कैसी कथाओं का आयोजन होना चाहिए श्रावण माह में ? भाग – 2

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(श्रावण मास में हमें कैसी वेद कथाओं का आयोजन करना चाहिए ? इस विषय पर हमने पिछले दिनों अपनी ओर से कुछ प्रकाश डाला था। अब इसी विषय पर ‘उगता भारत’ समाचार पत्र के चेयरमैन श्री देवेंद्र सिंह आर्य जी का यह लेख ग्रंथियों और भ्रांतियों का समाधान करने में बहुत अधिक सक्षम है। जिसे हम पाठकों के लिए यहां पर इस आशा और अपेक्षा से प्रकाशित कर रहे हैं कि वह श्रावण मास के इस पवित्र महीने में कथा से संबंधित तथ्यों, रहस्यों और पात्रों के विषय में गंभीर जानकारी लें। हम पूर्व के लेख में हम काफी कुछ स्पष्ट कर चुके हैं । आज दूसरी कड़ी में आप इस संबंध में फिर पढ़िए लेखक के गंभीर विचार – संपादक )

अब पुन:मूढ़ एवं रूढ़ की बात करें। त्रेता युग में माता पार्वती जो दक्ष राजा हिमाचल की कन्या थी और जिसको देखने का सौभाग्य श्रृंगऋषि महाराज को समकालीन होने के नाते मिला था ।कुछ अज्ञानी लोगों ने यह घटना उस शिव राजा और पार्वती से जोड़ करके देखा जो इसके वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाए।
प्रश्न : वैदिक और आर्ष साहित्य में उसका आध्यात्मिक क्या अर्थ है?
उत्तर : यह आपके समक्ष प्रस्तुत किया गया।
शिव नाम आत्मा का भी है। जब मनुष्य अर्थात आत्मा शिव संकल्प धारण करता है और शिव का पुजारी बनता है तो उस समय यह आत्मा अपने प्रभु को अर्थात शिव को पाकर शिव कहलाता है ।
(जैसे लोहा अग्नि के गुणों को धारण करने वाला हो जाता है उसी प्रकार शिव अर्थात् परमात्मा के संपर्क में आने से आत्मा शिव हो जाता है)
जिस प्रकार राजा अपनी प्रजा को ऊंचा बनाने से शिव कहलाता है ।ऐसी यह आत्मा उस प्रभु की गोद में अर्थात् शिव की गोद में जाने से शिव कहलाता है।
परंतु ध्यान रहे कि एक शिव होता है और दूसरा महाशिव होता है ।यह आत्मा महाशिव नहीं होता केवल शिव कहलाता है। हमारे वेदों में वह अनुपम विद्या ,व दार्शनिक विचार हैं जिनको धारण करता करता मानव गदगद हो जाता है। परंतु हमारी बुद्धि की सूक्ष्मता है हम बुद्धि को संकुचित बना लेते हैं ।बुद्धि से इस वेद वाणी का विस्तार नहीं लेते ।वेद में शिव के नाना मंत्र आते हैं ।
(यज्ञ करते समय भी शिवसंकल्प मन में बना लेने के अनेक मंत्र महर्षि दयानंद ने एक जगह एकत्र करके प्रस्तुत किए हैं। जो दैनिक यज्ञ की पुस्तक से देखे जा सकते हैं)
शिव का नाद एवं डमरु क्या है?
हमारे आचार्यों ने ऐसा कहा है कि जब महर्षि पाणिनि थे तो उस समय महाराजा शिव ने डमरू बजाया और गान गाया। उस डमरु में से 14 सूत्रों का विकास हुआ ,उसको व्याकरण कहते हैं। व्याकरण में प्रत्येक वेद मंत्र बंध जाता है। क्या यह यथार्थ है कि शिव ने डमरू बजाया ,पार्वती ने नृत्य किया ,शिव ने गाना गाया ,और महर्षि पाणिनि ने इन सूत्रों को ले लिया?
परंतु महर्षि पाणिनि तो अब हुए हैं और इस सृष्टि को लगभग 1 अरब 97 करोड़ 29,56,064 वर्ष(यह गणना श्रृंग ऋषि वर्तमान जन्म में कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी द्वारा उस समय की गई है जब व्याख्यान कर रहे थे) प्रारंभ हुए हो रहा है तो क्या पाणिनी ऋषि महाराज से पूर्व यह वेद मंत्र क्रमबद्ध नहीं थे? उस समय कोई व्याकरण नहीं था? यह एक जटिल प्रश्न है।
इस विषय में हमारे ऋषियों ने और आचार्यों ने कहा है कि यह तो यथार्थ है कि शिव ने डमरू बजाया और पार्वती ने नृत्य किया परंतु इसको वैदिक ग्रंथों से एवं आर्ष साहित्य के अध्ययन से समझने व जानने की आवश्यकता है। शिव नाम परमात्मा का है।पार्वती नाम इस प्रकृति का है ।सृष्टि के प्रारंभ में जब संसार का प्रादुर्भाव हुआ उस समय परमपिता परमात्मा या शिव ने इस महतत्व रूपी डमरु को बजाया और डमरु बजने से यह माता पार्वती रूपी प्रकृति नृत्य करने लगी ।यह नाना रूपों में रची गई।
महतत्व रूपी डमरु प्रकृति रूपी पार्वती और शिव रुपी परमात्मा को इस वास्तविक वैदिक साहित्य के अनुरूप माना जाना चाहिए। उन्होंने डमरू बजाया तो संसार रच गया ,जो आज हमें दृष्टिगोचर हो रहा है।

