महर्षि दयानंद ने धर्म का सत्य स्वरूप सारे संसार को समझाया : देव मुनि

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ग्रेटर नोएडा। ( विशेष संवाददाता)  यहां पर गुरुकुल मुर्शदपुर में चल रहे चतुर्वेद प्राणी यज्ञ में यज्ञ के ब्रह्मा देव मुनि जी महाराज ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि जब सर्वत्र अज्ञान अंधकार फैल गया था तब महर्षि दयानंद का आगमन हम सबके लिए बहुत ही सौभाग्य प्रदरहा । महर्षि दयानन्द ने सन् 1863 से वैदिक धर्म का प्रचार आरम्भ किया। उन्होंने वेदों का सत्यस्वरूप साधारण जनता के सामने रखा। वैदिक मान्यताओं को तर्क व युक्ति के आधार पर सत्य प्रतिपादित किया। वेदेतर सभी मतों की तर्क एवं युक्तियों के आधार पर समीक्षा की और सभी मतों को सत्यासत्य से मिश्रित बताया। अपने विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश’ में ऋषि दयानन्द जी ने सभी भारतीय मत-मतान्तरों सहित बौद्ध-जैन मत, ईसाई मत एवं मुस्लिम मत की समीक्षा कर वैदिक मत के साथ सभी मतों की तुलना कर धर्म का सत्य स्वरूप संसार के सामने रखा।
उन्होंने कहा कि इसका लाभ यह हुआ कि पहली बार भारत के सभी मतों के लोग अन्य सभी मतों के यथार्थ स्वरूप जो सत्यासत्य मिश्रित मान्यताओं से युक्त हैं, उसे यथार्थ रूप में जान पाये। सत्यार्थप्रकाश संसार के लोगों को ऋषि दयानन्द की बहुत बड़ी देन है जिसमें वेद सहित वेदेतर वैदिक साहित्य से वैदिक मान्यताओं के पक्ष में प्रमाण दिये गये हैं और अनेक विषयों पर तर्क एवं युक्ति के साथ वेद सम्बन्धी रहस्यों का प्रकाश किया गया है।

देव मुनि जी ने कहा कि   महर्षि दयानन्द की देश को अनेक देनें हैं। इनमें से एक देन पंचमहायज्ञविधि ग्रन्थ भी है। इस ग्रन्थ में मनुष्यों वा आर्यों के पांच प्रमुख कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। ऋषि दयानन्द के समय में देश देशान्तर में सभी लोग वैदिक ध्यान व उपासना की पद्धति को विस्मृत कर चुके थे। ऋषि दयानन्द ने अपने इस लघु ग्रन्थ में सन्ध्योपासना विधि सहित देवयज्ञ अग्निहोत्र, पितृयज्ञ, अतिथि यज्ञ तथा बलिवैश्वदेव यज्ञ का विधान कर उसके महत्व को इंगित किया है और इन कर्तव्यों के निर्वाह की विधि भी प्रस्तुत की है। ऋषि के इस कार्य के लिये सारा संसार उनका ऋणी है। यह बात अलग है कि संसार भौतिकवाद से ग्रस्त है। वह ऋषि के इन उपकारी कार्यों से लाभ नहीं उठा रहा है। ऐसा न करने से वह अपनी ही हानि कर रहे हैं। वैदिक धर्म में मनुष्य जो भी शुभ व अशुभ कर्म करता है उसका फल उसको ईश्वर की व्यवस्था से भोगना पड़ता है। यदि हम सन्ध्योपासना, अग्निहोत्रयज्ञ, पितृयज्ञ आदि का अनुष्ठान नहीं करेंगे तो हमें इससे होने वाले लाभों से वंचित होना पड़ेगा और न करने का दण्ड भी परमात्मा की व्यवस्था से प्राप्त होगा।

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