कैसे थे स्वामी दयानंद सरस्वती ?

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उनके एक प्रत्यक्षदर्शी शाहपुरा नरेश सर नाहरसिंह वर्मा द्वारा किया गया वर्णन

स्वामी जी पुष्ट काया, दृढ़ जत्रु, और बड़े बलिष्ठ थे। उनके शरीर से इस समय के बलवानों की जो तुलना करता हूँ तो बड़ा भारी अन्तर पाता हूँ। उनके अंग-प्रत्यंग ऐसे सुदृढ़ व सुडौल थे कि वैसे आज तक देखने में नहीं आये। वे नित्य प्रति प्रातःकाल योग साधन के लिये जंगल में जाते और प्राणायाम की क्रियाएँ करते थे। एक दिन मैं भी उनके साथ गया तो उन्होंने कुछ प्राणायाम की विधि जो वे मुझे नित्य प्रति सिखाया करते थे, सिखा कर विदा करना चाहा किन्तु मेरी इच्छा उनके साथ ही रहने की हुई। परन्तु स्वामी जी जंगल में दौड़ लगाते थे, इसलिये उन्होंने मुझसे कह दिया कि तुम इतना परिश्रम न कर सकोगे। पर मैंने नहीं माना और मैं भी उनके साथ दौड़ने लगा तो थोड़ी देर बाद थक गया और स्वामी जी बराबर दौड़ते चले गये। शायद उन्होंने पाँच मील से कम की दौड़ न लगायी होगी और लौट आने पर भी उनके फेंफड़े न फूले थे। मैंने उस दिन से यह बात समझ ली कि यह स्वामी जी के पूर्ण ब्रह्मचर्य का ही फल है।

स्वामी जी की स्मरणशक्ति इतनी प्रबल थी कि जो विषय एक बुद्धिमान् लिख कर भी समय पर याद नहीं रख सकता उसे वे सदैव याद रखते थे। 50 मनुष्यों के किये गये प्रश्नों का उत्तर वे स्पष्ट रीति से समझा कर प्रत्येक को अलग अलग दे देते थे। आलस्य, निद्रा और थकान के तो स्वामी जी में चिह्न भी न पाये जाते थे‌ मैंने जब देखा तभी उनको कुछ न कुछ कार्य करते देखा और मेरे उनके चिर-सहवास में भी ऐसा अवसर कभी नहीं मिला कि किसी समय मैंने स्वामी जी को किसी प्रकार की ओषधि सेवन करते देखा हो। वे प्रात:काल दूध के साथ ब्राह्मी सेवन किया करते थे।

…स्वामीजी भारतवर्ष के प्रचलित अनेक मत मतान्तरों की कड़ी आलोचना करते थे। परन्तु साथ ही वे यह भी कहते थे कि रोगी को कड़वी दवा पिलाये बिना उसका रोग दूर नहीं हो सकता, इसी सिद्धान्त को लेकर मैं मत मतान्तरों की कड़वी आलोचना करता हूँ, नहीं तो मनुष्य मात्र से मेरा भ्रातृभाव का सम्बन्ध है, मैं उनको सत्पथ पर लाना चाहता हूँ, शुद्ध वैदिक धर्म को, जो प्रकृति की थपेड़ से शिथिल हो गया है, पुनः देश में प्रचलित करना चाहता हूँ। यों तो जो धर्म सच्चा है वह अपनी सचाई के गुणों के कारण सदैव स्थिर रहता है। उसका विनाश नहीं होता, किन्तु मनुष्यों की मानसिक दुर्बलता के कारण वा विद्या के अभाव से उसमें कुछ परिवर्तन हो जाता है। यही दशा इस समय वैदिक धर्म की है। वह सत् शास्त्रों के अध्ययन से, सच्चे साधु-महात्माओं के उपदेशों से अपने मूल स्वरूप को पा लेगा और ईश्वर की उपासना की सच्ची विधि फिर से भारतवर्ष में प्रचलित हो तो भारतवासी शीघ्र ही वैदिक धर्म को ग्रहण करेंगे और मिथ्या मत मतान्तर मिट जायेंगे।

स्वामीजी के मस्तिष्क में ऐसे ऐसे दिव्यभाव भरे थे कि मैं उनका शतांश भी वर्णन करने में असमर्थ हूँ। इसका मूल कारण यही मालूम हुआ कि महर्षि दयानन्द पूर्ण ब्रह्मचारी थे, और इसी के प्रताप से उनकी सब शक्तियाँ प्रबल थीं। उनमें ब्रह्मचर्य ही एक ऐसी वस्तु थी जिसने उनको एक असाधारण पुरुष बना दिया व देशोत्थान के वे भाव उनके मस्तिष्क में जागृत किये जो वर्णन करना व उनके भाव तथा विचारों की कुछ व्याख्या करना साधारण मनुष्यों का काम नहीं है। इस बात का अनुभव उन्हीं को है जिन्होंने कि महर्षि का सत्संग किया था।

[स्रोत : फूलचंद एडवोकेट तथा नारायण गोस्वामी वैद्य द्वारा संकलित “दिव्य दयानन्द” पुस्तक, पृष्ठ 72-74, संस्करण 1999 ई. , संपादक : आचार्य सत्यानन्द ‘नैष्ठिक’, संकलन एवं प्रस्तुति : भावेश मेरजा]

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