मृत्यु के भारी भंवर, कोई न बचने पाय

बिखरे मोती-भाग 108

काल के प्रवाह में,
हर कोई बहता जाए।
मृत्यु के भारी भंवर,
कोई न बचने पाय ।। 960।।
व्याख्या :-
जिस प्रकार सरिता का जल समुद्र की तरफ प्रवाहित रहता है, ठीक इसी प्रकार इस समष्टि में जड़-चेतन सभी मृत्यु की तरफ बहते जा रहे हैं। इस संदर्भ में श्वेताश्वतर उपनिषद का ऋषि सचेत करता हुआ कहता है-”जैसे नदी अपने मूल से प्रारंभ होती है, वैसे ही इस शरीर रूपी नदी का आदि मूल पंचबुद्घि है। किसी की बुद्घि रूप में है किसी की रस में है, किसी की स्पर्श में है, किसी की शब्द में है और किसी की गंध में है। इन्हीं विषयों में बद्घमूल होने के कारण यह नदी बहती चली जा रही है। जैसे नदी में आवर्त होते हैं, भंवर होते हैं, वैसे ही शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श इस नदी के भंवर हैं, जिनमें जीवात्मा डूबने लगता है और कोई बचा नही पाता है। यह शाश्वत नियम है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि जब मृत्यु अवश्यम्भावी है, तो उसके आने से पहले इस संसार में सत्कर्मों की निशानी छोड़ कर जायें।
प्रकृति जीव परमात्मा,
तीनों है अतिरिक्त।
वाद्य में अर्थ ज्ञान ज्यों,
ऐसे ये सम्प्रिक्त ।। 961 ।।
वाद्य अर्थात वाणी,
सम्प्रिक्त अर्थात मिले हुए, रमे हुए, गूंथे हुए।
व्याख्या : यद्यपि जीवन प्रकृति और ब्रह्म ये तीनों अलग अलग हैं, किंतु जीव और प्रकृति में ब्रह्म इस तरह से समाया हुआ है, रमा हुआ है, जैसे-वाणी में अर्थ और ज्ञान रमे रहते हैं। जिस प्रकार कोई माई का लाल वाणी से ज्ञान और अर्थ को अलग नही कर सकता, ठीक इसी प्रकार जीव और प्रकृति से ब्रह्म को कोई अलग नही सकता है। प्रकृति की तात्त्विक रचना का विश्लेषण तो आधुनिक विज्ञान करता है किंतु जीव और ब्रह्म की तात्त्विक रचना का तो आज तक ऋषियों को भी पता नही है। वह रूप अदृष्ट है, अचिन्त्य है, अव्यवहार्य है, निर्गुण है, इसलिए हमारे ऋषियों ने उसे नेति-नेति कहकर ही संतोष किया है। जीव के लिए शरीर तथा ब्रह्म के लिए प्रकृति ही उसका स्थान है। जो पिंड में है वही ब्रह्माड में है। ब्रह्म तत्तवत: प्रज्ञा रूप है तथा जीव और प्रकृति पर उसकी शाश्वत सत्ता है। बीज से वृक्ष, वृक्ष से फल, फल से फिर बीज कौन बनाता है? फूलों में कौन मुस्कराता है, समुद्र के जल को तथा आकाश में वायु को कौन चलाता है? सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कौन करता है? समस्त ब्रह्मांड का नियंता कौन है? प्रकृति के नियमों में कौन छिपा बैठा है, जिसके कारण वे शाश्वत कहलाते हैं? समस्त सृष्टि की उत्पत्ति किसी इच्छा से हुई तथा इसका मूल कारण कौन है? इन सबका एक ही उत्तर है-ब्रह्म। इस संदर्भ में छान्दोग्य ‘उपनिषद का ऋषि’ कितना सुंदर कहता है :-सर्व खाल्विदं ब्रह्म अर्थात ब्रह्म का सबमें निवास है।
मन की वृत्ति देख नित,
कहां लिए तुझे जाए।
वृत्ति कारन नरक है,
वृत्ति स्वर्ग दिलाय ।। 962।।
व्याख्या :-महात्मा बुद्घ ने कहा था-बंध और मोक्ष का कारण चित्त की वृत्तियां हैं। प्रतिक्षण इनका अवलोकन करते रहना चाहिए। ध्यान रहे, कर्म के मूल में वृत्ति (भाव) होती है। 
क्रमश:

Comment:

betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş