने लगी हैं। अभी तक जो सरकार विकास की उपलब्धियां गिनाते नहीं थकती थी वह जाति पर आकर अटक गई है। राज्य विधानसभा का चुनाव पूरी तरह जातिवाद पर लड़ा जाएगा। विकास सिर्फ मंचीय होगा। सत्ता में मौजूद योगी सरकार को अपने विकास पर भरोसा नहीं है। चुनाव की गोंट फीट करने के लिए जातियों पर दांव लगाया जा रहा। राज्य के मंत्रिमंडल विस्तार में यह बात साफ हो गयी है।
राज्य की सत्ता में दोबारा वापसी के लिए भारतीय जनता पार्टी जहां ओबीसी पर अपनी निगाहें गड़ाए है। वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ब्राह्मणों का गुणगान करने में लगी हैं। बहुजन समाज पार्टी जगह-जगह ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित कर ब्राह्मणों को अपने पाले में करना चाहती है। क्योंकि 2007 में मायावती के सत्ता वापसी के मूल में ब्राह्मण ही था। बसपा राज्य में दलित उत्पीड़न के फर्जी मुकदमों से परेशान होकर अगड़ी जातियां समाजवादी पार्टी के पाले में चली गयीं जिसके बाद अखिलेश यादव की सरकार बनी।
अखिलेश यादव सत्ता में दोबारा वापसी के लिए ब्राह्मणों को सिर आंखों पर बिठना चाहते हैं। वह अपनी जनसभाओं में परशुराम का मंदिर बनवाने की बात करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में भी रूपाणी युग के अंत के बाद पटेलों पर अधिक भरोसा जताया गया है। यहां भी विकास पर भरोसा कम जातियों पर अधिक दांव लगा है। यहाँ भी आम चुनाव होने हैं। सरकार में पटेल जातियों से सबसे अधिक मंत्रियों को तवज्जो दी गई है। पंजाब में चरणजीत चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर दलितों को साधने की कोशिश यह बताती है कि राजनीतिक दलों को अपने काम पर कम जातियों पर अधिक भरोसा है।

उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात और दूसरे राज्यों का चुनाव करीब होने से राजनीतिक हलकों में जातिगत जनगणना का मुद्दा खूब चल रहा है। पिछड़े वर्ग के राजनेता दलीय प्रतिबद्धता को ताक पर रखकर जातिय जनगणना का राग अलाप रहे हैं लेकिन केंद्र सरकार तैयार नहीं दिखती है।यूपी की योगी सरकार सबसे अधिक दांव पिछड़ों पर लगा रहीं है। अगड़ी जातियों को लेकर वह अधिक संवेदनशील नहीं दिखती है। क्योंकि उसे मालूम है कि राज्य की अगड़ी जातियां भाजपा छोड़कर अन्यत्र नहीं जानेवाली हैं। लेकिन अगड़ी जातियों में नाराजगी से इनकार नहीं किया जा सकता है। आरक्षण और पिछड़ों को अधिक सम्मान वह कितना पचा पाएगा यह वक्त बताएगा। मंत्रिमंडल विस्तार में पूर्वांचल और पश्चिमी यूपी को साधने की पूरी कोशिश की गई है। ओबीसी और दलित चेहरों को शामिल किया गया है। जितिन प्रसाद एक मात्र चेहरे हैं जिन्हे कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। मंत्रिमंडल विस्तार में जिन लोगों को राज्यमंत्री बनाया गया है उनकी कोई विशेष राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं दिखती है। जितिन प्रसाद को छोड़ बाकि ऐसे चेहरे हैं जो चुनावी गणित साधने के लिए पहली बार मंत्री बनाए गए हैं।
उत्तर प्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार सिर्फ जातिय गणित साधने की कोशिश है। क्योंकि चुनाव में अब बहुत अधिक वक्त नहीं रह गया है। नए चेहरों के पास अभी सरकार और मंत्रालय संभालने का कोई अनुभव नहीं है। इसलिए विकास में इनकी कोई भूमिका नहीं हो सकती है। अब जातियों को साधने में नए मंत्री कितना कामयाब होंगे यह तो भविष्य बताएगा।
जितिन प्रसाद ही सिर्फ ऐसे राजनेता है जो हैसियत वाले हैं। राजनीति का उन्हें अच्छा-खासा अनुभव है। वह कांग्रेस संस्कृत के राजनेता रहे हैं हाल में पार्टी को छोड़कर वह भाजपा में आए हैं। उनके पिता भी कांग्रेस में केंद्रीय मंत्री थे। प्रसाद का पश्चिमी यूपी के रुहेलखंड में अपना आधिपत्य है। 2004 में शाहजहांपुर से वह पहली बार सांसद बने। 2009 में वह धौराहरा संसदीय सीट से सांसद चुने गए। 2008 में कांग्रेस सरकार में इस्पात मंत्री बनाए गए। जितिन प्रसाद सोनिया गांधी के खिलाफ पार्टी अध्यक्ष का चुनाव भी लड़ा था। अब देखना होगा कि प्रसाद राज्य के ब्राह्मणों को चुनावी नजरिए से साधने में कितने सफल होते हैं।
उत्तर प्रदेश में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में कुल सात लोगों को शामिल किया गया है। जिसमें जितिन प्रसाद के साथ पूर्वांचल के गाजीपुर से संगीता बिंद, सोनभद्र से संजय गोंड को मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल किया गया है। निषाद और दलित जातियों को साधने के लिए इन लोगों को मंत्री बनाया गया है। जबकि पश्चिमी यूपी से सबसे अधिक पांच चेहरों को शामिल किया गया है। इसमें प्रमुख रूप से जितिन प्रसाद को कैबिनेट मंत्री बताएगा बनाया गया है। आगरा से धर्मवीर प्रजापति, बलरामपुर से पलटूराम, बरेली से छत्रपाल गंगवार, मेरठ से दिनेश खटीक को शामिल किया गया है। पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन को देखते हुए मंत्रिमंडल विस्तार काफी अहम माना जा रहा है। यही कारण है कि पश्चिमी से सबसे अधिक चेहरों को जगह मिली है।
उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक तकरीबन 40 फीसदी है। सवर्ण जातियां 20 फीसदी के आसपास हैं। राज्य में ब्राम्हण 10 से 12 फीसदी है। यादव 12 फ़ीसदी जबकि कुर्मी और अन्य पिछड़ी जातियां 8 फीसदी के करीब हैं। जाट और मल्लाह 5 फीसदी हैं। 18 फिसदी मुस्लिम और 25 फीसदी के आसपास दलित जातियां हैं। 2017 के राज्य विधानसभा चुनाव में भाजपा को पिछड़े वर्गों का अधिक समर्थन मिला था। राज्य में यादव समाजवादी पार्टी का जबकि दलित बहुजन समाज पार्टी का परम्परागत वोटर रहा है। राज्य सरकार पिछड़ी और दलितों में जो उपजातियां हैं उन्हें अपने पाले में लाने की भरपूर कोशिश कर रही है। लेकिन डीजल-पेट्रोल, रसोई गैस और खाद्य तेलों की बढ़ती कीमतें से आम लोग परेशान हैं बेगारी भी अहम मुद्दा है।
योगी सरकार दोबारा सत्ता में वापसी के लिए हर कदम उठा रहीं है। राज्य में निषाद और बिंद जातियों को पाले में करने के लिए निषाद पार्टी के साथ विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है। निषाद पार्टी के संजय निषाद इसकी घोषणा कर चुके हैं। पूर्वांचल में पटेल और कुर्मी जातियों पर अच्छी पकड़ होने की वजह अनुप्रिया पटेल को केंद्र सरकार में मंत्री बनाया गया। उधर अससुदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण करने में जोर-शोर से लगे हैं। अगर वह कामयाब होते हैं तो इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। हालांकि मुसलमान बेहद चालाक है। क्योंकि वह भाजपा को रोकने के लिए पूरी कोशिश करता है। इस लिहाज से वह ओवैसी के साथ कितना खड़ा होगा अभी यह कहना मुश्किल है। प्रियंका गांधी राज्य में कांग्रेस की नयी जमींन तैयार करने में लगी हैं। कांग्रेस जितनी मजबूती से लड़ेगी उतना सपा और बसपा कजोर होगी। फिलहाल यह कहना गलत नहीं होगा कि राज्य में चुनावी गणित बैठाने के लिए राजनीतिक दलों के लिए जातियां अहम हो गई हैं। सभी दल जातिय ढपली बजाने में जुट गए हैं।

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