स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डाल रहेऔद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण आवश्यक

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आलोक शुक्ला

पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिए देश में ठोस मुहिम चलाने की जरूरत है। केंद्र और राज्य सरकारों को औद्योगिक इकाइयों को उनके उत्पादन के अनुसार पेड़-पौधे लगाने और इनकी समुचित देखभाल के लिए निर्देश देना चाहिए। फैक्ट्री, उद्योग लगने के बाद वहां वनाच्छादित क्षेत्र बढ़ाने का टारगेट देने के साथ ही खेती योग्य जमीन पर दुष्प्रभाव से बचाने का नियम भी सख्ती से लागू करना चाहिए। प्रकृति स्वयं ही अपने को संतुलित करने की शक्ति रखती है।

किसी भी देश की संपन्नता में वहां की औद्योगिक इकाइयों का मुख्य स्थान होता है किन्तु औद्योगिक इकाइयों की वजह से होने वाले अपेक्षित विकास और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण कर इनकी स्थापना की अनुमति दी जानी चाहिए। उद्योगों से वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और जल प्रदूषण की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। एक विकासशील देश होने के नाते भारत में भी बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया शुरु हुई जिसकी वजह से आज देश को सभी प्रकार के प्रदूषण की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। आंकड़े बताते हैं कि भारत का स्थान प्रदूषण के मामले में पाकिस्तान, मंगोलिया, अफगानिस्तान और पड़ोसी देश बांग्लादेश के बाद पांचवें स्थान पर है।

स्विस संगठन ‘आईक्यू एयर’ ने ‘वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट, 2020Ó में कहा है कि दुनिया के सबसे प्रदूषित 30 शहरों में से 22 भारत में हैं। दिल्ली दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित राजधानी शहरों की लिस्ट में टॉप पर है। विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में गाजियाबाद दूसरे स्थान पर है। उसके बाद बुलंदशहर, बिसरख जलालपुर, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, कानपुर, लखनऊ और भिवाड़ी का नंबर आता है।

सूची के राज्यवार विवरण के अनुसार, उत्तर प्रदेश का गाजियाबाद, बुलंदशहर, बिसरख जलालपुर, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, आगरा और मुजफ्फरनगर, राजस्थान में भिवाड़ी, हरियाणा में फरीदाबाद, जींद, हिसार, फतेहाबाद, बंधवाड़ी, गुरुग्राम, यमुनानगर, रोहतक और धारुहेड़ा तथा बिहार में मुजफ्फरपुर सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल है। रिपोर्ट में कोविड-19 लॉकडाउन के प्रभावों और दुनिया भर में पीएम 2.5 प्रदूषण के कारकों में आए बदलाव को भी बताया गया है, जिसके अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर है चीन का शिंजियांग। उसके बाद शीर्ष 10 में से नौ शहर भारत के हैं। भारत में प्रदूषण की मुख्य वजह परिवहन, भोजन पकाने के लिए ईंधन जलाना, बिजली उत्पादन, उद्योग-धंधे, विनिर्माण कार्य, कचरा जलाना और समय-समय पर पराली जलाया जाना माना गया है।

भारत सहित सारे विश्व में प्रदूषण की समस्या मानव निर्मित है। मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ और जल प्रदूषण की समस्या तभी से है। भारत में जल प्रदूषण बहुत बड़ा पर्यावरणीय संकट है और बिना ट्रीटमेंट किया हुआ सीवरेज का पानी इसका सबसे बड़ा स्रोत है। खेतों और छोटे व मंझोले उद्योगों से आने वाला रसायन युक्त पानी भी जल प्रदूषण का दूसरा बड़ा कारण है। स्थिति इतनी गंभीर है कि भारत में ऐसा कोई भी जल स्रोत नहीं बचा है जो प्रदूषित न हो। विशेषज्ञों का कहना है कि देश के 80 प्रतिशत से ज्यादा जल स्रोत प्रदूषित हैं, खास तौर पर वे स्रोत जिनके आसपास घनी आबादी है। यही कारण है कि आज गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियां भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में शामिल हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि औद्योगिक कूड़ा, कृषि क्षेत्र में अनुचित गतिविधियां, मैदानी इलाकों में बहने वाली नदियों के पानी की गुणवत्ता में कमी, सामाजिक और पानी में शव बहाने जैसे धार्मिक रीति-रिवाज, नहाने, कचरा फेंकने, जहाजों से होने वाला तेल का रिसाव, एसिड की बारिश, ग्लोबल वार्मिंग, यूट्रोफिकेशन (शैवालों का असामान्य विकास), औद्योगिक कचरे के निपटान की अपर्याप्त व्यवस्था और डीनाइट्रिफिकेशन के कारण देश में जल प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है।