यह है शिव का नाद एवं डमरु

इस वाक्य को इस प्रकार जान और मान लेना चाहिए।
मैं यह नहीं कहता कि महर्षि पाणिनी मुनि महाराज ने भी संसार का अधिक कल्याण किया, उन्होंने 14 सूत्रों को प्रकृति के महतत्व से या डमरु से किसी प्रकार स्वीकार कर लिया परंतु उपरोक्त तथ्य ही सही है। हमारे यहां सृष्टि के प्रारंभ में इस व्याकरण को हमारे आदि ऋषि ब्रह्मा ने जाना।जो योग से जाना ।महर्षि पाणिनि ने भी इन 14 सूत्रों को अपने योग से जाना।

डमरु अग्रणी अनाद से जाना

ब्रह्मा ने सृष्टि के आदि में पूर्व की भांति अर्थात् पुनः की भांति( कहने का अर्थ यह है कि प्रत्येक सृष्टि के प्रारंभ में एक ब्रह्मा होता है और वह प्रलय के बाद हर सृष्टि के प्रारंभ में योग से पहली सृष्टि के ज्ञान को आगे बढ़ाता है) योगाभ्यास किया अर्थात सिद्ध होता है कि ब्रह्मा पहले से भी योगाभ्यास करते रहे थे। प्राण ,अपान, उदान, समान और व्यान इन पांचों प्राणों को जाना । उन पांचों को एकाग्र किया, और ब्रह्मरंध्र में ले जाया गया। जहां एक चक्र होता है। उस चक्र का विस्तार रूप हुआ।
प्रत्येक मानव के मस्तिष्क में एक अनहद नाम का नाद बजता है। उस अनहद से नाना प्रकार के स्वर चलते हैं। उन स्वरों को जाना। स्वरों को जानकर इन अक्षरों को जाना ,और इन अक्षरों से यह प्रत्येक वेद मंत्र क्रमबद्ध होते चले गए। यह वेद मंत्र ऋचा कहलाती हैं। उन्हीं शब्दार्थ से संसार की भाषाओं का विकास हुआ। वही शब्दार्थ परंपरा से चले आ रहे हैं ।उन्ही शब्दों को मनुष्य अपनी कल्पना से कुछ परिवर्तन करता रहता है । इस प्रकार नाना प्रकार की भाषाओं का विकास हो जाता है, तो यह व्याकरण सृष्टि के आदि से चला आ रहा है ।महर्षि पाणिनि ने इसको कुछ सरल रूप में लिया है ।उनमें अक्षरों की व्याहृतियों करते हुए उन्होंने भिन्न-भिन्न रूपों से इस का प्रतिपादन किया है।
इसका अभिप्राय यह है कि हमारे मस्तिष्क में एक अनहद नाम का बाजा बजता होता है ,एक नाद होता है, एक सिंहनाद होता है ,रिद्धि नाद होता है ,डमरू जैसा नाद होता है , वहींं नृत्य भी होता है ।इस नाद को जानकर हम वास्तव में वैज्ञानिक बनते हैं। और उससे नाना प्रकार की व्याहृतियों को जानने वाले और अपने मानवत्व का विकास करने वाले बनते हैं।
(यह पुष्प दिनांक 21 दस 1964 को कृष्ण दत्त ब्रह्मचारी द्वारा अपने संबोधन में प्रस्तुत किया गया था)

अब यह भस्मासुर की काल्पनिक कथा क्या है ?
वास्तविक कथा क्या है? इस पर विचार करते हैं।

यह काल्पनिक है कि एक समय महाराजा भस्मासुर को इच्छा जागृत हुई कि मैं तपस्वी होऊं ।कुछ काल पश्चात उन्हें देव ऋषि नारद के दर्शन हुए तो नारद ने कहा अवश्य तपस्वी बनो। वह शिव की तपस्या करने लगे तो शिव आ पहुंचे। शिव ने कहा कि भस्मासुर क्या चाहते हो? भस्मासुर ने कहा कि भगवान आपके द्वारा यह जो कंगन है इस कंगन को मुझे अर्पित कर दीजिए। अब भगवान शिव ने वह कंगन दे दिया। उस कंगन में यह विशेषता थी कि यदि वह मस्तिष्क के ऊपरले भाग में हो तो वह मानव भस्म हो जाता है।
महाराजा शिव तो कैलाश पर जा पहुंचे और भस्मासुर को अभिमान आ गया। जिस को भस्म करने की इच्छा होती उसे कंगन द्वारा भस्म कर देते ।एक समय वह भ्रमण करते हुए कैलाश जा पहुंचे ।जब मानव के विनाश का समय आता है तो इसी प्रकार की बुद्धि बन जाती है ।उसी प्रकार के कारण बन जाते हैं ।भस्मासुर के जब विनाश का समय आया तो वह भ्रमण करते हुए कैलाश पर जा पहुंचा। माता पार्वती के दर्शन करते ही पार्वती पर मोहित हो गए और मोहित होकर के महाराजा शिव से कहा कि या तो मुझे पार्वती को अर्पित करो अन्यथा इस कंगन से मैं आप को भस्म कर दूंगा ।
अब महाराजा शिव ने यह विचारा कि यह तो एक मर्यादा का उल्लंघन होने चला ।क्या करना चाहिए? उसी काल में उन्होंने कहा कि अरे भस्मासुर मुझे कुछ समय प्रदान किया जाए । उन्होंने कहा कि बहुत अच्छा।
समय लेकर के शिव कैलाश को त्याग करके ब्रह्मा के द्वार जा पहुंचे। ब्रह्मा ने उनकी बात को सुना लेकिन सहायता करने से इंकार कर दिया। इसी प्रकार विष्णु के यहां पहुंचे तो विष्णु ने भी सुनकर के इनकार कर दिया। इंद्र के पास पहुंचे तो इंद्र ने भी सहायता नहीं की। अंत में निराश होकर भ्रमण करते हुए पुन: कैलाश पर आ गए और पार्वती से कहा कि देवी अब क्या करना चाहिए ?यह तो मर्यादा का विनाश होने चला है यदि मर्यादा का विनाश हो गया तो देवी हमारा जीवन व्यर्थ हो जाएगा ।
उस समय पार्वती ने कहा कि प्रभु यदि आप मेरे कहे वाक्य को स्वीकार कर लें तो मैं आपको कुछ कह रही हूं ।महाराज शिव ने कहा कि कहो, देवी उच्चारण करो। देवी ने कहा कि भस्मासुर से कह दो और आप मेरा और भस्मासुर का नृत्य करा दीजिए ।जब नृत्य होगा तो जहां जहां मेरा हाथ जाएगा वहीं वहीं भस्मासुर का हाथ जाएगा। और जब भस्मासुर का हाथ मस्तिष्क के ऊपरले वभाग में जाएगा तो कंगन से भस्मासुर समय नष्ट हो जाएगा ।
माता पार्वती के इस वाक्य को शिव ने स्वीकार कर लिया। अब महाराज शिव ने भस्मासुर से कहा कि हे भस्मासुर! तुम पार्वती के साथ नृत्य करो।
भस्मासुर ने प्रसन्न होकर के यह बात स्वीकार कर ली और दोनों का नृत्य होने लगा । इस प्रकार योजना के तहत भस्मासुर का अंत उसी कंगन से करा दिया गया।
यह तो अज्ञानियों की कहानी थी ।क्योंकि विचार करो कि यदि शिव परमात्मा थे ,अर्थात सर्वशक्तिमान थे, तो उनके पृथ्वी पर उत्पन्न होने की आवश्यकता नहीं थी और न ही वह नष्ट होते। ईश्वर तो अजन्मा और अनादि एवं नित्य है । वह जन्म मरण में आता ही नहीं। न ही वह अवतार धारण करता। ना ही पार्वती के साथ विवाह संस्कार करते ,तथा नहीं संतानोत्पत्ति करते । पार्वती के कारण ब्रह्मा विष्णु और इंद्र से सहायता नहीं मांगते ,क्योंकि ईश्वर तो सर्वशक्तिमान है । यह तो थी काल्पनिक कथा जिसको अज्ञानी लोग अधिकतर संसार में सुनाते हैं । इस पर विश्वास करते हैं। अब इसकी वास्तविक कथा को जान लीजिए।

भस्मासुर का वास्तविक, वैदिक और अभिप्राय क्या है?
देखिए भस्मासुर वही होता है जो संसार में अभिमानी होता है ।आज भौतिक विज्ञानवेत्ता जो समाज में हैं जिसमें अणु,महा अणु, त्रिसणु इत्यादि नाना प्रकार के कंगन रूपी यंत्र एकत्र किए जाते हैं ।जैसे अग्नियास्त्र हैं ।कहीं ब्रह्मास्त्र हैं ,तो वहां आत्मा का ज्ञान नहीं होता ।वह केवल अनीति से भिन्न भिन्न प्रकार के कंगनों को, अर्थात् यंत्रों को एकत्रित करता है ।नाना कंगन रूप यंत्रों को बनाता है और परमात्मा शिव को तथा उसकी सृष्टि को नष्ट करना चाहता है, तो उस काल में जब मर्यादा का उल्लंघन होता है तो माता पार्वती का नृत्य होता है। अर्थात प्रकृति नाचती है।नृत्य करके यह जो भौतिक विज्ञानवेत्ता समाज है ,यह तो परमाणु वाद का समाज है ।यह स्वयं उस भयंकर अग्नि में भस्म हो जाता है। भौतिक विज्ञानवेत्ता में जब अभिमान हो जाता है तो अभिमान को हमारे यहां भस्मासुर कहते हैं।
अब श्रावण का महीना चल रहा है। प्रतिदिन प्रत्येक समाचार पत्र में शिव जी के भक्त वास्तविक शिव के चित्रण को प्रस्तुत न करके त्रेता काल में उत्पन्न हुए योगी शिव को, जो एक आत्मा थी, को भांग पिला कर मस्त पड़ा हुआ दिखाते हैं ।उनके अनुचर बनके अपने आप भी नाना प्रकार के शिवजी के नाम पर नशा करते हैं ।ऐसे ही लोगों ने शिवजी को नशेड़ी बनाकर कलंकित किया है । अपने महा योगियों को, अपने महापुरुषों को बदनाम करने का कार्य भी ऐसे ही अज्ञानी लोगों का है।इसीलिए महर्षि दयानंद के सच्चे शिव की खोज करने का प्रण लिया था। संसार के समक्ष सत्य को स्थापित किया था। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए आर्य समाज की स्थापना की थी।
आर्य समाज के लोग वास्तविक एवं सही अर्थों को प्रकट करते रहेंगे यह बात अलग है कि उसकी मान्यता कितने लोगों में आएगी।
कुल मिलाकर हमारे इन दोनों लेखों को यहां पर प्रस्तुत करने का हमारा एक ही उद्देश्य था कि हमें श्रावण माह में ऐसी ही तथ्यात्मक वस्तुपरक और सत्य को उद्घाटित करने वाली घटनाओं का आयोजन करना चाहिए। जिससे जनता जनार्दन का मार्गदर्शन हो सके और लोगों की भ्रांतियों का निवारण भी हो सके।

 

(दिनांक 26 अक्टूबर 1967 को प्रस्तुत पुष्प)
प्रस्तोता : देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत समाचार पत्र

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