गांवों से शहरों की ओर लगातार हो रहा पलायन और तेजी से हो रहे अनियंत्रित व योजनाहीन शहरीकरण के कारण जल स्रोतों पर भारी दबाव पड़ा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि घरेलू इस्तेमाल का 80 प्रतिशत पानी खराब हो जाता है और एक लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में 16,662 मिलियन लीटर खराब पानी एक दिन में निकलता है। उल्लेखनीय बात तो यह है कि इन शहरों के 70 प्रतिशत लोगों को सीवरेज की सुविधा मिली हुई है और देश का करीब 33 फीसदी खराब पानी गंगा नदी के किनारे बसे शहरों और कस्बों से उत्पादित हो रहा है।

वायु प्रदूषण भी मानव निर्मित गंभीर समस्या है जो रसायनों, सूक्ष्म पदार्थ या जैविक पदार्थ के कारण मानव या अन्य जीव-जंतुओं और अंतत: पर्यावरण को क्षति पहुंचाता है। श्वास रोगों का मुख्य कारण वायु प्रदूषण है जो जानलेवा भी साबित होता है। वायु प्रदूषण की मुख्य वजह मोबाइल, ऑटोमोबाइल्स, कार्बन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें हैं। इन गैसों के कारण ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ रही है। धूल और धुएं के रूप में सूक्ष्म पदार्थ नाक में प्रवेश कर गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं। इनके अलावा विषाक्त धातुएं, जैसे जस्ता, कैडमियम, ताम्बा, कृषि प्रक्रिया से उत्सर्जित अमोनिया, कूड़ा, सीवरेज, औद्योगिक प्रक्रिया से उठने वाली गंध, परमाणु विस्फोट व युद्ध विस्फोटकों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न रेडियोधर्मी प्रदूषण पर्यावरण को हानि पहुंचा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ भी औद्योगिक प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है। यहां भिलाई स्टील प्लांट पहला बड़ा उद्योग था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कुछ वर्षों में ही यहां स्पंज आयरन उद्योग, पावर प्लांट, सीमेंट फैक्ट्री आदि की संख्या बढ़ी। कोरबा, रायपुर, दुर्ग, रायगढ़ आदि में औद्योगिकीकरण पहले से ही हो रहा था। औद्योगिक विस्तार की चाह में बिना किसी ठोस कार्ययोजना और निर्धारित मानदंडों की उपेक्षा कर उद्योग स्थापित किए जाने लगे। छत्तीसगढ़ में औद्योगिक विकास से वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और जल प्रदूषण,तीनों ही बढ़ते जा रहे हैं। रायपुर के सरोरा, धरसींवा में फैक्ट्रियों के धुएं से हवा में जहरीले तत्व फैल चुके हैं।

कोरबा में एनटीपीसी संयंत्र व अन्य फैक्ट्रियों से लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। जांजगीर-चांपा जिले में सिंचाई की सुविधा थी और किसान दो फसलें लेते थे मगर स्पंज आयरन व अन्य उद्योग, बिजली उत्पादक कारखानों में पानी के बढ़ते प्रयोग के कारण पानी संकट पैदा हो गया है व प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है। रायगढ़ के आसपास से निकलने वाली नदियों के अतिरिक्त कोरबा में हसदो व बांगो नदियों का जल पूरी तरह से प्रदूषित हो चुका है। नदी के प्रवाह क्षेत्र के लोगों में इन नदियों के पानी के इस्तेमाल के कारण चर्म रोग व अन्य गंभीर बीमारियां तेजी से फैल रही हैं।

रायपुर में खारून नदी के जल प्रदूषण से भी सभी वाकिफ़ हैं। यह स्पष्ट निर्देशित है कि फैक्ट्रियां भूमिगत जल स्रोतों का उपयोग औद्योगिक इकाइयों में नहीं करेंगी मगर रायपुर में ही इसका पालन नहीं हो रहा है। राज्य में अलग-अलग क्षमता के कई पावर प्लांट और स्टील प्लांट हैं । इनसे निकलने वाली फ्लाई एश (राख) आसपास के नदी- नालों एवं गड्ढों में फेंक दी जाती है। फ्लाई एश के कारण किसानों की कृषि ज़मीन बंजर होती जा रही है और औद्योगिक इकाइयों के आसपास खेती का रकबा तेजी से घट रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिए देश में ठोस मुहिम चलाने की जरूरत है। केंद्र और राज्य सरकारों को औद्योगिक इकाइयों को उनके उत्पादन के अनुसार पेड़-पौधे लगाने और इनकी समुचित देखभाल के लिए निर्देश देना चाहिए। फैक्ट्री, उद्योग लगने के बाद वहां वनाच्छादित क्षेत्र बढ़ाने का टारगेट देने के साथ ही खेती योग्य जमीन पर दुष्प्रभाव से बचाने का नियम भी सख्ती से लागू करना चाहिए। प्रकृति स्वयं ही अपने को संतुलित करने की शक्ति रखती है इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का हद से अधिक दोहन करने से बचकर मानव अपने अस्तित्व को नष्ट होने से बचा सकता है अन्यथा प्रकृति को छेड़ने का दुष्परिणाम हम उत्तराखंड में हुई भारी तबाही के रूप में भी देख सकते हैं।

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